साइबर अपराध मामलों में बैंक खातों के फ्रीज-डिफ्रीज पर SOP बनाने की मांग वाली याचिका CJI सूर्यकांत की पीठ के पास भेजी गई

सुप्रीम कोर्ट ने साइबर अपराध जांच के दौरान बैंक खातों को फ्रीज और डिफ्रीज करने को लेकर केंद्र सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को एक मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure – SOP) बनाने की मांग पर दाखिल याचिका मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के पास भेजने का निर्देश दिया है।

न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने यह आदेश तब दिया जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल कौशिक ने कोर्ट को बताया कि डिजिटल गिरफ्तारी से संबंधित एक सुओ मोटू मामला पहले से ही मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष लंबित है, जिसमें यही मुद्दा विचाराधीन है।

कोर्ट ने 16 जनवरी के अपने आदेश में कहा –

“चूंकि प्रार्थनाएं ‘बी’ और ‘सी’ पहले से ही इस न्यायालय की एक अन्य पीठ के समक्ष विचाराधीन हैं, इसलिए रजिस्ट्री को निर्देश दिया जाता है कि वह भारत के मुख्य न्यायाधीश से उचित आदेश प्राप्त करे और इस मामले को उपयुक्त पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करे।”

यह याचिका विवेक वर्शिने द्वारा अधिवक्ता तुषार मनोहर खैरनार के माध्यम से दायर की गई थी। याचिका में साइबर सेल द्वारा बिना पूर्व सूचना या वैधानिक प्रक्रिया के बैंक खाता फ्रीज करने की कार्रवाई को चुनौती दी गई है।

READ ALSO  झूठी FIR दर्ज करने और बलात्कार के झूठे गंभीर आरोप लगाने की प्रथा को अनुमति नहीं दी जा सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 10,000/- का जुर्माना लगाया

याचिका में दो मुख्य मांगें की गई हैं:

  • प्रार्थना बी: कोई भी खाता बिना लिखित और कारणयुक्त आदेश के फ्रीज न किया जाए, और खाता धारक को इस कार्रवाई की सूचना 24 घंटे के भीतर दी जाए। साथ ही, हर फ्रीजिंग आदेश को BNSS की धारा 106(3) या दंप्रस संहिता की धारा 102(3) के तहत तुरन्त क्षेत्रीय मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट किया जाए।
  • प्रार्थना सी: केंद्र सरकार और RBI को निर्देश दिया जाए कि वे साइबर अपराध जांच के दौरान बैंक खातों के फ्रीज-डिफ्रीज के लिए एक समान SOP तैयार करें जिससे देशभर में एकसमान प्रक्रिया और न्याय सुनिश्चित हो सके।
READ ALSO  Supreme Court Quashes Attempt to Murder Case to Save Marriage; Accepts Husband’s Undertaking to Care for Wife and Child

याचिकाकर्ता का आरोप है कि तमिलनाडु पुलिस की साइबर सेल ने बिना किसी पूर्व सूचना या न्यायिक आदेश के उनका बैंक खाता फ्रीज कर दिया। इससे उन्हें करों के भुगतान और आवश्यक खर्चों को पूरा करने में असमर्थता के कारण भारी वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

याचिका में कहा गया है कि:

“देश में ऐसी कोई एकरूप प्रक्रिया नहीं है जिससे यह तय हो कि कब और कैसे किसी खाते को फ्रीज या डिफ्रीज किया जा सकता है। इससे आम नागरिकों को मनमाने रवैये का शिकार होना पड़ता है।”

वर्शिने ने यह भी दलील दी कि जब तक यह साबित न हो जाए कि खाता धारक अपराध में संलिप्त है, तब तक केवल संदेहजनक लेन-देन के आधार पर उसका पूरा खाता या संपूर्ण राशि फ्रीज नहीं की जानी चाहिए।

याचिका में गृह मंत्रालय को यह निर्देश देने की भी मांग की गई है कि ऐसी कार्रवाई में पूरे देश के लिए एकसमान नीति और SOP बनाएं ताकि आम नागरिकों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाया जा सके।

READ ALSO  आश्रय गृहों में भोजन: दिल्ली हाई कोर्ट ने निर्देशों के बावजूद DUSIB सीईओ की अनुपस्थिति पर आपत्ति जताई

सुनवाई के आरंभ में एएसजी कौशिक ने बताया कि केंद्र सरकार ने याचिकाकर्ता का खाता फ्रीज नहीं किया है। हालांकि, अदालत ने व्यापक महत्व को देखते हुए मामले को उसी पीठ के पास भेजने का निर्णय लिया जो डिजिटल गिरफ्तारी से जुड़े पहलुओं पर विचार कर रही है।

शीर्ष अदालत ने 6 जनवरी को इस याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया था और तीन दिनों के भीतर याचिका की प्रति उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था।

अब यह मामला उस सुओ मोटू याचिका के साथ जोड़ा जाएगा जिसमें डिजिटल गिरफ्तारी और साइबर अपराध जांच के दौरान मौलिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ी प्रक्रियाओं पर विचार हो रहा है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles