सुप्रीम कोर्ट ने पूरणमल बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य के मामले में हत्या के एक आरोपी की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनिवार्य धारा 65-बी (साक्ष्य अधिनियम) प्रमाणपत्र के बिना कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही, कोर्ट ने मामले में विश्वसनीय परिस्थितियों के अभाव को भी बरी करने का मुख्य आधार बनाया।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ “एक पूर्ण और सुसंगत कड़ी” स्थापित करने में “पूरी तरह विफल” रहा है। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) पर आधारित मामलों में दोषसिद्धि तभी संभव है जब परिस्थितियां निर्णायक प्रकृति की हों और आरोपी की निर्दोषता की किसी भी संभावना को खारिज करती हों।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 2 मार्च और 3 मार्च, 2010 की मध्यरात्रि का है, जब सह-दोषी लादू लाल की पत्नी श्रीमती अरुणा की उनके घर में हत्या कर दी गई थी। लादू लाल ने शुरू में इसे अज्ञात व्यक्तियों द्वारा की गई लूटपाट बताया था, लेकिन जांच के दौरान संदेह की सुई खुद लादू लाल और अपीलकर्ता पूरणमल की ओर मुड़ गई।
भीलवाड़ा की निचली अदालत ने 8 फरवरी, 2012 को दोनों को आईपीसी की धारा 302/34 और 201 के तहत दोषी ठहराया था। राजस्थान हाईकोर्ट ने 2018 में इस फैसले की पुष्टि की। हालांकि सह-दोषी लादू लाल की अपील को सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में खारिज कर दिया था, लेकिन पूरणमल ने कानूनी सहायता के माध्यम से 2,749 दिनों की देरी के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने पूरणमल के मामले में कुछ “विशिष्ट भिन्नताओं” को देखते हुए इस अपील पर सुनवाई की।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि दोषसिद्धि केवल “अनुमानों” पर आधारित थी। यह तर्क दिया गया कि कथित रूप से बरामद खून से सनी शर्ट का साक्ष्य संदिग्ध था और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) कानूनन अमान्य थे क्योंकि साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी (बीएसए की धारा 63) के तहत आवश्यक अनिवार्य प्रमाणपत्र पेश नहीं किया गया था।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि पूरणमल के पास से शर्ट और ₹46,000 की नकदी बरामद होना एक गंभीर स्थिति है। राज्य ने तर्क दिया कि चूंकि सीडीआर को सर्विस प्रोवाइडर के नोडल अधिकारियों द्वारा सिद्ध किया गया था, इसलिए धारा 65-बी प्रमाणपत्र का न होना कोई बड़ी कमी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई तीन मुख्य परिस्थितियों का विश्लेषण किया:
1. नकदी की बरामदगी: कोर्ट ने बरामद राशि में विसंगति पाई (रिकॉर्ड में ₹46,000 जबकि कोर्ट में गिनती के दौरान ₹46,145)। पीठ ने कहा, “नकदी की बरामदगी का तथ्य ही संदेह के घेरे में है।” कोर्ट ने आगे कहा कि अपराध से सीधा संबंध स्थापित किए बिना केवल पैसे की बरामदगी को दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।
2. शर्ट की बरामदगी और एफएसएल रिपोर्ट: कोर्ट ने खून से सनी शर्ट की बरामदगी को “अस्वाभाविक” बताया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि घटना के बाद कई दिनों तक बाहर रहने वाला व्यक्ति उस शर्ट को नष्ट करने के बजाय लोहे के बक्से में क्यों छिपाएगा? इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि एफएसएल नमूनों की ‘चेन ऑफ कस्टडी’ (Chain of Custody) टूट गई थी। करनदीप शर्मा उर्फ रजिया बनाम उत्तराखंड राज्य (2025) का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का कोई पुख्ता सबूत नहीं है, जिससे एफएसएल रिपोर्ट “कागज के एक टुकड़े” से ज्यादा कुछ नहीं रह जाती।
3. कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR): इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने अनवर पी.वी. बनाम पी.के. बशीर (2014) और अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंतयाल (2020) का संदर्भ दिया। कोर्ट ने कहा:
“भारतीय साक्ष्य अधिनियम इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को मौखिक साक्ष्य द्वारा सिद्ध करने की अनुमति तब तक नहीं देता, जब तक कि धारा 65-बी की अनिवार्य आवश्यकताओं का पालन न किया गया हो… ऐसा न करना धारा 65-बी(4) को निरर्थक बना देगा।”
चूंकि अनिवार्य प्रमाणपत्र पेश नहीं किया गया था, इसलिए सीडीआर को साक्ष्य में शामिल नहीं किया गया।
अदालत का निर्णय
पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष अपराध की कड़ियों को जोड़ने में विफल रहा है। निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए पीठ ने आदेश दिया:
“अपीलकर्ता-पूरणमल को आरोपों से बरी किया जाता है। वह हिरासत में है और यदि किसी अन्य मामले में उसकी आवश्यकता नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।”
केस विवरण:
- केस शीर्षक: पूरणमल बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या [SLP (Crl.) संख्या 1977/2026 से उत्पन्न]
- पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया
- निर्णय तिथि: 10 मार्च, 2026

