बिना समझौते के मध्यस्थता संभव नहीं; नगर पालिका विवादों में राज्य सरकार एकतरफा आर्बिट्रेटर नियुक्त नहीं कर सकती: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मेसर्स भारत उद्योग लिमिटेड द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया है। जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि पक्षों के बीच कोई वैध मध्यस्थता समझौता (Arbitration Agreement) या सूचित सहमति नहीं है, तो आर्बिट्रल अवॉर्ड पूरी तरह से शून्य और ‘नॉन-एस्ट’ (non-est) होगा। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें चुंगी (Octroi) संग्रह निविदा की कीमतों से संबंधित एक अवॉर्ड को रद्द कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद मार्च 1994 में शुरू हुआ था, जब अंबरनाथ नगर परिषद (नगर पालिका) ने चुंगी संग्रह के लिए एक निविदा जारी की थी। इस निविदा के लिए न्यूनतम आरक्षित मूल्य 6,74,00,000/- रुपये तय किया गया था। याचिकाकर्ता, मेसर्स भारत उद्योग लिमिटेड ने 6,75,00,000/- रुपये की बोली लगाकर यह अनुबंध प्राप्त किया।

काम शुरू करने के कुछ ही समय बाद, याचिकाकर्ता ने आरक्षित मूल्य में लगभग 40 लाख रुपये की कटौती की मांग की, जिसे नगर पालिका ने खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने अंततः महाराष्ट्र सरकार के शहरी विकास विभाग से संपर्क किया। 14 नवंबर 1994 को, राज्य सरकार ने ‘महाराष्ट्र नगर परिषद, नगर पंचायत और औद्योगिक नगरी अधिनियम, 1965’ की धारा 143-ए(3) के तहत शक्तियों का उपयोग करते हुए कोंकण डिवीजन के कमिश्नर को आर्बिट्रेटर नियुक्त कर दिया। आर्बिट्रेटर ने 26 दिसंबर 1994 को अपना फैसला सुनाते हुए आरक्षित मूल्य को घटाकर 6,20,89,843/- रुपये कर दिया। हाईकोर्ट ने बाद में इस अवॉर्ड को रद्द कर दिया था, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पी. बी. सुरेश ने तर्क दिया कि चूंकि नगर पालिका ने आर्बिट्रेशन की कार्यवाही में बिना किसी विरोध के भाग लिया था, इसलिए अब वे इसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल नहीं उठा सकते। उन्होंने ‘एन चेल्लप्पन बनाम केरल राज्य बिजली बोर्ड’ और ‘इंदर सैन मित्तल बनाम हाउसिंग बोर्ड, हरियाणा’ जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि यह “छूट और मौन सहमति” (waiver and acquiescence) का मामला है।

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प्रतिवादी की ओर से: नगर पालिका के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री विनय नवारे ने तर्क दिया कि पक्षों के बीच मध्यस्थता का कोई समझौता ही नहीं था। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के पास किसी संपन्न अनुबंध पर जबरन मध्यस्थता थोपने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है और नगर पालिका ने उचित स्तर पर इस पर आपत्ति जताई थी।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता अधिनियम, 1940 के तहत समझौते की वैधता पर ध्यान केंद्रित किया।

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1. धारा 143-ए के तहत वैधानिक शक्ति: कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि राज्य सरकार धारा 143-ए(3) के तहत आर्बिट्रेटर नियुक्त कर सकती है। पीठ ने कहा कि यह धारा केवल चुंगी संग्रह के विनियमन और प्रक्रिया से संबंधित है। कोर्ट ने कहा:

“किसी भी परिस्थिति में ऐसी शक्ति का विस्तार एकतरफा आर्बिट्रेटर नियुक्त करने के लिए नहीं किया जा सकता, चाहे नगर पालिका और उसके एजेंट के बीच वैधानिक या संविदात्मक संबंध कुछ भी हों।”

2. क्लॉज 22 की व्याख्या: याचिकाकर्ता ने अनुबंध के क्लॉज 22 का सहारा लिया था, जिसमें विवादों को कलेक्टर के पास भेजने का प्रावधान था। कोर्ट ने कहा कि यह एक विभागीय विवाद-समाधान तंत्र था, न कि कोई मध्यस्थता समझौता। कोर्ट के अनुसार, क्लॉज 22 पक्षों के बीच मध्यस्थता के माध्यम से विवाद सुलझाने के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ता।

3. भागीदारी और अधिकार क्षेत्र: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नगर पालिका द्वारा कार्यवाही में भाग लेने का अर्थ यह नहीं है कि उसने आर्बिट्रेटर को अधिकार क्षेत्र दे दिया। उस समय नगर पालिका सरकार द्वारा नियुक्त ‘प्रशासक’ के अधीन थी और उसे सहमति के बिना आर्बिट्रेशन के लिए मजबूर किया गया था।

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मध्यस्थता समझौते की अनुपस्थिति में पूरी कार्यवाही शून्य (coram non judice) थी। कोर्ट ने अपने मुख्य निष्कर्षों को इस प्रकार संक्षेपित किया:

  • समझौते का अभाव: अधिनियम की धारा 2(ए) के तहत विवादों को मध्यस्थता के लिए भेजने का कोई लिखित समझौता नहीं था।
  • अधिकार क्षेत्र की कमी: राज्य सरकार के पास आर्बिट्रेटर नियुक्त करने का कोई कानूनी आधार नहीं था।
  • अवॉर्ड की शून्यता: चूंकि आर्बिट्रेटर के पास अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र की कमी थी, इसलिए परिणामी अवॉर्ड ‘नॉन-एस्ट’ था।
  • कार्यवाही की प्रकृति: कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस विचार से सहमति जताई कि मध्यस्थता की कार्यवाही केवल औपचारिकता मात्र थी, जिसे बहुत कम समय (42 दिन) में पूरा कर लिया गया।

इन्हीं आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

केस विवरण

  • केस का नाम: मेसर्स भारत उद्योग लिमिटेड बनाम अंबरनाथ नगर परिषद, कमिश्नर के माध्यम से और अन्य
  • केस संख्या: विशेष अनुमति याचिका (सी) संख्या 1127/2017
  • पीठ: जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
  • निर्णय की तिथि: 24 मार्च, 2026

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