सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत के लिए 9 लाख रुपये से अधिक की राशि जमा करने की शर्त रखने (imposing condition) पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेशों को “बेहद असामान्य” और स्थिति को “बेहद दुर्भाग्यपूर्ण” करार दिया।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने प्रांतिक कुमार और अन्य बनाम झारखंड राज्य और अन्य के मामले में स्पष्ट किया कि नियमित जमानत या अग्रिम जमानत देते समय आरोपी पर किसी भी राशि को जमा करने की शर्त नहीं थोपी जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट की शर्त को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं (पिता-पुत्र) को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ताओं ने झारखंड हाईकोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। यह मामला आदित्यपुर पुलिस स्टेशन में 10 जून 2023 को दर्ज एफआईआर संख्या 0184 से संबंधित है।
यह एफआईआर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी), 504 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान), 506 (आपराधिक धमकी) और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत दर्ज की गई थी।
विवाद का मूल एक व्यावसायिक लेनदेन था, जिसमें क्राफ्ट पेपर की खरीद शामिल थी। शिकायतकर्ता, जो एक विक्रेता है, का आरोप था कि याचिकाकर्ताओं पर लगभग 9,00,000 रुपये की राशि बकाया है। इसी आधार पर धोखाधड़ी और अन्य अपराधों के आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
हाईकोर्ट के “असामान्य” आदेश
याचिकाकर्ताओं ने पहले सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि हाईकोर्ट ने जमानत याचिका और उससे जुड़ी एक अन्य याचिका (Cr.M.P.) पर “दो बेहद असामान्य आदेश” पारित किए।
13 जनवरी 2025 के अपने आदेश में, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे शिकायतकर्ता को 9,12,926.84 रुपये के भुगतान का प्रमाण देते हुए एक पूरक हलफनामा दायर करें। आदेश में स्पष्ट कहा गया:
“यह स्पष्ट किया जाता है कि यदि उक्त आदेश की तारीख से दो सप्ताह के भीतर पूरक हलफनामा दायर नहीं किया जाता है, तो यह अग्रिम जमानत आवेदन बिना किसी संदर्भ के खारिज मान लिया जाएगा।”
इसी तरह, 14 नवंबर 2025 को Cr.M.P. पर पारित आदेश में भी हाईकोर्ट ने भुगतान का सबूत पेश करने के लिए समय दिया और चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर याचिका खारिज कर दी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण पर कड़ी आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के गजानन दत्तात्रेय गोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2025) के फैसले से पूरी तरह अनजान रहा, जिसमें इस मुद्दे पर स्पष्ट कानून तय किया गया था।
जस्टिस पारदीवाला ने पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए कहा:
“यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस कोर्ट द्वारा स्पष्ट शब्दों में यह कहे जाने के बावजूद कि नियमित जमानत या अग्रिम जमानत किसी भी राशि को जमा करने की शर्त के अधीन नहीं होनी चाहिए, हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को 9,12,926.84 रुपये की शेष राशि जमा करनी चाहिए।”
गजानन दत्तात्रेय गोरे मामले के अपने पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कानूनी स्थिति स्पष्ट की:
“हमने अपने उपरोक्त निर्णय में स्पष्ट किया था कि यदि जमानत या अग्रिम जमानत का मामला बनता है, तो कोर्ट को उचित आदेश पारित करना चाहिए और यदि नहीं बनता है, तो कोर्ट इनकार कर सकता है। लेकिन, कोर्ट को किसी विशेष राशि को जमा करने का सशर्त आदेश पारित करके अपने विवेक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।”
निर्णय
तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार कर लिया और याचिकाकर्ताओं को राहत प्रदान की।
कोर्ट ने निर्देश दिया:
“इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, हम निर्देश देते हैं कि उपरोक्त एफआईआर के संबंध में याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी की स्थिति में, उन्हें उन नियमों और शर्तों पर जमानत पर रिहा किया जाएगा जो जांच अधिकारी लगाना उचित समझें।”
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस आदेश की एक प्रति झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए, जो इसे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के समक्ष रखेंगे। यह निर्देश संभवतः इसलिए दिया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में न्यायिक अधिकारी जमानत की शर्तों के रूप में पैसे जमा करने का आदेश देने से बचें।
केस विवरण
- केस टाइटल: प्रांतिक कुमार और अन्य बनाम झारखंड राज्य और अन्य
- केस नंबर: स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) डायरी संख्या 4297/2026
- कोरम: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और य न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन

