2G स्पेक्ट्रम मामला: लाइसेंस रद्द होने के बाद भी सेवाएं जारी रखने वाली कंपनियों को 2 फरवरी 2012 से देना होगा ‘रिजर्व प्राइस’ – सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 2012 के 2G मामले में लाइसेंस रद्द होने के बावजूद जनता के हितों के लिए सेवाएं जारी रखने वाली दूरसंचार कंपनियों को 2 फरवरी 2012 से ही ‘रिजर्व प्राइस’ (आरक्षित मूल्य) का भुगतान करना होगा।

न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने टेलीकॉम डिस्प्यूट सेटलमेंट एंड अपीलेट ट्रिब्यूनल (TDSAT) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें इस देनदारी की शुरुआत 15 फरवरी 2013 से मानी गई थी। कोर्ट ने कहा कि TDSAT का यह निष्कर्ष पूरी तरह से गलत था कि भुगतान की तारीख स्पष्ट नहीं थी।

मामले की पृष्ठभूमि

इस कानूनी विवाद की जड़ें 2 फरवरी 2012 के उस ऐतिहासिक फैसले में हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने 2G बैंड स्पेक्ट्रम के आवंटन और लाइसेंसों को अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया था। हालांकि, आम जनता को सेवाओं के अचानक बंद होने से होने वाली परेशानी से बचाने के लिए कोर्ट ने इन लाइसेंसों को नई नीलामी प्रक्रिया पूरी होने तक जारी रखने की अनुमति दी थी।

नीलामी प्रक्रिया में देरी के कारण, दूरसंचार विभाग (DoT) ने समय-समय पर विस्तार की मांग की, जिसके चलते सिस्टेमा श्याम टेलीसर्विसेज लिमिटेड (प्रतिवादी) जैसी कंपनियों ने लंबे समय तक अपना संचालन जारी रखा। 15 फरवरी 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जिन कंपनियों ने 2 फरवरी 2012 के बाद भी काम जारी रखा है, उन्हें नवंबर 2012 की नीलामी के लिए निर्धारित रिजर्व प्राइस का भुगतान करना होगा। इसके बाद DoT ने कंपनी को ब्याज सहित भारी-भरकम मांग नोटिस भेजा, जिसे TDSAT में चुनौती दी गई थी।

TDSAT का निर्णय और केंद्र की अपील

10 मई 2018 को TDSAT ने अपने फैसले में कहा कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने भुगतान की ‘शुरुआती तारीख’ स्पष्ट नहीं की थी और विस्तार के आदेश दिए थे, इसलिए यह देनदारी 15 फरवरी 2013 (जिस दिन भुगतान का आदेश दिया गया) से लागू होनी चाहिए। भारत सरकार (DoT) ने इस व्याख्या के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने TDSAT के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि संचालन में विस्तार केवल जनता की सुविधा के लिए दिया गया था, न कि लाइसेंसधारियों के लाभ के लिए। बेंच ने अपने फैसले में कहा:

“इस कोर्ट ने विशेष रूप से निर्देश दिया था कि जिन लाइसेंसधारियों ने ‘2.2.2012 के बाद’ अपना संचालन जारी रखा है, उन्हें रिजर्व प्राइस देना होगा… संदर्भ से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि यह देनदारी 2.2.2012 से ही शुरू हुई थी। यह विषय व्याख्या या जांच का मुद्दा नहीं था।”

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पीठ ने आगे कहा कि यदि कोर्ट की मंशा आदेश की तारीख से देनदारी शुरू करने की होती, तो वह स्पष्ट रूप से ऐसा ही कहती। ‘02.02.2012’ का संदर्भ ही इसकी शुरुआत की तारीख को प्रमाणित करता है।

ब्याज और अंतिम तिथि पर रुख

अंतिम तिथि के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने TDSAT के फैसले से सहमति जताई। कोर्ट ने माना कि चूंकि कंपनी मार्च 2013 की नीलामी में सफल रही थी और उसे 30 अप्रैल 2013 को ‘लेटर ऑफ इंटेंट’ (LoI) मिल गया था, इसलिए पुराने रद्द लाइसेंस के तहत उसकी देनदारी उसी दिन समाप्त हो गई थी।

ब्याज के संबंध में कोर्ट ने दूरसंचार विभाग (DoT) की सुस्ती पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि विभाग फरवरी 2013 के आदेश के बावजूद नवंबर 2014 तक चुप बैठा रहा।

“इतने लंबे समय तक मामले को लटकाए रखने के बाद, DoT अपनी खुद की सुस्ती का फायदा नहीं उठा सकता और उस अवधि के लिए प्रतिवादी पर ब्याज का बोझ नहीं डाल सकता।”

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कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. प्रतिवादी कंपनी उन 8 सर्कलों के लिए, जिनमें उसने सफल बोली लगाई थी, 2 फरवरी 2012 से 30 अप्रैल 2013 तक की अवधि के लिए रिजर्व प्राइस का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है।
  2. शेष 13 सर्कलों के लिए यह देनदारी 2 फरवरी 2012 से 23 मार्च 2013 तक होगी।
  3. ब्याज का भुगतान केवल 8 दिसंबर 2014 (कारण बताओ नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद) से SBI के प्राइम लेंडिंग रेट पर करना होगा।

अदालत ने निर्देश दिया कि कंपनी को मांग नोटिस मिलने के तीन महीने के भीतर शेष राशि का भुगतान करना होगा।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: भारत संघ बनाम सिस्टेमा श्याम टेलीसर्विसेज लिमिटेड
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 12219/2018

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