बाबरी मस्जिद पर सोशल मीडिया पोस्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कानून स्नातक मोहम्मद फैज़ मंसूरी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया। मंसूरी पर 2020 में सोशल मीडिया पर यह पोस्ट करने के लिए मुकदमा दर्ज किया गया था कि “एक दिन बाबरी मस्जिद दोबारा बनाई जाएगी।”

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि उसने पोस्ट को देखा है और वह इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती।

अगस्त 2020 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने मंसूरी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। उन्होंने एक पोस्ट में लिखा था कि “बाबरी मस्जिद एक दिन फिर बनाई जाएगी” और तुर्की में बनी एक मस्जिद का उदाहरण दिया था।
याचिकाकर्ता का कहना था कि उसी पोस्ट पर किसी अन्य व्यक्ति ने आपत्तिजनक टिप्पणी की थी, लेकिन जांच केवल उनके खिलाफ हुई।

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इस पोस्ट के बाद लखीमपुर खीरी के जिलाधिकारी ने उनके खिलाफ निरोधात्मक गिरफ्तारी का आदेश जारी किया था, जिसे बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया।

हालांकि, इस साल की शुरुआत में ट्रायल कोर्ट ने उनके खिलाफ दायर आरोपपत्र पर संज्ञान ले लिया। मंसूरी ने फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता तल्हा अब्दुल रहमान ने मंसूरी की ओर से दलील दी कि पोस्ट में कोई अश्लीलता या भड़काऊ भाषा नहीं थी। उन्होंने केवल यह कहा था कि बाबरी मस्जिद भी तुर्की की एक मस्जिद की तरह दोबारा बनाई जाएगी।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि असल में आपत्तिजनक टिप्पणी किसी और व्यक्ति ने की थी, लेकिन जांच केवल मंसूरी के खिलाफ की गई।

हालांकि, पीठ ने दलीलों पर सहमति नहीं जताई। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने वकील से कहा, “हमसे कोई कठोर टिप्पणी कहलवाने की नौबत मत लाइए।”

यह सुनकर वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी।

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पीठ ने आदेश में दर्ज किया:

“कुछ समय तक बहस के बाद, याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जो स्वीकार की जाती है। विशेष अनुमति याचिका, तदनुसार, वापस ली गई मानकर खारिज की जाती है। यह स्पष्ट किया जाता है कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए जाने वाले सभी बचाव तर्कों पर विचार ट्रायल कोर्ट उनके अपने गुण-दोष के आधार पर करेगा।”

सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद अब मंसूरी को उत्तर प्रदेश की निचली अदालत में मुकदमे का सामना करना होगा। शीर्ष अदालत ने यह संकेत दिया कि इस चरण पर हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है और कार्यवाही जारी रहेगी।

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