सिविल पद के लिए आवेदन से पहले वायु सेना कर्मियों के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य, यह महज औपचारिक प्रक्रिया नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सशस्त्र बलों के कर्मियों की सेवा शर्तों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया है कि एयर फोर्स ऑर्डर (एएफओ) संख्या 33/2017 के तहत किसी नागरिक (सिविल) पद के लिए आवेदन करने से पहले भारतीय वायु सेना (आईएएफ) के प्राधिकारी से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है। शीर्ष अदालत ने माना कि इस नियम का पालन न करने को केवल एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता मानकर माफ नहीं किया जा सकता। असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर चयनित एक एयरमैन की अपील खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि सशस्त्र बल के सदस्यों के पास अपनी मर्जी से जब चाहें सेवा छोड़ने का असीमित अधिकार नहीं होता, और पूर्व अनुमति न मांगने पर अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) तथा सेवा से डिस्चार्ज पाने का कोई अधिकार नहीं बचता।

मामला क्या था?

अपीलकर्ता नखत सिंह भारतीय वायु सेना में कॉर्पोरल के पद पर एयरमैन के रूप में कार्यरत थे। सात वर्ष की न्यूनतम अनिवार्य सेवा पूरी करने के बाद उन्होंने नागरिक सेवा में जाने की इच्छा जताई। चीफ ऑफ द एयर स्टाफ द्वारा जारी एयर फोर्स ऑर्डर (एएफओ) संख्या 33/2017 इस प्रक्रिया को विनियमित करता है, जिसके तहत किसी भी एयरमैन को नागरिक रोजगार के लिए आवेदन करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक है।

नवंबर 2020 में राजस्थान लोक सेवा आयोग ने हिंदी विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए विज्ञापन जारी किया। अपीलकर्ता ने इस पद के लिए आवेदन किया, सितंबर 2021 में आयोजित लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की और सितंबर 2022 में साक्षात्कार में शामिल हुए। 1 अक्टूबर 2022 को उन्हें अपने अंतिम चयन की सूचना मिली। इसके बाद अपीलकर्ता ने 3 अक्टूबर 2022 को वायु सेना के सक्षम प्राधिकारी के समक्ष एनओसी और डिस्चार्ज के लिए आवेदन प्रस्तुत किया ताकि वे असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यभार ग्रहण कर सकें। हालांकि, 14 अक्टूबर 2022 को एयर ऑफिसर कमांडिंग ने उनके अनुरोध की सिफारिश करने से इनकार कर दिया।

इस इनकार से क्षुब्ध होकर अपीलकर्ता ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (एएफटी), नई दिल्ली के समक्ष याचिका दायर की। एएफटी ने पाया कि हालांकि ‘स्किल ग्रेड ए’ की जगह ‘स्किल ग्रेड सी’ होना इनकार का आधार नहीं हो सकता—क्योंकि दिल्ली हाईकोर्ट ने सुभाष चंद बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में ‘स्किल ग्रेड ए’ की शर्त को अमान्य कर दिया था—लेकिन अपीलकर्ता नागरिक पद के लिए आवेदन करने से पहले पूर्व अनुमति प्राप्त करने में विफल रहे थे। एएफटी ने निष्कर्ष निकाला कि सिविल पद के लिए आवेदन करने से पहले कोई ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन प्रस्तुत करने का कोई प्रमाण नहीं था, जिससे एएफओ संख्या 33/2017 के क्लॉज 9, 11 और 12 के तहत एनओसी देने से इनकार करना सही था।

इसके बाद अपीलकर्ता ने एएफटी के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने एएफटी के निष्कर्षों की पुष्टि की, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद नायर ने तर्क दिया कि असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में सफलतापूर्वक चुने जाने के बाद अपीलकर्ता को केवल प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं का पालन न करने के कारण करियर में प्रगति के अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एएफओ संख्या 33/2017 के प्रावधान अनुमति मांगने का तरीका बताते हैं, न कि मूल अधिकारों को नियंत्रित करते हैं। चूंकि ये शर्तें प्रक्रियात्मक प्रकृति की थीं, इसलिए वे निर्देशात्मक थीं और न्याय के हित में उन्हें माफ किया जा सकता था। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के सीपीएल एन.के. जाखड़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और सोनू बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसलों का हवाला दिया।

दूसरी ओर, उत्तरदाताओं का प्रतिनिधित्व कर रही भारत की अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने एएफटी और हाईकोर्ट के फैसलों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि एएफओ संख्या 33/2017 को लागू करने का मुख्य उद्देश्य एयरमेन की व्यक्तिगत आकांक्षाओं और वायु सेना की परिचालन तैयारियों एवं मैनपावर के स्तर के बीच संतुलन बनाए रखना था। उन्होंने ध्यान दिलाया कि एएफओ का क्लॉज 20 स्पष्ट करता है कि पूर्व अनुमति मांगना और एनओसी प्राप्त करना विशेषाधिकार हैं, न कि कोई लागू करने योग्य कानूनी अधिकार। इस तथ्य को देखते हुए कि अपीलकर्ता पूर्व आवेदन या अनुरोध प्रस्तुत करने का कोई प्रमाण नहीं दे सके, एनओसी देने से इनकार करना पूरी तरह से कानूनसम्मत था।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर द्वारा लिखे गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एएफओ संख्या 33/2017 के ढांचे का परीक्षण किया और इस तर्क को खारिज कर दिया कि इसकी अनिवार्य शर्तें केवल प्रक्रियात्मक थीं।

पीठ ने टिप्पणी की कि समय से पहले डिस्चार्ज होने से वायु सेना के विभिन्न ट्रेडों में मैनपावर का स्तर प्रभावित होता है, जिससे सीधे तौर पर परिचालन तत्परता पर असर पड़ता है। सांगठनिक आवश्यकता और व्यक्तिगत करियर आकांक्षाओं के बीच तालमेल बैठाने के लिए एएफओ संख्या 33/2017 में दो चरणों वाली अनुमति संरचना निर्धारित की गई है: पहला, सिविल पद के लिए आवेदन करने से पहले मंजूरी प्राप्त करना, और दूसरा, साक्षात्कार के लिए बुलाए जाने पर या लिखित परिणाम घोषित होने के बाद एनओसी के लिए आवेदन करना।

एएफओ संख्या 33/2017 के नियमों की प्रकृति पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:

“हमारे विचार में, एएफओ संख्या 33/2017 का पूर्ण अध्ययन करने पर यह नहीं कहा जा सकता कि निर्धारित आवश्यकताएं केवल प्रक्रियात्मक प्रकृति की हैं और इसलिए उनका पालन अनिवार्य नहीं है। इन शर्तों को लागू करने के पीछे का उद्देश्य भारतीय वायु सेना से वायु योद्धाओं की समय पूर्व सेवानिवृत्ति को विनियमित करने के उद्देश्य से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।”

सशस्त्र बलों में आवश्यक अनुशासन के मानकों पर बल देते हुए कोर्ट ने कहा:

“सिविल पद के लिए आवेदन करने का प्रयास करने से पहले पूर्व अनुमति मांगने की शर्त और चयन के बाद सक्षम प्राधिकारी द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी किया जाना, केवल साधारण प्रक्रियात्मक आवश्यकताएं नहीं हैं जिन्हें संबंधित एयरमैन की इच्छा पर दरकिनार किया जा सके।”

पीठ ने रेखांकित किया कि एएफओ संख्या 33/2017 का क्लॉज 19 स्पष्ट रूप से निर्देश देता है कि यदि पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी तो एनओसी खारिज कर दी जानी चाहिए। स्पष्ट परिणामों से जुड़ी पूर्व-आवश्यकताओं के कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा:

“यह सुस्थापित नियम है कि यदि किसी निर्धारित पूर्व-आवश्यकता का पालन न करने का परिणाम संबंधित प्रावधान या क्लॉज में स्पष्ट रूप से दर्ज है, तो ऐसी पूर्व-आवश्यकता के पालन को अनिवार्य माना जाएगा। सिविल पद के लिए आवेदन करने हेतु पूर्व अनुमति लेने की पहली शर्त को दरकिनार करके, कोई एयरमैन स्थिति को ‘तथ्य के रूप में घटित’ (fait accompli) पेश नहीं कर सकता और यह तर्क नहीं दे सकता कि चूंकि उसका चयन हो चुका है, इसलिए पूर्व अनुमति की शर्त को पूरी तरह से माफ कर दिया जाए।”

क्या सशस्त्र बल का कोई सदस्य सेवा से त्यागपत्र देने या बाहर निकलने का पूर्ण अधिकार रखता है, इस प्रश्न पर शीर्ष अदालत ने अपने पूर्व निर्णय अमित कुमार रॉय बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का संदर्भ देते हुए दोहराया:

“वायु सेना के सदस्य के रूप में नामांकित व्यक्ति के पास सेवा अवधि के दौरान अपनी इच्छा से सेवा छोड़ने का कोई असीमित अधिकार नहीं होता है। ऐसा व्याख्यात्मक दृष्टिकोण, जैसा कि अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया है, सशस्त्र बलों के जनशक्ति स्तर और परिचालन तैयारियों पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।”

“सेवा के हित सर्वोपरि हैं। सशस्त्र बलों के हितों और नागरिक रोजगार प्राप्त करने के लिए नामांकित व्यक्तियों द्वारा किए गए अनुरोधों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है। यह संतुलन वायु सेना के आदेशों के प्रावधानों में दिखाई देता है। नामांकित व्यक्ति इन आदेशों के उल्लंघन या अवहेलना में कार्य करने के सामान्य अधिकार का दावा नहीं कर सकता।”

कोर्ट का फैसला

पूर्व अनुमति के अभाव के संबंध में एएफटी द्वारा निकाले गए और दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखे गए तथ्यात्मक निष्कर्षों में कोई त्रुटि न पाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता द्वारा पेश किए गए न्यायिक दृष्टांत तथ्यों के आधार पर भिन्न थे। परिणामस्वरूप, शीर्ष अदालत ने सिविल अपील खारिज कर दी और दोनों पक्षों को अपना-अपना खर्च वहन करने का निर्देश दिया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: नखत सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 9050/2026
पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर
निर्णय की तिथि: 29 जुलाई 2026

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