अंतिम रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद पुलिस कोर्ट की अनुमति के बिना ‘आगे की जांच’ नहीं कर सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस द्वारा प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) को सक्षम अदालत द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है, तो जांच एजेंसी संबंधित मजिस्ट्रेट या कोर्ट की अनुमति के बिना दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 173(8) के तहत “आगे की जांच” (Further Investigation) नहीं कर सकती है।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के वर्षों बाद एक रेप केस में पुलिस अधिकारियों द्वारा प्रशासनिक आदेश पर शुरू की गई जांच को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही पुलिस के पास आगे की जांच करने की शक्ति है, लेकिन धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत कोर्ट की अनुमति लेना न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए एक आवश्यक शर्त है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 19 नवंबर, 2013 को दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें अपीलकर्ता (प्रमोद कुमार और अन्य) के खिलाफ महिला पुलिस थाना, जिला फिरोजाबाद में भारतीय दंड संहिता की धारा 376D (गैंगरेप), 352, 504 और 506 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

जांच के बाद, पुलिस ने 30 मई, 2014 को एक अंतिम रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) प्रस्तुत की, जिसमें कहा गया कि कोई अपराध नहीं बनता है। रिपोर्ट में शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास और साक्ष्यों की कमी का हवाला दिया गया था। प्रथम अतिरिक्त सिविल जज (जे.डी.)/न्यायिक मजिस्ट्रेट, फिरोजाबाद की अदालत ने 14 सितंबर, 2015 को इस क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने नोट किया कि नोटिस दिए जाने के बावजूद शिकायतकर्ता ने कोई विरोध याचिका (Protest Petition) दायर नहीं की थी।

कई वर्षों बाद, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के समक्ष जांच में खामियों का आरोप लगाते हुए एक शिकायत दर्ज की गई। इसके बाद, उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने 6 जून, 2019 को एक पत्र के माध्यम से सीबी-सीआईडी (CB-CID) को मामले की जांच करने का निर्देश दिया। इसके बाद, 26 अप्रैल, 2021 को पुलिस अधीक्षक (SP), आगरा ने जांच अधिकारी (IO) को जांच पूरी करने का निर्देश दिया।

IO ने आगे की जांच के लिए मजिस्ट्रेट से अनुमति मांगी थी, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों ने न्यायिक आदेश का इंतजार किए बिना ही जांच के निर्देश जारी कर दिए थे। अपीलकर्ताओं ने इन प्रशासनिक आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 20 नवंबर, 2023 को उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं का तर्क: अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वकील दिव्येश प्रताप सिंह ने तर्क दिया कि पुलिस अधीक्षक ने सक्षम न्यायालय से पूर्व अनुमति प्राप्त किए बिना धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत आगे की जांच का निर्देश दिया, जबकि 2015 में ही क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार की जा चुकी थी। उन्होंने कहा कि एक बार अंतिम रिपोर्ट स्वीकार हो जाने के बाद, केवल कोर्ट के पास ही आगे की जांच का आदेश देने की शक्ति होती है। उन्होंने इसे बिना किसी नई सामग्री के सात साल बाद शुरू की गई “डी-नोवो” (नई सिरे से) जांच बताया, जो कानूनन मान्य नहीं है।

वकील ने 21 सितंबर, 2022 की डीएनए टेस्ट रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया था कि आरोपी व्यक्ति पीड़िता के गर्भपात भ्रूण के जैविक पिता नहीं थे।

राज्य का तर्क: उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) अपूर्व अग्रवाल ने तर्क दिया कि धारा 173(8) सीआरपीसी के तहत आगे की जांच करने पर कोई वैधानिक रोक नहीं है। उन्होंने कहा कि “आगे की जांच” केवल पिछली जांच की निरंतरता है। धर्म पाल बनाम हरियाणा राज्य (2016) के फैसले का हवाला देते हुए, राज्य ने तर्क दिया कि पुलिस अधिकारी के पास आगे की जांच करने की अप्रतिबंधित शक्ति है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 173(8) (जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 193(9) के अनुरूप है) के दायरे की जांच की।

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कोर्ट की अनुमति की आवश्यकता विनय त्यागी बनाम इरशाद अली (2013) के मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए, पीठ ने दोहराया कि हालांकि धारा 173(8) स्पष्ट रूप से कोर्ट की अनुमति लेने का आदेश नहीं देती है, लेकिन यह एक स्थापित कानूनी प्रक्रिया है जिसे प्रावधान के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा:

“अदालत की पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता को धारा 173(8) के प्रावधानों के एक आवश्यक निहितार्थ (Necessary Implication) के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।”

मजिस्ट्रेट के पास ही है शक्ति पीठ ने पीतांबरन बनाम केरल राज्य (2024) के हालिया फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि जिला पुलिस प्रमुख आगे की जांच का आदेश नहीं दे सकता क्योंकि वह शक्ति या तो संबंधित मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालय के पास होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:

“इस कोर्ट द्वारा तय की गई कानूनी स्थिति के आलोक में… यह कहना सुरक्षित है कि किसी मामले में आगे की जांच का निर्देश देने की शक्ति पूरी तरह से संबंधित मजिस्ट्रेट/कोर्ट के विवेक पर निर्भर करती है। यदि पुलिस/जांच एजेंसी की राय है कि आगे की जांच आवश्यक है… तो उनके लिए यह बाध्यकारी है कि वे स्वयं आदेश देने के बजाय मजिस्ट्रेट/कोर्ट के समक्ष एक उचित आवेदन दायर करें।”

पुलिस अधीक्षक के आचरण पर टिप्पणी कोर्ट ने आगरा के पुलिस अधीक्षक के आचरण की कड़ी आलोचना की, जिन्होंने मजिस्ट्रेट की अनुमति प्राप्त किए बिना जांच पूरी करने के निर्देश जारी किए थे।

कोर्ट ने कहा:

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“इस प्रकार, यह पूरी तरह स्पष्ट है कि पुलिस अधीक्षक ने कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया की पूर्ण अवहेलना करते हुए कोर्ट की अनुमति लिए बिना आगे की जांच का निर्देश दिया। इतने उच्च पद के अधिकारी द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर अनियंत्रित शक्तियों का प्रयोग करना और इस प्रकार न्यायालय के अधिकार को कमतर आंकना अशोभनीय आचरण है।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 20 नवंबर, 2023 के फैसले को रद्द कर दिया।

नतीजतन, कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा जारी 6 जून, 2019 के आदेश और पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी 26 अप्रैल, 2021 के आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत आगे की जांच के निर्देश दिए गए थे।

हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि इस आदेश का असर मूल शिकायतकर्ता द्वारा क्लोजर रिपोर्ट की स्वीकृति के खिलाफ दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) पर नहीं पड़ेगा, जो जिला एवं सत्र न्यायाधीश, फिरोजाबाद के समक्ष लंबित है। ट्रायल कोर्ट को गुण-दोष के आधार पर उस याचिका का निपटारा करने का निर्देश दिया गया है।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: प्रमोद कुमार और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 2026 (एस.एल.पी. (क्रिमिनल) नंबर 350 ऑफ 2024 से उत्पन्न)
  • कोरम: जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई
  • अपीलकर्ताओं के वकील: श्री दिव्येश प्रताप सिंह
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री अपूर्व अग्रवाल, एएजी

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