सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के दोषी को बरी किया, एकमात्र चश्मदीद की गवाही को बताया “अविश्वसनीय” और सबूतों का अभाव

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 2004 के एक हत्या के मामले में आरोपी की सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ मामले को ‘उचित संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने में विफल रहा। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने पाया कि एकमात्र चश्मदीद गवाह की गवाही “इतनी उच्च गुणवत्ता की नहीं” थी कि केवल उसके आधार पर किसी को दोषी ठहराया जा सके, विशेष रूप से तब जब अन्य घायल गवाहों ने घटना के समय अंधेरा होने की बात कही हो।

शीर्ष अदालत ने अंजनी सिंह द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए उन्हें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 307 और 504 के तहत आरोपों से बरी कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 5 जुलाई, 2019 के फैसले को पलट दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 20 अक्टूबर, 2004 का है, जब एक गांव में दुर्गा प्रतिमा की स्थापना के लिए एक समारोह आयोजित किया गया था और उसके बाद एक नाटक का मंचन हो रहा था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि नाटक के दौरान अपीलकर्ता अंजनी सिंह ने शिकायतकर्ता अनुग्रह नारायण सिंह (PW-1) के बेटे के साथ मारपीट की। जब PW-1 ने इसका विरोध किया, तो अंजनी नाराज होकर वहां से चला गया।

आरोप था कि रात करीब 9:00 बजे अंजनी हाथ में तमंचा (देसी पिस्तौल) लेकर अपने भाई रविंद्र सिंह (जिसके पास लाइसेंसी राइफल थी) और पिता ऋषभ देव सिंह (जिसके पास लाठी थी) के साथ वापस आया। आरोपियों ने कथित तौर पर एक-दूसरे को PW-1 को जान से मारने के लिए उकसाया। इसके बाद रविंद्र और अंजनी ने गोलीबारी शुरू कर दी, जिससे PW-1 और कई अन्य लोग घायल हो गए, जिनमें हरेंद्र कुमार यादव, मृत्युंजय कुमार यादव, विमलेश दुबे और उमेश कुमार ठाकुर शामिल थे। इस गोलीबारी में दो व्यक्तियों, कृष्ण कांत वर्मा और बनारसी, की मौके पर ही मौत हो गई थी।

ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया था। अपील पर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऋषभ देव सिंह को बरी कर दिया लेकिन अंजनी सिंह और रविंद्र सिंह की सजा को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट में अपील के लंबित रहने के दौरान रविंद्र सिंह की मृत्यु हो गई, जिससे उनकी अपील समाप्त हो गई। यह वर्तमान अपील केवल अंजनी सिंह के संबंध में थी।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (अंजनी सिंह) के वकील ने तर्क दिया कि अभियोजन का पूरा मामला पूरी तरह से PW-1 की आंखों देखी गवाही पर टिका है, जो विश्वसनीय नहीं है। यह दलील दी गई कि अन्य घायल गवाहों ने गवाही दी है कि घटना के समय लाइट बंद थी, जिससे पहचान करना असंभव था। बचाव पक्ष ने राइफल की बरामदगी में विसंगतियों को भी उजागर किया और बताया कि मौके से बरामद मैगजीन जब्त की गई राइफल से मेल नहीं खाती थी। इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि PW-1 का आपराधिक इतिहास रहा है और उसे लगी चोटें सतही प्रतीत होती हैं।

इसके विपरीत, राज्य (उत्तर प्रदेश सरकार) ने तर्क दिया कि एफआईआर (FIR) तत्काल दर्ज की गई थी और उसमें सभी आरोपियों के नाम थे। राज्य के वकील ने कहा कि PW-1 एक घायल गवाह है और उसकी गवाही घटना के समय और स्थान तथा अपीलकर्ता की भागीदारी के संबंध में सुसंगत थी। यह भी कहा गया कि पक्षद्रोही (Hostile) गवाहों ने अभियोजन के मामले के मूल आधार को नुकसान नहीं पहुंचाया है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों की विस्तृत जांच की और पाया कि PW-1 के अलावा किसी अन्य चश्मदीद गवाह ने अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया। कोर्ट ने नोट किया कि अन्य घायल गवाहों ने लगातार बयान दिया कि अंधाधुंध गोलीबारी के समय “लाइट चली गई थी”।

एकमात्र चश्मदीद (PW-1) की विश्वसनीयता पर: पीठ ने PW-1 की गवाही को “ढुलमुल” (wavering) और असंगत पाया। कोर्ट ने गोलीबारी के स्थान और अपीलकर्ता की विशिष्ट भूमिका के बारे में विरोधाभासों को नोट किया। जस्टिस मिश्रा ने पीठ के लिए फैसला लिखते हुए कहा:

“PW-1 की ढुलमुल गवाही हमारे विश्वास को नहीं जगाती है… हालांकि राइफल से रविंद्र द्वारा गोलीबारी का विशेष रूप से आरोप लगाया गया है, लेकिन किसी विशेष व्यक्ति को निशाना बनाने के लिए अंजनी द्वारा पिस्तौल से गोली चलाने का कोई विशिष्ट आरोप नहीं है, बल्कि गवाही इस आशय की है कि अंजनी ने उन लोगों पर कोई गोली नहीं चलाई जो उसके भाई की राइफल छीनने की कोशिश कर रहे थे।”

कोर्ट ने आगे टिप्पणी की कि यह समझ से परे है कि आरोपी उन दो निर्दोष व्यक्तियों को मारने के लिए अंधाधुंध गोलीबारी क्यों करेंगे जिनके खिलाफ कोई दुश्मनी (motive) नहीं दिखाई गई थी, खासकर यदि PW-1 ही एकमात्र निशाना था।

रोशनी का अभाव: कोर्ट ने अन्य गवाहों की गवाही को महत्वपूर्ण माना जिन्होंने कहा था कि घटना के दौरान अंधेरा था। फैसले में कहा गया:

“गौरतलब है कि PW-1 के अलावा अन्य गवाह इस बात पर एकमत हैं कि गोलीबारी के समय लाइट चली गई थी… अंधेरा सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा तरीका लाइट बंद करना है, और जहां बिजली की आपूर्ति जनरेटर से होती है, वहां इसे बंद करना आसान है। दिलचस्प बात यह है कि घटना में जनरेटर ऑपरेटर मारा गया।”

फोरेंसिक सबूतों में विसंगतियां: कोर्ट ने हथियार के संबंध में अभियोजन के सबूतों में एक महत्वपूर्ण खामी को उजागर किया। मौके से बरामद एक मैगजीन सह-आरोपी रविंद्र से जब्त की गई राइफल से मेल नहीं खाती थी। कोर्ट ने कहा:

“मौके से बरामद मैगजीन को जब्त की गई राइफल से फोरेंसिक रूप से नहीं जोड़ा जा सका… यह अभियोजन पक्ष के उस सिद्धांत पर संदेह पैदा करता है कि गोलियां किसी और पर चलाई गई थीं लेकिन संयोग से वे दो मृतकों को लग गईं।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों द्वारा अपीलकर्ता को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) दिया जाना चाहिए था।

“ऐसी परिस्थितियों में, संपूर्ण साक्ष्यों पर विचार करते हुए और इस तथ्य को देखते हुए कि PW-1 को छोड़कर किसी भी चश्मदीद गवाह ने अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया है और लगातार यह बयान दिया है कि घटना के समय कोई रोशनी नहीं थी, हमारे विचार में, यह एक ऐसा मामला था जहां अपीलकर्ता को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए था।”

तदनुसार, अपील स्वीकार कर ली गई और अंजनी सिंह की सजा को रद्द कर दिया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि उनके जमानत बांड (Bail Bonds) को डिस्चार्ज कर दिया जाए।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: अंजनी सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 591 ऑफ 2020 (2026 INSC 3)
  • कोरम: जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस जॉयमाल्या बागची

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