सुप्रीम कोर्ट से जस्टिस यशवंत वर्मा को झटका: महाभियोग जांच समिति के गठन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ कदाचार के आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति को चुनौती दी थी।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह फैसला सुनाया। इसके साथ ही, न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत गठित तीन सदस्यीय समिति के लिए जांच का रास्ता साफ हो गया है। यह समिति 2025 में जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास से जले हुए नोटों की बरामदगी के बाद उन पर लगे “सिद्ध कदाचार” (proven misbehaviour) के आरोपों की जांच करेगी।

कानूनी चुनौती: समिति का गठन “एकतरफा” होने का आरोप

जस्टिस यशवंत वर्मा ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा 12 अगस्त, 2025 को जारी उस अधिसूचना की वैधता को चुनौती दी थी, जिसके जरिए जस्टिस अरविंद कुमार (सुप्रीम कोर्ट), चीफ जस्टिस मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव (मद्रास हाईकोर्ट) और वरिष्ठ अधिवक्ता बी. वासुदेव आचार्य की तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की गई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और सिद्धार्थ लुथरा ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) के प्रोविजो का हवाला देते हुए तर्क दिया कि महाभियोग प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में एक ही दिन (21 जुलाई, 2025) पेश किए गए थे। उनका कहना था कि कानून के अनुसार, जब दोनों सदनों में नोटिस दिए जाते हैं, तो लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को संयुक्त रूप से एक “संयुक्त समिति” (Joint Committee) का गठन करना चाहिए।

दलील दी गई कि लोकसभा अध्यक्ष ने राज्यसभा के सभापति के निर्णय का इंतजार किए बिना एकतरफा कार्रवाई की, जो वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन है।

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लोकसभा सचिवालय की दलीलें

लोकसभा सचिवालय और केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता का यह तथ्यात्मक आधार गलत है कि दोनों सदनों में प्रस्ताव “स्वीकार” (admit) कर लिए गए थे।

सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि जहां लोकसभा अध्यक्ष ने प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था, वहीं राज्यसभा में प्रस्ताव कभी स्वीकार ही नहीं हुआ। उन्होंने जानकारी दी कि राज्यसभा के उपसभापति ने 11 अगस्त, 2025 को ही प्रस्ताव को “दोषपूर्ण” मानते हुए खारिज कर दिया था।

श्री मेहता ने तर्क दिया कि धारा 3(2) का प्रोविजो तभी लागू होता है जब दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार किए जाते हैं। चूंकि राज्यसभा में प्रस्ताव शुरू में ही खारिज हो गया था, इसलिए संयुक्त समिति की आवश्यकता नहीं थी और लोकसभा अध्यक्ष अपने अधिकार क्षेत्र में समिति गठित करने के लिए पूरी तरह सक्षम थे।

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को अस्वीकार करते हुए लोकसभा अध्यक्ष द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में कोई अवैधता नहीं पाई।

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पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल दोनों सदनों में प्रस्ताव पेश करने से संयुक्त समिति की आवश्यकता अपने आप उत्पन्न नहीं हो जाती। अध्यक्ष और सभापति द्वारा संयुक्त निर्णय की कानूनी आवश्यकता तभी पैदा होती है जब प्रस्तावों को सही पाया जाए और दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों द्वारा उन्हें स्वीकार कर लिया जाए।

चूंकि राज्यसभा का प्रस्ताव स्वीकृति के चरण को पार नहीं कर सका, कोर्ट ने माना कि लोकसभा अध्यक्ष निचले सदन में स्वीकार किए गए प्रस्ताव के आधार पर जांच समिति गठित करने के लिए सक्षम थे। कोर्ट ने संसदीय प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम अपने आप में एक पूर्ण कोड है।

विवाद की पृष्ठभूमि

महाभियोग की कार्यवाही मार्च 2025 की एक सनसनीखेज घटना से जुड़ी है, जब जस्टिस वर्मा (जो उस समय दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे) के आधिकारिक आवास पर आग लग गई थी। आरोप है कि अग्निशमन दल और पुलिस कर्मियों ने उनके स्टोररूम से भारी मात्रा में जली हुई और अधजली मुद्रा बरामद की थी।

इस घटना के बाद, तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) संजीव खन्ना ने मामले की जांच के लिए एक “इन-हाउस इंक्वायरी कमेटी” का गठन किया था। इन-हाउस पैनल ने जस्टिस वर्मा को दोषी ठहराते हुए निष्कर्ष निकाला था कि नकदी पर उनका “प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण” था और वह इसके स्रोत के बारे में कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण देने में विफल रहे।

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इस रिपोर्ट के आधार पर, CJI ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को उन्हें हटाने की सिफारिश की थी। इसके बाद, लोकसभा के 146 सांसदों ने उन्हें हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस दिया, जिससे वर्तमान कार्यवाही शुरू हुई। जस्टिस वर्मा ने इससे पहले इन-हाउस जांच रिपोर्ट को भी चुनौती दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2025 में खारिज कर दिया था।

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