सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति पाने वाले उम्मीदवार को किसी विशेष पद का दावा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि एक बार जब कोई उम्मीदवार बिना किसी विरोध के अनुकंपा नियुक्ति स्वीकार कर लेता है, तो बाद में उच्च पद की मांग करने का उसका अधिकार समाप्त हो जाता है।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने एक अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया, जिसमें नियुक्ति के लगभग दो दशक बाद भूतलक्षी प्रभाव (retrospective effect) से पदोन्नति की मांग की गई थी। कोर्ट ने इसे ‘तुच्छ मुकदमेबाजी’ मानते हुए अपीलकर्ता पर 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अपीलकर्ता तरुण गागट से संबंधित है, जिन्होंने 22 फरवरी 1999 को अपने पिता की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की मांग की थी। 2 जून 1999 को उन्हें ‘फॉरेस्ट गार्ड’ (Forest Guard) के पद पर नियुक्ति की पेशकश की गई, जिसे उन्होंने बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लिया।
नियुक्ति स्वीकार करने के बाद, 1 जुलाई 1999 को अपीलकर्ता ने एक अभ्यावेदन (representation) सौंपा, जिसमें उन्होंने दावा किया कि 1998 के स्पष्टीकरण परिपत्र के अनुसार वह ‘फॉरेस्टर’ (Forester) के पद के हकदार थे। अपीलकर्ता का तर्क था कि नियम के अनुसार उन्हें मृतक कर्मचारी से “एक वेतनमान नीचे” का पद मिलना चाहिए था।
अगस्त 1999 में वन विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने उनके इस दावे को खारिज कर दिया। इसके बाद अपीलकर्ता ने एक वैधानिक अपील दायर की, लेकिन अगले 19 वर्षों तक इस पर कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं की। 2020 में, अपीलीय प्राधिकारी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए उनके दावे को स्वीकार कर लिया और उन्हें उनकी प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से ‘फॉरेस्टर’ के पद पर अपग्रेड कर दिया।
इस भूतलक्षी पदोन्नति से अन्य कर्मचारियों की वरिष्ठता (seniority) प्रभावित हुई, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया है।
कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए अनुकंपा नियुक्ति और वरिष्ठता से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर जोर दिया।
1. विशेष पद का कोई अधिकार नहीं सुप्रीम कोर्ट ने State of Bihar v. Samsuz Zoha (AIR 1996 SC 1961) के फैसले का हवाला देते हुए कहा:
“यह स्थापित कानून है कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति चाहने वाले उम्मीदवार को किसी विशेष नियुक्ति का दावा करने का अधिकार नहीं है।”
2. नियुक्ति स्वीकार करने के बाद अधिकार समाप्त पीठ ने State of Rajasthan v. Umrao Singh ((1994) 6 SCC 560) का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि एक बार जब अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति दी जाती है और उम्मीदवार उसे स्वीकार कर लेता है, तो उच्च पद की मांग करने का उसका अधिकार समाप्त हो जाता है। इसके बाद न तो भविष्य के प्रभाव से और न ही पिछली तारीख से उच्च पद का लाभ मांगा जा सकता है।
3. देरी और ल्याचेस (Delay and Laches) कोर्ट ने 19 साल की लंबी चुप्पी पर अपीलकर्ता को फटकार लगाई। कोर्ट ने Karnataka Power Corporation v. K Thangappan and Another ((2006) 4 SCC 322) मामले का हवाला देते हुए टिप्पणी की:
“उक्त पृष्ठभूमि में, उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की या दूसरे शब्दों में, ऐसा लगता है कि वह गहरी नींद में चले गए थे… केवल अपील दायर करना या ज्ञापन देना मृत वाद कारण (dead cause of action) को पुनर्जीवित नहीं कर सकता।”
4. वरिष्ठता और प्राकृतिक न्याय सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण का समर्थन किया कि 19 साल बाद पिछली तारीख से दी गई पदोन्नति ने उस दौरान नियुक्त हुए अन्य कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची को अवैध रूप से बाधित किया। कोर्ट ने नोट किया कि प्रभावित कर्मचारियों को न तो पक्षकार बनाया गया था और न ही अपीलीय प्राधिकारी ने उनकी सुनवाई की थी, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ था।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपीलकर्ता को निर्देश दिया कि वह आठ सप्ताह के भीतर हरियाणा राज्य के ‘मुख्यमंत्री राहत कोष’ में 10,000 रुपये का जुर्माना जमा करे।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: तरुण गागट बनाम राकेश कुमार व अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2026 (@SLP (C) No. 68 of 2026)
- कोरम: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले

