सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कर्नाटक के अकलकोट स्थित लाडले मशाक दरगाह और हिंदू संत राघव चैतन्य की समाधि पर महाशिवरात्रि के अवसर पर पूजा आयोजित करने से रोकने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब मामला पहले से कर्नाटक हाईकोर्ट में लंबित है, तब संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत राहत नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ याचिकाकर्ता खलील अंसारी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कथित “अवैध प्रवेश, भीड़ एकत्र करने और निजी प्रतिवादियों द्वारा संपत्ति पर पूजा आयोजित करने” से रोकने की मांग की गई थी।
यह स्थल 14वीं सदी के सूफी संत और 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य से जुड़ा हुआ है और ऐतिहासिक रूप से दोनों समुदायों के लिए आस्था का केंद्र रहा है। लेकिन 2022 में पूजा-अधिकारों को लेकर विवाद बढ़ा और क्षेत्र में साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति बन गई थी।
फरवरी 2025 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने राघव चैतन्य शिवलिंग पर 15 हिंदू श्रद्धालुओं को महाशिवरात्रि पूजा की अनुमति दी थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता विभा दत्ता माखिजा ने याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी कि संपत्ति पहले से ही वक्फ अधिसूचित है और हाईकोर्ट ने इस मामले पर पहले फैसला दे दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि इसमें Places of Worship Act से जुड़े कई सवाल उठते हैं, और इसे समान प्रकृति के मामलों के साथ जोड़ा जा सकता है।
लेकिन पीठ ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता जिस संपत्ति को वक्फ घोषित करने की मांग कर रहे हैं, वह अधिकार वक्फ ट्रिब्यूनल का है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 32 के तहत राहत नहीं दे सकता।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली और मामला खारिज कर दिया गया।

