सुप्रीम कोर्ट ने आर्बिट्रेशन कानून में लंबे समय से चली आ रही एक बड़ी दुविधा को समाप्त कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 29A के तहत आर्बिट्रेटर (मध्यस्थ) का कार्यकाल बढ़ाने की शक्ति “प्रधान सिविल कोर्ट” (Principal Civil Court) के पास है, भले ही उस आर्बिट्रेटर की नियुक्ति धारा 11 के तहत हाईकोर्ट द्वारा ही क्यों न की गई हो।
जस्टिस पमिदीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि कानून का स्रोत ‘कानून’ खुद है, न कि अदालतों का पद या रुतबा। कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि चूंकि आर्बिट्रेटर की नियुक्ति ‘हाईकोर्ट’ ने की है, इसलिए एक ‘निचली’ सिविल कोर्ट उसका कार्यकाल नहीं बढ़ा सकती।
क्या था मामला?
यह विवाद ‘चौगुले’ (Chowgule) परिवार के बीच हुए एक पारिवारिक समझौते (Memorandum of Family Settlement) से जुड़ा था। जब विवाद बढ़ा, तो मामला आर्बिट्रेशन में गया।
मामले के तथ्य कुछ इस प्रकार थे:
- आर्बिट्रेशन की कार्यवाही समय पर पूरी नहीं हो सकी, जिसके बाद धारा 29A के तहत समय सीमा बढ़ाने के लिए कमर्शियल कोर्ट (प्रधान सिविल कोर्ट) में अर्जी दी गई।
- इसी बीच, मुख्य आर्बिट्रेटर के इस्तीफा देने के कारण, हाईकोर्ट ने धारा 11 के तहत एक नए आर्बिट्रेटर की नियुक्ति कर दी।
- कमर्शियल कोर्ट ने धारा 29A के तहत समय बढ़ाने की अर्जी मंजूर कर ली।
- दूसरे पक्ष ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि चूंकि आर्बिट्रेटर की नियुक्ति हाईकोर्ट ने की है, तो कमर्शियल कोर्ट (जो हाईकोर्ट से अधीनस्थ है) उसका कार्यकाल कैसे बढ़ा सकती है?
बॉम्बे हाईकोर्ट (गोवा बेंच) ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कमर्शियल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि धारा 11 के तहत हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त आर्बिट्रेटर के मामले में समय बढ़ाने का अधिकार भी केवल हाईकोर्ट के पास होना चाहिए।
दो विचारधाराओं का टकराव
सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि देश के विभिन्न हाईकोर्ट्स में इस मुद्दे पर दो अलग-अलग राय थीं:
- पहली राय: इलाहाबाद और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का मानना था कि आर्बिट्रेटर चाहे किसी ने भी नियुक्त किया हो, कार्यकाल बढ़ाने के लिए ‘कोर्ट’ वही होगी जो धारा 2(1)(e) में परिभाषित है (यानी प्रधान सिविल कोर्ट)।
- दूसरी राय: गुजरात, बॉम्बे, दिल्ली और कलकत्ता हाईकोर्ट का मानना था कि अगर हाईकोर्ट आर्बिट्रेटर नियुक्त करता है, तो सिविल कोर्ट उसका कार्यकाल नहीं बढ़ा सकती। उनका तर्क था कि इससे ‘क्षेत्राधिकार संबंधी विसंगति’ (Jurisdictional Anomaly) पैदा होगी क्योंकि एक अधीनस्थ कोर्ट (Civil Court), हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त व्यक्ति को हटा या बदल नहीं सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “अदालत कोई ‘बिग ब्रदर’ नहीं है”
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए दूसरी विचारधारा को खारिज कर दिया। पीठ ने कहा कि धारा 11 के तहत नियुक्ति की शक्ति और धारा 29A के तहत कार्यवाही की निगरानी की शक्ति बिल्कुल अलग है।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ:
- नियुक्ति के बाद कोर्ट का काम खत्म: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार जब धारा 11 के तहत आर्बिट्रेटर नियुक्त हो जाता है, तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ‘फंक्टस ऑफिसियो’ (Functus Officio) हो जाते हैं, यानी उनका काम खत्म हो जाता है। कोर्ट ने जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास का हवाला देते हुए दिलचस्प टिप्पणी की:
“यह मानना गलत है कि सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट आर्बिट्रेशन की कार्यवाही पर ‘बिग ब्रदर’ (Big Brother) की तरह नजर रखते हैं। नियुक्ति के बाद रेफ़रल कोर्ट की भूमिका समाप्त हो जाती है।” - कानून सर्वोपरि है, पद नहीं: कोर्ट ने कहा कि यह तर्क देना कि “सिविल कोर्ट हाईकोर्ट से छोटी है इसलिए वह फैसला नहीं ले सकती”, कानून के शासन के खिलाफ है। धारा 29A में जिस ‘कोर्ट’ का जिक्र है, वह धारा 2(1)(e) के अनुसार प्रधान सिविल कोर्ट ही है।
- धारा 42 लागू नहीं होती: कोर्ट ने यह भी साफ किया कि धारा 11 के तहत हाईकोर्ट में अर्जी देने का मतलब यह नहीं है कि बाद की सारी अर्जियां (जैसे समय बढ़ाना) भी हाईकोर्ट में ही जाएंगी।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और कमर्शियल कोर्ट के उस आदेश को बहाल कर दिया जिसमें समय सीमा बढ़ाई गई थी। अब यह तय हो गया है कि आर्बिट्रेशन में समय विस्तार के लिए पार्टियों को प्रधान सिविल कोर्ट या कमर्शियल कोर्ट ही जाना होगा, भले ही आर्बिट्रेटर की नियुक्ति हाईकोर्ट ने की हो।
केस विवरण (Case Details)
- केस का नाम: जगदीप चौगुले बनाम शीला चौगुले व अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2026 (SLP (C) No. 10944-10945 of 2025 से उद्भूत)
- कोरम: जस्टिस पमिदीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन

