साजिश का आरोप साबित न होना रिश्वतखोरी की सजा में बाधा नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने आईटी इंस्पेक्टर की सजा बहाल की

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि रिश्वतखोरी के स्वतंत्र सबूत मौजूद हैं, तो साजिश (Conspiracy) के आरोप में सह-अभियुक्त के बरी होने से दूसरे आरोपी को स्वचालित रूप से दोषमुक्ति नहीं मिल सकती। शीर्ष अदालत ने एक अहम फैसले में 2010 के एक ‘ट्रैप’ मामले में इनकम टैक्स इंस्पेक्टर की दोषसिद्धि को बहाल कर दिया है, जिसे हाईकोर्ट ने पहले रद्द कर दिया था। हालांकि, अदालत ने आरोपी की उम्र को देखते हुए उसकी सजा को कम कर दिया है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने उत्तरदाता बलजीत सिंह (A2) की चार साल की कठोर कारावास की सजा को घटाकर एक साल कर दिया, जबकि ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए गए 1 लाख रुपये के जुर्माने को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक शिकायतकर्ता (PW1) द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ था, जिसकी फर्म का वर्ष 2008-09 का असेसमेंट इनकम टैक्स के संयुक्त आयुक्त, अरुण कुमार गुर्जर (A1) के पास लंबित था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि इनकम टैक्स इंस्पेक्टर बलजीत सिंह (A2), जो A1 का अधीनस्थ था, ने बिना किसी बाधा के असेसमेंट फाइल करने के एवज में 5 लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने 29 दिसंबर, 2010 को जाल (Trap) बिछाया। ट्रैप की कार्यवाही के दौरान, शिकायतकर्ता ने A1 के कार्यालय में A2 को 2 लाख रुपये के चिह्नित नोटों वाला एक लिफाफा सौंपा। सीबीआई टीम ने तुरंत कार्यवाही करते हुए A2 को पकड़ लिया और उसके कोट की जेब से वह राशि बरामद कर ली।

ट्रायल कोर्ट ने A1 और A2 दोनों को आईपीसी की धारा 120B (साजिश) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act), 1988 की धारा 7 के तहत दोषी ठहराया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने साजिश और मांग के सबूतों की कमी का हवाला देते हुए इस दोषसिद्धि को उलट दिया था। इसके बाद सीबीआई ने A2 (बलजीत सिंह) के बरी होने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

READ ALSO  कॉलेज में हिजाब, बुर्का पर प्रतिबंध को बरकरार रखने वाले बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ छात्रों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी

पक्षों की दलीलें

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल श्री कनकमेडाला रविंदर कुमार ने सीबीआई की ओर से तर्क दिया कि A2 के पास से रिश्वत की राशि की बरामदगी और सकारात्मक ‘फेनोल्फथेलिन’ परीक्षण (Phenolphthalein Test) पीसी एक्ट के तहत उसकी संलिप्तता का निर्णायक प्रमाण है।

वहीं, बलजीत सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री विकास पाहवा ने तर्क दिया कि यदि साजिश का तत्व साबित नहीं होता है, तो पूरा मामला गिर जाना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि चूंकि रिश्वत कथित तौर पर A1 के लिए मांगी गई थी और A1 को बरी कर दिया गया है, इसलिए A2 को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने बचाव पक्ष के इस तर्क को खारिज कर दिया कि साजिश का आरोप विफल होने पर दोनों आरोपियों को बरी किया जाना अनिवार्य है। पीठ ने रेखांकित किया कि A2 पर स्वतंत्र रूप से पीसी एक्ट की धारा 7 के तहत आरोप लगाए गए थे। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह सच है कि यदि पीसी एक्ट के तहत आरोप केवल साजिश के आरोप से जुड़े होते, तो एक के बरी होने पर दूसरे को दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। लेकिन यहाँ दोनों के खिलाफ मांग और स्वीकृति (Demand and Acceptance) का एक अलग आरोप भी है, जो साजिश के निश्चित आरोप से अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ नहीं है।”

सह-अभियुक्त के बयान की भूमिका पर कोर्ट ने कहा:

“जैसा कि हाईकोर्ट ने सही उल्लेख किया है, A1 द्वारा मांग या स्वीकृति का कोई सबूत नहीं था, सिवाय PW1 के उस बयान के कि A2 ने A1 की ओर से रिश्वत मांगी थी। सह-अभियुक्त द्वारा दिए गए ऐसे बयान पर भरोसा नहीं किया जा सकता और उस आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।”

हालांकि, कोर्ट ने A2 के खिलाफ सबूतों को पुख्ता पाया। पीठ ने कहा कि भले ही स्वतंत्र गवाह अपने बयानों से कुछ हद तक पलटे हों, लेकिन उनकी गवाही ने ‘पोस्ट-ट्रैप’ बरामदगी की पुष्टि की। नीरज दत्ता बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (2023) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“भले ही किसी गवाह को ‘प्रतिकूल’ (Hostile) माना जाए और उससे जिरह की जाए, फिर भी उसके साक्ष्य को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता, बल्कि सावधानी के साथ उस पर विचार किया जाना चाहिए और गवाही के उस हिस्से को स्वीकार किया जा सकता है जो विश्वसनीय हो।”

पीठ ने यह भी कहा कि ट्रैप के दौरान A2 का आचरण, जैसे कि चुनौती दिए जाने पर चुप रहना, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत प्रासंगिक था।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि हाईकोर्ट ने प्रत्यक्ष मांग के साक्ष्यों की कमी के कारण A1 को बरी करके सही किया था, लेकिन A2 को बरी करना गलत था। अदालत ने बलजीत सिंह को पीसी एक्ट की धारा 7 के तहत दोषी ठहराने वाले ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल कर दिया।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने "लोकप्रिय राजनीति" के लिए कोटा का उपयोग करने के खिलाफ चेतावनी दी

समय बीतने और आरोपी की आयु को देखते हुए, सजा में संशोधन किया गया:

“ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई चार साल की कठोर कारावास की सजा को घटाकर एक साल किया जाता है… साथ ही 1 लाख रुपये का जुर्माना और जुर्माना न भरने पर तीन महीने के साधारण कारावास की सजा बहाल रहेगी।”

अदालत ने बलजीत सिंह को चार सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

  • मामले का नाम: सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन बनाम बलजीत सिंह
  • अपील संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या [2026 की निर्धारित संख्या] (@ SLP (Crl.) No. 12486/2025)

READ ALSO  उपहार सिनेमा अग्निकांड: सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व आईपीएस अधिकारी के खिलाफ ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही रद्द की
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles