मुआवजा सजा का विकल्प नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के प्रयास मामले में सजा को ‘बिताई गई अवधि’ तक सीमित करने वाले हाईकोर्ट के आदेश को रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया है जिसमें अतिरिक्त मुआवजे के भुगतान पर दो दोषियों की तीन साल की कठोर कारावास की सजा को उनके द्वारा पहले से जेल में बिताई गई अवधि (दो महीने) तक कम कर दिया गया था। जस्टिस विजय बिश्नोई और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने कहा कि मुआवजे को सजा के विकल्प के रूप में देखना एक “गलत समझ” है, जो स्थापित आपराधिक न्यायशास्त्र का अपमान (travesty) है।

मामले में मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या हाईकोर्ट धारा 307 आईपीसी (हत्या का प्रयास) के तहत दी गई तीन साल की सजा को केवल दो महीने तक कम करने के लिए न्यायसंगत था, वह भी केवल समय बीतने और दोषियों द्वारा पीड़ित के परिवार को ₹1,00,000 मुआवजा देने की इच्छा के आधार पर। सुप्रीम कोर्ट ने इसका नकारात्मक उत्तर देते हुए कहा कि सजा अपराध की गंभीरता के अनुरूप होनी चाहिए और इसे “पैसे से खरीदा” नहीं जा सकता। शीर्ष अदालत ने निचली अदालत की सजा को बहाल करते हुए दोषियों को चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 6 जून, 2009 की एक घटना से जुड़ा है, जहाँ पुरानी दुश्मनी के चलते निजी प्रतिवादियों (प्रतिवादी संख्या 2 और 3) ने चाकू से हमला कर पीड़ित को गंभीर चोटें पहुंचाई थीं। चिकित्सा साक्ष्य के अनुसार पीड़ित को छाती, पसलियों, पेट और हाथ पर चार गहरे घाव लगे थे, जो समय पर उपचार न मिलने की स्थिति में जानलेवा साबित हो सकते थे।

28 नवंबर, 2013 को ट्रायल कोर्ट (असिस्टेंट सेशन्स जज, शिवगंगई) ने प्रतिवादियों को आईपीसी की धारा 307, 326 और 324 के तहत दोषी ठहराते हुए तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस सजा की पुष्टि 23 फरवरी, 2016 को जिला सत्र फास्ट ट्रैक महिला कोर्ट, शिवगंगई द्वारा की गई थी।

मद्रास हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन लंबित रहने के दौरान पीड़ित की मृत्यु हो गई (अन्य कारणों से)। हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा को जेल में बिताई गई अवधि (लगभग 2 महीने) तक संशोधित कर दिया और मुआवजे की राशि को ₹50,000-₹50,000 कर दिया। पीड़ित की पत्नी (अपीलकर्ता) ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि सजा में कमी अवैध है और सजा अपराध की गंभीरता के अनुपात में होनी चाहिए। मध्य प्रदेश राज्य बनाम सुरेश (2019) मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि केवल समय का बीतना सजा कम करने का आधार नहीं हो सकता।

तमिलनाडु राज्य की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल ने अपीलकर्ता का समर्थन किया और कहा कि हाईकोर्ट ने “अनुचित सहानुभूति” दिखाई है और सजा कम करने का कोई ठोस कारण नहीं बताया, जिससे कानून की प्रभावकारिता में जनता का विश्वास कम हो सकता है।

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वहीं दोषियों (निजी प्रतिवादियों) का तर्क था कि हाईकोर्ट ने घटना के बाद से बीते 10 वर्षों के समय, उनके बेदाग पूर्ववृत्त और मुआवजे के भुगतान की उनकी इच्छा को सुधार के अवसर के रूप में सही ढंग से देखा है।

अदालत का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि उसने “कानून की पूर्ण अवहेलना” में काम किया है। पीठ ने दंडशास्त्र (Penology) के प्रमुख सिद्धांतों पर प्रकाश डाला:

1. प्रतिशोध बनाम निवारण: अदालत ने टिप्पणी की: “दंड का उद्देश्य अपराध का बदला लेना नहीं है, बल्कि यह समाज के क्षतिग्रस्त सामाजिक ताने-बाने को पुनर्गठित करने का एक प्रयास है।”

2. आनुपातिकता (Proportionality): हजारा सिंह बनाम राज कुमार (2013) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि सजा अपराध को प्रतिबिंबित करनी चाहिए। कोर्ट ने नोट किया कि धारा 307 आईपीसी के तहत जहाँ अधिकतम सजा दस साल है, वहां तीन साल की सजा पहले से ही काफी उदार थी।

3. मुआवजा ‘ब्लड मनी’ नहीं है: बेंच ने मुआवजे और सजा के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा:

“पीड़ित मुआवजे का प्रावधान सुनाई गई सजा या दंड का विकल्प नहीं है… इसे सजा के बराबर या उसके स्थान पर नहीं माना जा सकता। सजा प्रकृति में दंडात्मक है… इसे केवल ‘पैसे से नहीं खरीदा जा सकता’।”

अदालत ने शिवानी त्यागी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024) का हवाला दिया, जहाँ उसने सजा कम कराने के लिए दिए जाने वाले पैसों को “ब्लड मनी” (रक्त मूल्य) की संज्ञा दी थी, जिसकी भारतीय न्याय प्रणाली में कोई स्वीकार्यता नहीं है।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के सजा कम करने वाले आदेश को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट के 2013 के फैसले को बहाल किया।

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“हम निर्देश देते हैं कि निजी प्रतिवादी आज से चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करें और उन्हें दी गई सजा का शेष हिस्सा काटें।”

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अपर्याप्त सजा देने वाली “अनुचित सहानुभूति” न्याय प्रशासन को कमजोर करती है। यह अनिवार्य है कि “न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।”

केस का शीर्षक: परमेश्वरी बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य

केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या ___/2026 (एस.एल.पी. (क्रिमिनल) संख्या 7495/2021 से उत्पन्न) 

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