हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 से महिला भूमिधर का सीमित अधिकार पूर्ण स्वामित्व में बदला; उत्तराधिकार धारा 50 से नहीं बल्कि धारा 53 से तय होगा: सुप्रीम कोर्ट

कृषि जोत से जुड़े कानूनों और पर्सनल लॉ के अंतर्संबंध को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम, 1954 की धारा 51(2) के तहत किसी महिला भूमिधर पर लागू होने वाला पर्सनल लॉ कानून लागू होने की तिथि पर स्थिर या सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उसकी मृत्यु के समय लागू पर्सनल लॉ को संदर्भित करता है। अदालत ने निर्णय दिया कि यदि किसी हिंदू महिला का सीमित अधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत पूर्ण स्वामित्व में बदल चुका है, तो 1973 में उसकी मृत्यु के बाद उसकी कृषि भूमि का उत्तराधिकार 1954 के अधिनियम की धारा 51(2)(a)(ii) के साथ पठित धारा 53 के तहत तय होगा, न कि धारा 50 के तहत पूर्व पुरुष स्वामी के वारिसों को वापस जाएगा। जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने पूर्व पुरुष स्वामी के वंशजों (रिवर्शनर्स) द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए महिला के दूसरे विवाह से जन्मे बेटों के पक्ष में भूमि के दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद दिल्ली के बवाना गांव में स्थित खाता संख्या 273/222 की लगभग 45 बीघा कृषि भूमि से जुड़ा है। इस परिवार के मूल पूर्वज हरदयाल थे, जिनके तीन पुत्र थे: खुशी राम, तुलसी राम और नवल किशोर। नवल किशोर के प्रपौत्र मौजी राम का विवाह खजानो से हुआ था और उनका एक बेटा राम चंदर था। मौजी राम और उनके बेटे राम चंदर (जिनकी मृत्यु 1937 में अविवाहित रहते हुए हो गई थी) के निधन के बाद, खजानो ने संपदा का प्रतिनिधित्व किया और हिंदू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम, 1937 के तहत सीमित जीवन पर्यंत हित धारक बनीं।

इसके बाद खजानो ने तुलसी राम के प्रपौत्र बाल किशन से करेवा (पुनर्विवाह) किया। बाल किशन के अपनी पहली पत्नी से तीन बेटे—सुब्बे, होशियारे और मुख्तियारे थे। बाल किशन के साथ पुनर्विवाह से खजानो के दो बेटे हुए: चांद राम और चंदर भान (प्रतिवादी संख्या 2 और 3)।

जब 20 जुलाई, 1954 को दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम, 1954 लागू हुआ, तब खुदकाश्त के तौर पर भूमि पर काबिज होने के कारण खजानो को अधिनियम की धारा 5 और धारा 11 के तहत भूमिधर घोषित किया गया। इसके बाद 17 जून, 1956 को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 प्रभाव में आया। वर्ष 1973 में खजानो का निधन हो गया।

वर्ष 1997 में प्रतिवादी संख्या 2 और 3 ने भूमि के म्यूटेशन के लिए आवेदन किया। बाल किशन की पहली पत्नी के बेटों ने भी इसके समर्थन में अनापत्ति हलफनामा दाखिल किया। हालांकि, मौजी राम के भाइयों के पुरुष वंशज होने का दावा करने वाले अपीलकर्ताओं ने इस पर आपत्ति जताई और 1954 के अधिनियम की धारा 50 के तहत म्यूटेशन की मांग की। एसडीएम नरेला ने 25 अप्रैल, 1997 को प्रतिवादी संख्या 2 और 3 के पक्ष में म्यूटेशन का आदेश दिया। अतिरिक्त कलेक्टर और वित्तीय आयुक्त के समक्ष अपीलकर्ताओं की अपीलें भी खारिज हो गईं।

READ ALSO  युवा कांग्रेस की महिला पदाधिकारी की हत्या में दो को आजीवन कारावास; 4 अन्य के लिए कठोर कारावास

इसके बाद हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने वर्ष 2004 में अपीलकर्ताओं की रिट याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि कृषि भूमि का उत्तराधिकार पूरी तरह 1954 के अधिनियम से संचालित होता है और इसमें हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू नहीं होगा, इसलिए भूमि पूर्व पुरुष धारक के वारिसों को मिलनी चाहिए। लेकिन 9 अगस्त, 2012 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एलपीए संख्या 92/2005 में एकल पीठ के आदेश को पलट दिया। खंडपीठ ने माना कि 1956 के अधिनियम की धारा 14 के तहत खजानो मृत्यु के समय पूर्ण स्वामी थीं, इसलिए 1954 के अधिनियम की धारा 51(2)(a)(ii) और धारा 53 लागू होगी। इस निर्णय के खिलाफ अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रूपेश कुमार ने दलील दी कि दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम, 1954 कृषि जोत और उसके उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला एक संपूर्ण कोड है। उन्होंने कहा कि जब 20 जुलाई, 1954 को यह कानून लागू हुआ, तब खजानो के पास केवल एक सीमित अधिकार था जो उसी समय तय हो चुका था। उन्होंने तर्क दिया कि पुनर्विवाह के कारण खजानो पहले पति की संपदा से अधिकार खो चुकी थीं और बाद में बने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 से 1954 के अधिनियम की उत्तराधिकार योजना में बदलाव नहीं किया जा सकता। उन्होंने ‘राम मेहर बनाम दखन’, ‘राम जीवन बनाम श्रीमती फूला’, ‘हट्टी बनाम सुंदर सिंह’, ‘वेलामुर्री वेंकट शिवप्रसाद बनाम कोथुरी वेंकटेश्वरलू’, ‘भगत राम बनाम तेजा सिंह’ और ‘वी. दंडपाणि चेट्टियार बनाम बालासुब्रमण्यम चेट्टियार’ जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तराधिकार धारा 51(2)(a)(i) के साथ पठित धारा 50 के तहत मौजी राम के पुरुष वंशजों को ही मिलना चाहिए।

दूसरी ओर, प्रतिवादी संख्या 2 और 3 की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामकृष्णन वीरराघवन ने दलील दी कि प्रतिवादी सीधे 1956 के कानून के तहत नहीं, बल्कि 1954 के अधिनियम की धारा 51(2)(a)(ii) के तहत म्यूटेशन की मांग कर रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि धारा 51(2) में ‘पर्सनल लॉ’ का संदर्भ एक सामान्य कानूनी संदर्भ है, जो भूमिधर की मृत्यु के समय लागू कानून पर निर्भर करता है। चूंकि खजानो की मृत्यु 1973 में हुई थी, इसलिए 1956 के अधिनियम की धारा 14(1) के तहत उनका सीमित अधिकार पहले ही पूर्ण स्वामित्व में बदल चुका था। उन्होंने ‘बजाया बनाम गोपीकाबाई’ के तीन जजों की पीठ के फैसले पर भरोसा जताते हुए कहा कि मृत्यु के समय लागू प्रगतिशील पर्सनल लॉ ही संपदा की प्रकृति तय करता है, जिसके तहत धारा 53 के अनुसार जमीन उनके पुत्रों को मिलेगी।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम, 1954 की धारा 51(2) और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के वैधानिक प्रावधानों का विस्तार से परीक्षण किया।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि आपराधिक कार्यवाही न्याय के लिए है, प्रतिशोध के लिए नहीं

धारा 14(1) के न्यायिक विकास का विश्लेषण करते हुए और ‘पोत्ती लक्ष्मी पेरुमल्लू बनाम पोत्ती कृष्णवेनम्मा’, ‘कलावतीबाई बनाम सोयराबाई’, ‘वी. तुलासम्मा बनाम शेषा रेड्डी’, ‘एराम्मा बनाम वीरुपन्ना’, ‘जगन्नाथन पिल्लई बनाम कुंजितापदम पिल्लई’, ‘बाई वजिया बनाम ठाकोरभाई चेलाभाई’ और ‘मंगल सिंह बनाम श्रीमती रत्तो’ जैसे मामलों का संदर्भ लेते हुए अदालत ने टिप्पणी की:

“कानूनी वाक्यांश ‘पूर्ण स्वामी के रूप में न कि सीमित स्वामी के रूप में’ सीमित संपदा या हिंदू विधवा की संपदा की पारंपरिक अवधारणा को समाप्त करता है। यह महिला को पूर्ण प्रभुत्व और संपत्ति के निपटान का असीमित अधिकार प्रदान करता है।”

1956 के कानून से आए युगांतरकारी बदलाव को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा:

“आधी रात को दोपहर समझने की कोई संभावना नहीं है; लेकिन किस सटीक क्षण में गोधूलि अंधेरे में बदल जाती है, यह तय करना कठिन है। वर्तमान मामले में, 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के आने से, विशेष रूप से धारा 14(1) के तहत, आधी रात को दोपहर समझने की कोई संभावना नहीं है, और यह तय करना भी कठिन नहीं है कि किस सटीक क्षण में गोधूलि भोर में बदल जाती है। 1954 के अधिनियम का घोषणात्मक स्वरूप और 1956 के अधिनियम के तहत अधिकार का विस्तार एक हिंदू विधवा को पूर्ण स्वामी बनाता है।”

धारा 51(2) की शाब्दिक व्याख्या करते हुए अदालत ने ‘गुरुदेवदत्त वीकेएसएसएस मर्यादित बनाम महाराष्ट्र राज्य’, ‘ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ उड़ीसा लिमिटेड बनाम ईस्टर्न मेटल्स एंड फेरो अलॉयज’, ‘बी. प्रेमानंद बनाम मोहन कोइकल’ और ‘स्वीडिश मैच एबी बनाम सेबी’ के सिद्धांतों का उल्लेख किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 51(2) में “जिसने अधिनियम के प्रारंभ से पहले एक हित उत्तराधिकार में प्राप्त किया है” वाक्यांश भूतकाल में है, जबकि ट्रिगर शर्त में “मृत्यु हो जाती है” (dies) वर्तमान काल में प्रयुक्त हुआ है।

अदालत ने कहा:

“उप-खंड (i) और (ii) के तहत उत्तराधिकार अधिकारों के प्रवाह को तय करने वाले निर्णायक शब्द ‘उस पर लागू होने वाले पर्सनल लॉ के अनुसार’ हैं, चाहे वह जीवन पर्यंत संपदा की हकदार हो या जोत की पूर्ण रूप से हकदार हो। इसलिए, 1954 के अधिनियम के लागू होने पर पर्सनल लॉ वहीं स्थिर नहीं हो जाता है, बल्कि यह किसी महिला भूमिधर के हित के उत्तराधिकार के हकदार व्यक्तियों के वर्गों को उसकी मृत्यु की तारीख पर लागू पर्सनल लॉ के अनुसार खुला रखता है।”

अदालत ने ‘बजाया बनाम गोपीकाबाई’ मामले में प्रतिपादित सामान्य संदर्भात्मक कानून के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए टिप्पणी की:

READ ALSO  नवी मुंबई: 100% नियमों का पालन करने के बाद भी रेस्तरां का लाइसेंस निलंबित रखने पर एफडीए को हाईकोर्ट की फटकार, जुर्माना लगाने के संकेत

“1954 के अधिनियम की धारा 51(2) में ‘पर्सनल लॉ’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जो एक सामान्य संदर्भात्मक शब्दावली है। कानून भविष्य की ओर देखता है, न कि अतीत की ओर। यह प्रगतिशील होता है, प्रतिगामी नहीं।”

पीठ ने समझाया कि यदि खजानो की मृत्यु 20 जुलाई, 1954 और 17 जून, 1956 के बीच हुई होती, तो उत्तराधिकार धारा 50 के जरिए धारा 51(2)(a)(i) से तय होता क्योंकि उस समय उनके पास सीमित अधिकार ही था। लेकिन चूंकि उनका निधन 1973 में हुआ:

“स्पष्टीकरण के साथ पठित धारा 14(1) के प्रभाव से, 17.06.1956 से खजानो न केवल एक प्रोपराइटर हैं, बल्कि पर्सनल लॉ के सामान्य संदर्भात्मक कानून, यानी 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के माध्यम से उनका सीमित संपदा अधिकार एक पूर्ण अधिकार में बदल गया है, जिससे उत्तराधिकार का क्रम 1954 के अधिनियम की धारा 50 से बदलकर धारा 53 में परिवर्तित हो जाता है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में निर्णायक बिंदु मृत्यु की तारीख है। कानून में प्रयुक्त वर्तमान काल “dies” को भूतकाल के रूप में पढ़कर संकीर्ण अर्थ देना वैधानिक भाषा के स्पष्ट अर्थ की अनदेखी करना होगा।

अदालत का फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ के निर्णय की पुष्टि करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि खजानो 1973 में अपनी मृत्यु के समय 1956 के कानून की धारा 14(1) के प्रभाव से भूमि की पूर्ण स्वामी थीं। इसलिए, उत्तराधिकार 1954 के अधिनियम की धारा 51(2)(a)(ii) के साथ पठित धारा 53 के तहत ही संचालित होगा और प्रतिवादी संख्या 2 और 3 का नाम म्यूटेशन में दर्ज किया जाना पूरी तरह सही है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं की सिविल अपील खारिज कर दी।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सुल्तान सिंह (मृतक) कानूनी प्रतिनिधियों के माध्यम से और अन्य बनाम वित्तीय आयुक्त, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार और अन्य 

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 9146/2012 

पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया 

निर्णय की तिथि: 9 अक्टूबर, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles