सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 17A के तहत मिलने वाला संरक्षण उन मामलों में उपलब्ध नहीं है जहां अवैध परितोषण (illegal gratification) या रिश्वत की मांग का आरोप हो। धारा 17A किसी लोक सेवक के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाती है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह भी पुष्टि की है कि राज्य का भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) राज्य के भीतर केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ मामले दर्ज करने और जांच करने का अधिकार रखता है। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि ऐसा अधिकार क्षेत्र विशेष रूप से केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के पास है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ के 3 अक्टूबर, 2025 के फैसले को चुनौती देते हुए विशेष अनुमति याचिका (SLP) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं, अनिल दायमा और अन्य द्वारा दायर दो आपराधिक विविध याचिकाओं (Criminal Misc. Petitions) का निपटारा किया था।
हाईकोर्ट ने कानून के दो प्रमुख सवालों पर विचार किया था:
- क्या राजस्थान राज्य की एजेंसी एसीबी (Anti-Corruption Bureau) को केंद्र सरकार के किसी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने और जांच करके चार्जशीट दाखिल करने का अधिकार है, या यह अधिकार क्षेत्र विशेष रूप से सीबीआई (CBI) के पास है?
- क्या सीबीआई की पूर्व अनुमति या सहमति के बिना एसीबी द्वारा केंद्र सरकार के कर्मचारी के खिलाफ सक्षम न्यायालय के समक्ष दायर चार्जशीट कानूनन मान्य है?
हाईकोर्ट ने इन दोनों सवालों का जवाब याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दिया था और स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज किया था कि राजस्थान एसीबी के पास भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने का अधिकार है, भले ही आरोपी केंद्र सरकार का कर्मचारी हो।
पक्षकारों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष, याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकील ने अपने मुवक्किलों के लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A का लाभ देने की मांग की।
वकील ने इस प्रावधान की प्रयोज्यता के लिए तर्क दिया, जो यह अनिवार्य करता है कि किसी लोक सेवक द्वारा कथित रूप से किए गए अपराध की कोई भी पूछताछ या जांच करने से पहले पुलिस अधिकारी को सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमोदन (approval) लेना होगा।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
1. केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर राज्य एसीबी का अधिकार क्षेत्र
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य एसीबी के अधिकार क्षेत्र के संबंध में राजस्थान हाईकोर्ट के निष्कर्षों को सही ठहराया। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने कानून की स्थिति और इस न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) के विभिन्न फैसलों की समीक्षा करने के बाद एक स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज किया है कि राजस्थान एसीबी के पास कार्यवाही करने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“हाईकोर्ट ने यह कहते हुए सही दृष्टिकोण अपनाया है कि यह कहना गलत है कि केवल सीबीआई ही अभियोजन शुरू कर सकती थी।”
2. पीसी एक्ट की धारा 17A की प्रयोज्यता पर
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस विशिष्ट दलील पर विचार किया कि उन्हें धारा 17A का लाभ मिलना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं पर अधिनियम की धारा 7 और 7A के तहत मुकदमा चलाने की मांग की गई है और यह “अवैध परितोषण की मांग” (demand of illegal gratification) का मामला है।
कोर्ट ने धारा 17A के पाठ का विश्लेषण किया और जोर दिया कि यह प्रावधान उन अपराधों की जांच या पूछताछ से संबंधित है जो “लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों के निर्वहन में की गई किसी सिफारिश या लिए गए निर्णय से संबंधित हों।”
याचिकाकर्ता की दलील को सिरे से खारिज करते हुए, कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की:
“विद्वान वकील की पूरी दलील पूरी तरह से गलत धारणा पर आधारित है। धारा 17-A को एक विशेष उद्देश्य के साथ अधिनियमित किया गया था। धारा 17-A उन अपराधों की जांच या पूछताछ की बात करती है जो लोक सेवक द्वारा आधिकारिक कार्यों या कर्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों या लिए गए निर्णयों से संबंधित हैं। धारा 17-A को किसी भी तरह से अवैध परितोषण (रिश्वत) की मांग के मामलों में लागू नहीं किया जा सकता है।”
निर्णय
परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिकाओं (SLPs) को खारिज कर दिया और राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: अनिल दायमा आदि बनाम राजस्थान राज्य और अन्य
- केस नंबर: S.L.P. (Crl.) Nos. 1010-1011/2026
- कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा
- याचिकाकर्ताओं के वकील: श्री अशोक गौड़ (वरिष्ठ अधिवक्ता), सुश्री मेघा कर्णवाल (AOR), सुश्री साक्षी सिंह (अधिवक्ता), श्री तरुण जयमन (अधिवक्ता)
- प्रतिवादियों के वकील: श्री शिवमंगल शर्मा (AAG), श्री पुनीत परिहार (अधिवक्ता)

