महिला के ऊपर लेटना और उसका मुंह दबाना मात्र रेप की कोशिश नहीं, इसके लिए अपराध की दिशा में ठोस कदम उठाने का सबूत जरूरी: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी महिला के ऊपर लेटना और उसका मुंह दबाना मात्र भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376/511 के तहत रेप की कोशिश का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए यह साबित होना जरूरी है कि आरोपी ने रेप करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया था। जस्टिस संदीप कुमार ने वर्ष 2013 के एक दोषसिद्धि आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस मामले में आरोपी का आचरण महिला की गरिमा भंग करने के अपराध के दायरे में आता है। हाईकोर्ट ने रेप की कोशिश के मामले में दोषसिद्धि को बदलकर धारा 354 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया। हालांकि, महिला के घर में गैरकानूनी तरीके से घुसने के अपराध में उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।

हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी रात में महिला के घर में घुसा था, उसने जल रहा दीया बुझाया, महिला के ऊपर लेट गया और उसे चिल्लाने से रोकने के लिए उसका मुंह दबाया। लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे साबित हो कि आरोपी ने अपने या महिला के कपड़े उतारे थे अथवा रेप करने की दिशा में कोई ऐसा कदम उठाया था जो केवल तैयारी से आगे बढ़कर अपराध करने की कोशिश माना जा सके।

क्या था पूरा मामला?

मामला बिहार के बेगूसराय जिले में 8 फरवरी 2010 की रात हुई एक घटना से जुड़ा है।

शिकायत के अनुसार, मोहम्मद ऐनुल हक रात करीब 10 बजे एक विधवा महिला के घर में घुस गया। उस समय महिला सो रही थी। आरोप था कि उसने महिला का मुंह दबाया और उसके साथ यौन अपराध किया।

महिला के शोर मचाने पर आसपास के लोग मौके पर पहुंचे और आरोपी को पकड़ लिया। ग्रामीणों ने उसकी पिटाई भी की।

महिला ने बताया कि उसने स्थानीय पुलिस से शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। गांव की पंचायत के जरिए मामला सुलझाने की कोशिश भी सफल नहीं हुई। इसके बाद उसने 10 फरवरी 2010 को अदालत में शिकायत दर्ज कराई।

मामले की जांच के बाद आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376/511 और 448 के तहत आरोप तय किए गए।

29 जुलाई 2013 को बेगूसराय की अपर सत्र न्यायाधीश-पंचम की अदालत ने आरोपी को दोनों अपराधों में दोषी ठहराया। रेप की कोशिश के लिए उसे चार साल के कठोर कारावास और 2,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। वहीं, घर में गैरकानूनी तरीके से घुसने के अपराध में छह महीने के कठोर कारावास की सजा दी गई।

READ ALSO  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बीबीएयू को रजिस्ट्रार के खिलाफ जांच वापस लेने की अनुमति दी, नई कार्यवाही की अनुमति दी

आरोपी ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?

आरोपी की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन का मामला मुख्य रूप से महिला के बयान पर आधारित था और उसके बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास थे।

बचाव पक्ष ने बताया कि शुरुआती शिकायत में महिला ने रेप होने का आरोप लगाया था, जबकि ट्रायल के दौरान जिरह में उसने कहा कि आरोपी ने रेप करने की कोशिश की थी।

यह भी बताया गया कि महिला के कपड़े फटे नहीं थे, उसके शरीर या कपड़ों पर चोट के निशान नहीं थे और उसने कोई मेडिकल जांच भी नहीं कराई थी।

बचाव पक्ष ने इस बात पर भी जोर दिया कि मामले में जांच अधिकारी और डॉक्टर की गवाही नहीं कराई गई। इसके अलावा अभियोजन के दो गवाह अपने पहले के बयानों से मुकर गए थे।

दूसरी ओर, राज्य सरकार ने दोषसिद्धि का समर्थन करते हुए कहा कि महिला ने लगातार यह बताया था कि आरोपी रात में उसके घर में घुसा, दीया बुझाया, उसके ऊपर लेट गया और उसका मुंह दबाया।

सरकार की ओर से कहा गया कि पड़ोस में रहने वाले गवाह ने भी घटना के तुरंत बाद आरोपी के मौके पर मौजूद होने की पुष्टि की थी।

आरोपी का घर में घुसना साबित, लेकिन रेप की कोशिश नहीं

साक्ष्यों की जांच के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन यह साबित करने में सफल रहा कि आरोपी घटना वाली रात महिला के घर में घुसा था।

अदालत ने महिला और उसके पड़ोसी रामचंद्र पोद्दार की गवाही पर भरोसा किया। पड़ोसी ने बताया था कि महिला के चिल्लाने पर वह मौके पर पहुंचा और उसने ग्रामीणों को आरोपी को घर से बाहर निकालते हुए देखा।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी का महिला के घर में मौजूद होना और उसके साथ आपत्तिजनक हरकत करना साबित होना अलग बात है, जबकि रेप की कोशिश का अपराध साबित करने के लिए अलग कानूनी आवश्यकताएं पूरी होनी चाहिए।

अदालत ने कहा:

“सवाल यह नहीं है कि पीड़िता ने आरोपी के कृत्य को किस तरह बताया, बल्कि सवाल यह है कि क्या साक्ष्य उस ठोस कृत्य को साबित करते हैं, जो कानून के अनुसार रेप की कोशिश का अपराध स्थापित करने के लिए जरूरी है।”

हाईकोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 511 के तहत किसी अपराध की कोशिश साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी ने उस अपराध को अंजाम देने की दिशा में कोई कदम उठाया था।

महिला के ऊपर लेटना और मुंह दबाना धारा 354 के तहत अपराध

READ ALSO  एससीबीए ने सुप्रीम कोर्ट से 'फर्जी' याचिका मामले की सीबीआई जांच में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए आदेश में संशोधन करने का आग्रह किया

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अमन कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2004) और तारकेश्वर साहू बनाम बिहार राज्य (2006) के फैसलों का उल्लेख किया।

इन फैसलों में रेप की कोशिश और महिला की गरिमा भंग करने वाले यौन हमले के बीच अंतर स्पष्ट किया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में आरोपी का आचरण आईपीसी की धारा 354 के तहत अपराध साबित करता है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा:

“हालांकि, इस बात का कोई साक्ष्य नहीं है कि आरोपी ने अपने या पीड़िता के कपड़े उतारे थे या रेप की दिशा में कोई कृत्य किया था। ऐसे में यह नहीं माना जा सकता कि वह केवल तैयारी के चरण से आगे बढ़ चुका था और उसने ऐसा कोई काम किया था, जिसे रोका नहीं जाता तो रेप का अपराध पूरा हो जाता।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि रात में महिला के घर में घुसना, दीया बुझाना, उसके ऊपर लेटना और उसका मुंह दबाना ऐसे कृत्य हैं जो महिला की गरिमा भंग करने का अपराध स्थापित करते हैं।

लेकिन इन परिस्थितियों के आधार पर, रेप की दिशा में किसी अतिरिक्त ठोस कदम का सबूत न होने पर, धारा 376/511 के तहत दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती।

अदालत ने मदन लाल बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य (1997) के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के केवल तैयारी के चरण से आगे बढ़ने के साक्ष्य मिलने पर रेप की कोशिश की दोषसिद्धि बरकरार रखी थी।

बिना अलग आरोप तय हुए भी धारा 354 में दोषी ठहराना संभव

हाईकोर्ट के सामने एक और सवाल था कि क्या आरोपी को आईपीसी की धारा 354 के तहत दोषी ठहराया जा सकता है, जबकि ट्रायल के दौरान उसके खिलाफ इस धारा में अलग से आरोप तय नहीं किए गए थे।

अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 222(2) और सुप्रीम कोर्ट के दलबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2004) के फैसले का हवाला दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी गंभीर अपराध से जुड़ा अपेक्षाकृत कम गंभीर अपराध साक्ष्यों से साबित होता है और आरोपी को अपना बचाव करने का पूरा अवसर मिला है, तो अलग से आरोप तय न होने पर भी उसे उस अपराध में दोषी ठहराया जा सकता है।

READ ALSO  कृष्ण जन्मभूमि मामला: अदालत ने मुकदमे के हस्तांतरण की मांग वाली याचिका पर जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका दिया

अदालत ने पाया कि आरोपी को ट्रायल के दौरान संबंधित आरोपों का जवाब देने और अपना बचाव करने का पर्याप्त अवसर मिला था।

इस आधार पर हाईकोर्ट ने धारा 376/511 के तहत दोषसिद्धि हटाकर आरोपी को धारा 354 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया।

वहीं, धारा 448 के तहत घर में गैरकानूनी तरीके से घुसने की दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।

जेल में बिताई अवधि ही सजा, पीड़िता को मिलेंगे 25 हजार रुपये

सजा पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि घटना को 16 साल से अधिक समय बीत चुका है। आरोपी की उम्र अब करीब 60 वर्ष है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।

अदालत ने यह भी देखा कि आरोपी करीब ढाई महीने जेल में रह चुका है और अगस्त 2013 से जमानत पर है। इस दौरान उसके खिलाफ जमानत का दुरुपयोग करने की कोई शिकायत रिकॉर्ड पर नहीं थी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दोनों अपराधों में उसकी जेल की सजा पहले ही काटी जा चुकी अवधि तक सीमित कर दी।

हालांकि, अदालत ने कहा कि पीड़िता के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हरि सिंह बनाम सुखबीर सिंह (1988) और अंकुश शिवाजी गायकवाड़ बनाम महाराष्ट्र राज्य (2013) के फैसलों का उल्लेख करते हुए पीड़ित को मुआवजा देने के महत्व पर जोर दिया।

अदालत ने आरोपी पर धारा 354 आईपीसी के तहत 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि पूरी राशि पीड़िता को मुआवजे के रूप में दी जाए।

आरोपी को फैसले की तारीख से आठ सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में यह रकम जमा करनी होगी। जुर्माना जमा नहीं करने पर उसे छह महीने का साधारण कारावास भुगतना होगा।

इस प्रकार हाईकोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए रेप की कोशिश के अपराध में दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी। आरोपी को धारा 354 के तहत दोषी ठहराया गया, जबकि धारा 448 के तहत उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी गई।

केस का नाम: मोहम्मद ऐनुल हक बनाम बिहार राज्य

केस नंबर: क्रिमिनल अपील (एसजे) नंबर 579/2013

बेंच: जस्टिस संदीप कुमार

फैसले की तारीख: 8 अक्टूबर 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles