‘गाली देना’ अश्लीलता नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “बास्टर्ड” जैसे शब्दों का इस्तेमाल अश्लीलता की श्रेणी में नहीं आता

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि गरमागरम बहस या झगड़े के दौरान “बास्टर्ड” (Bastard) जैसे अपशब्दों का प्रयोग भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294(b) के तहत ‘अश्लीलता’ नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि आधुनिक दौर में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल केवल अशिष्टता या अभद्रता हो सकता है, लेकिन यह किसी व्यक्ति की कामुक भावनाओं (Prurient Interest) को उत्तेजित नहीं करता।

जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया जिसमें आरोपियों को अश्लील भाषा के इस्तेमाल के लिए दोषी ठहराया गया था। इसके साथ ही, कोर्ट ने एक जमीन विवाद से जुड़े गैर-इरादतन हत्या (Culpable Homicide) के मामले में सजा को भी कम कर दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 20 सितंबर, 2014 का है, जो तिरुविदमरुदुर पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में हुआ था। यह विवाद सगे भाइयों, गणेशन और कालियामूर्ति के बीच की साझा सीमा (Boundary) को लेकर था। अपीलकर्ता सेंथिल (A-1, गणेशन का बेटा) और शिवकुमार (A-2, गणेशन का दामाद) हैं।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, विवाद तब शुरू हुआ जब कालियामूर्ति ने विरोध के बावजूद बाड़ (Fence) लगाने की कोशिश की। इस दौरान हुई हाथापाई में सेंथिल (A-1) ने एक ‘अरुवल’ (खेती का औजार) से हमला किया, जिससे मृतक के भाई को चोटें आईं। वहीं शिवकुमार (A-2) ने कालियामूर्ति के सिर पर लकड़ी के लट्ठे से वार किया, जिससे इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।

निचली अदालत ने शिवकुमार (A-2) को धारा 325 (गंभीर चोट पहुँचाना) के तहत दोषी ठहराया था, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे बदलकर धारा 304 पार्ट II (गैर-इरादतन हत्या) कर दिया और 5 साल की सजा सुनाई।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि धारा 294(b) के तहत अश्लीलता का कोई मामला नहीं बनता। हत्या के आरोपों पर उन्होंने दलील दी कि आरोपियों का इरादा जान लेने का नहीं था; यह घटना अचानक उपजे गुस्से और “क्षण भर के आवेश” का परिणाम थी।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि “बास्टर्ड” जैसे शब्द का प्रयोग धारा 294(b) को लागू करने के लिए पर्याप्त है। राज्य ने यह भी कहा कि चूंकि हमला सेंथिल ने शुरू किया था, इसलिए धारा 34 (समान मंशा) के तहत दोनों आरोपी समान रूप से जिम्मेदार हैं।

कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

अश्लीलता पर (धारा 294(b) IPC): कोर्ट ने ‘अश्लीलता’ की व्याख्या करते हुए अपूर्वा अरोड़ा बनाम राज्य मामले का संदर्भ दिया। खंडपीठ ने टिप्पणी की:

“यह अच्छी तरह से स्थापित है कि अभद्रता और अपशब्द अपने आप में अश्लीलता नहीं हैं। हालांकि कोई व्यक्ति अभद्र भाषा को अरुचिकर, अभद्र और अनुचित मान सकता है, लेकिन केवल यही ‘अश्लील’ होने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे शब्द घृणा या सदमा तो पैदा कर सकते हैं, लेकिन इनका प्रभाव कामुक विचारों को जगाना नहीं होता, जो कि अश्लीलता की कानूनी परिभाषा के लिए आवश्यक है।

समान मंशा पर (धारा 34 IPC): सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि सेंथिल (A-1) की मंशा कालियामूर्ति की हत्या करने की नहीं थी। कोर्ट ने उल्लेख किया कि सेंथिल का हमला दूसरे व्यक्ति पर था और ऐसा कोई सबूत नहीं है कि उसने शिवकुमार को मृतक पर वार करने के लिए उकसाया हो। इसलिए, उसे हत्या के आरोप से मुक्त कर दिया गया।

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सजा में कटौती (धारा 304 पार्ट II IPC): शिवकुमार (A-2) के मामले में कोर्ट ने माना कि उसने सिर पर वार किया था, जिससे उसे पता होना चाहिए था कि इससे मृत्यु हो सकती है। हालांकि, यह देखते हुए कि घटना 2014 की है, दोनों पक्ष करीबी रिश्तेदार हैं और हमला मौके पर पड़ी लकड़ी से किया गया था, कोर्ट ने 5 साल की कठोर कारावास की सजा को घटाकर 3 साल कर दिया।

अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:

  1. धारा 294(b) से बरी: अश्लील शब्दों के इस्तेमाल के लिए दोनों अपीलकर्ताओं की सजा रद्द कर दी गई।
  2. अपीलकर्ता सेंथिल (A-1): उसकी धारा 324 (चोट पहुँचाना) की सजा बरकरार रखी गई, लेकिन इसे ‘पहले से काटी गई जेल अवधि’ (लगभग 1 महीना 25 दिन) तक सीमित कर दिया गया।
  3. अपीलकर्ता शिवकुमार (A-2): गैर-इरादतन हत्या के लिए उसकी दोषसिद्धि बरकरार रही, लेकिन सजा 5 साल से घटाकर 3 साल कर दी गई। उसे शेष सजा काटने के लिए आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया।
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मामले का विवरण

  • केस का नाम: शिवकुमार बनाम स्टेट (इंस्पेक्टर ऑफ पुलिस द्वारा प्रतिनिधित्व)
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1807/2019 एवं 677/2020
  • पीठ: जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा
  • दिनांक: 06 अप्रैल, 2026

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