“न्याय का मजाक”: सुप्रीम कोर्ट ने 23 साल तक दहेज हत्या का ट्रायल रोकने पर जताई नाराजगी, राजस्थान हाईकोर्ट से मांगी रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक दहेज हत्या (Dowry Death) के मामले में 23 साल की देरी को “बेहद परेशान करने वाला” और “दर्दनाक” करार दिया है। कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश के जरिए दो दशकों से अधिक समय तक ट्रायल पर रोक लगाए रखी।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि इस तरह की देरी “न्याय का मजाक” (Mockery of Justice) उड़ाने जैसा है। कोर्ट ने आरोपियों द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन इस प्रशासनिक विफलता की विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं कि आखिर इतनी गंभीर प्रकृति का मामला इतने लंबे समय तक लंबित क्यों रहा।

मामले की पृष्ठभूमि (Background)

यह मामला दीपा नाम की महिला की मौत से जुड़ा है, जिसका विवाह 21 नवंबर 2000 को याचिकाकर्ता नंबर 1, विजय कुमार के साथ हुआ था। शादी के लगभग एक साल के भीतर, 31 दिसंबर 2001 को दीपा की उसकी ससुराल में “रहस्यमय परिस्थितियों” में मौत हो गई थी।

मृतका के भाई, गिरीश गोयल की शिकायत पर 10 जनवरी 2002 को अजमेर जिले के नाजीराबाद सिटी पुलिस स्टेशन में एफआईआर (संख्या 5/2002) दर्ज की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि दीपा को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था और ससुराल वालों ने उसे जहर देकर मार डाला। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और 304B के तहत मामला दर्ज किया।

जांच के बाद, पुलिस ने 2 अगस्त 2002 को सभी सात आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की और ट्रायल कोर्ट ने 15 नवंबर 2002 को आरोप तय (Framing of Charge) कर दिए।

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हालाँकि, जनवरी 2003 में आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष आरोप तय करने के आदेश को चुनौती देते हुए एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) दायर की। हाईकोर्ट ने 14 फरवरी 2003 को ट्रायल की आगे की कार्यवाही पर रोक (Stay) लगा दी। यह मामला करीब 20 साल तक लंबित रहा और अंततः 1 अगस्त 2025 को हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। इसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण (Court’s Analysis)

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की याचिका को गुण-दोष के आधार पर खारिज करते हुए कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। लेकिन, पीठ का पूरा ध्यान 23 साल की प्रक्रियागत देरी पर था।

कोर्ट ने अपनी सख्त टिप्पणी में कहा:

“अगर हाईकोर्ट्स द्वारा पारित अंतरिम आदेशों के बल पर गंभीर अपराधों के आपराधिक ट्रायल वर्षों तक लंबित रहते हैं, तो यह न्याय का मजाक उड़ाने के अलावा और कुछ नहीं होगा। न्याय सभी पक्षों के साथ होना चाहिए। न्याय केवल आरोपियों के साथ ही नहीं, बल्कि पीड़ित और उसके परिवार के सदस्यों के साथ भी होना चाहिए। कहीं भी अन्याय, हर जगह न्याय के लिए खतरा है।”

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सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को देश भर के सभी हाईकोर्ट्स के लिए एक “eye-opener” (आंखें खोलने वाला) बताया और राजस्थान हाईकोर्ट की रजिस्ट्री तथा राज्य सरकार से तीखे सवाल पूछे:

  • आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को सुनवाई के लिए लेने में हाईकोर्ट को 23 साल क्यों लगे?
  • जब ट्रायल पर स्टे था, तो मामले की सुनवाई जल्द क्यों नहीं की गई?
  • राजस्थान सरकार (अभियोजन पक्ष) 23 साल तक चुप क्यों बै रही और उसने मामले के निस्तारण के लिए कदम क्यों नहीं उठाए?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश (Decision and Directions)

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए देरी के कारणों की जांच के लिए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. रिकॉर्ड तलब: राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया गया है कि वे विशेष दूत (Special Messenger) के माध्यम से मामले का पूरा रिकॉर्ड और ऑर्डर शीट्स सुप्रीम कोर्ट भेजें।
  2. लंबित मामलों का ब्यौरा: रजिस्ट्रार जनरल को यह जानकारी देनी होगी कि वर्ष 2001 में कितनी आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाएं दायर की गईं और 2001 से 2026 के बीच कितनों का निपटारा हुआ।
  3. लिस्टिंग की जानकारी: हाईकोर्ट को यह बताना होगा कि याचिका दायर करने से लेकर खारिज होने तक, यह मामला कितनी बार सुनवाई के लिए सूचीबद्ध (List) हुआ।
  4. सभी हाईकोर्ट्स को निर्देश: पीठ ने सभी हाईकोर्ट्स के मुख्य न्यायाधीशों से कहा है कि वे सुनिश्चित करें कि जिन मामलों में ट्रायल पर रोक लगी है, विशेषकर हत्या, बलात्कार और दहेज हत्या जैसे संवेदनशील मामलों में, उनकी सुनवाई तुरंत की जाए।
  5. अगली सुनवाई: रिकॉर्ड प्राप्त होने के बाद आगे के आदेश पारित किए जाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी 2026 को तय की गई है।
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केस विवरण (Case Details):

  • केस टाइटल: विजय कुमार व अन्य बनाम राजस्थान राज्य
  • केस नंबर: स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) डायरी नंबर 71965/2025
  • कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री अभिषेक गुप्ता (AOR), सुश्री शीना तकवी, एडवोकेट
  • प्रतिवादी के वकील: श्री शिव मंगल शर्मा, सीनियर एडवोकेट

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