‘पुलिस कस्टडी’ के बिना धारा 27 के तहत बरामदगी का बयान साक्ष्य नहीं; धारा 8 के तहत आचरण का सबूत सजा के लिए काफी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने छह साल की सौतेली बेटी की हत्या के आरोपी सौतेले पिता की दोषसिद्धि (conviction) को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस की “खराब जांच” (botched investigation) के कारण आरोपी का दोष संदेह से परे साबित नहीं हो सका। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत जानकारी या बयान तभी स्वीकार्य होता है जब आरोपी उस समय “पुलिस कस्टडी” में हो।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि यदि आरोपी हिरासत में नहीं है, तो उसके द्वारा दी गई जानकारी से हुई बरामदगी केवल धारा 8 के तहत ‘आचरण’ (conduct) के रूप में प्रासंगिक हो सकती है, लेकिन यह एक कमजोर साक्ष्य है जिसके आधार पर बिना किसी अन्य पुष्टि (corroboration) के सजा नहीं दी जा सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता रोहित जांगड़े अपनी दो पत्नियों और तीन बच्चों के साथ रहता था। मृतक बच्ची उसकी दूसरी पत्नी (PW7) की पहले पति से उत्पन्न संतान थी। 5 अक्टूबर 2018 को आरोपी और उसकी पत्नी के बीच झगड़ा हुआ, जिसमें पत्नी के साथ मारपीट की गई और वह अपने मायके चली गई।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, जब PW7 की मां (बच्चों की नानी) बच्चों को लेने आरोपी के घर गई, तो उसे बताया गया कि आरोपी छोटी बच्ची को अपने साथ ले गया है। 5 अक्टूबर को ही यह जानकारी मिलने के बावजूद, बच्ची की गुमशुदगी की रिपोर्ट (FIR) 11 अक्टूबर 2018 को दर्ज कराई गई।

13 अक्टूबर 2018 को पुलिस ने दावा किया कि आरोपी के इकबालिया बयान के आधार पर एक खेत से जली हुई हड्डियां और राख बरामद की गई, तथा पास की एक नहर से साड़ी में लिपटी एक खोपड़ी और दांत बरामद हुए। डीएनए प्रोफाइलिंग में पुष्टि हुई कि दांत PW7 और उसके पूर्व पति की संतान के थे।

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दलीलें और कानूनी मुद्दे

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी को आधिकारिक गिरफ्तारी दिखाए जाने से पहले ही अवैध हिरासत में ले लिया गया था। उन्होंने गिरफ्तारी मेमो में तारीखों में की गई हेराफेरी (interpolations) की ओर इशारा किया, जिससे पता चलता है कि उसे 5 या 6 अक्टूबर को ही हिरासत में ले लिया गया था। इसने अभियोजन पक्ष के “लास्ट सीन टुगेदर” (अंतिम बार साथ देखे जाने) के सिद्धांत को कमजोर कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि क्या आरोपी के बयान के आधार पर शरीर के अंगों की बरामदगी को साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत स्वीकार किया जा सकता है, जबकि बयान दर्ज करते समय उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार नहीं किया गया था।

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सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

1. कस्टडी के अभाव में धारा 27 लागू नहीं: कोर्ट ने नोट किया कि बरामदगी का मेमो 13 अक्टूबर को सुबह 10:30 बजे बनाया गया था, जबकि औपचारिक गिरफ्तारी उसी रात 10:00 बजे दिखाई गई थी। जाफर हुसैन दस्तगीर बनाम महाराष्ट्र राज्य (1969) के फैसले का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि धारा 27 तभी लागू होती है जब जानकारी देने वाला व्यक्ति “पुलिस की हिरासत” में हो। चूंकि बयान के समय आरोपी हिरासत में नहीं था, इसलिए धारा 27 के तहत यह साक्ष्य स्वीकार्य नहीं है।

2. धारा 8 (आचरण) सजा के लिए अपर्याप्त: धर्म देव यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि भले ही बयान धारा 27 के तहत स्वीकार्य न हो, लेकिन आरोपी को शव के अवशेषों की जानकारी होना धारा 8 के तहत उसके ‘आचरण’ के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, कोर्ट ने जोर देकर कहा:

“धारा 8 के तहत साक्ष्य केवल संपुष्टि (corroboration) प्रदान कर सकता है और यह अपने आप में दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता।”

3. ‘लास्ट सीन टुगेदर’ का सिद्धांत विफल: कोर्ट ने “अंतिम बार साथ देखे जाने” के सिद्धांत को अविश्वसनीय माना क्योंकि:

  • रिकॉर्ड में हेराफेरी: गिरफ्तारी मेमो में तारीखों में बदलाव किया गया था, जिससे संदेह पैदा हुआ कि जब अपराध कथित रूप से हुआ, तब आरोपी पहले से ही पुलिस की हिरासत में हो सकता था।
  • FIR में देरी: परिवार को 5 अक्टूबर को ही पता चल गया था कि बच्ची आरोपी के साथ है, लेकिन 11 अक्टूबर तक कोई गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई गई।
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4. खराब जांच (Botched Investigation): कोर्ट ने जांच की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने पाया कि बरामद की गई खोपड़ी का डीएनए माता-पिता से मैच नहीं हुआ, हालांकि दांतों का डीएनए मैच हो गया था। जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने टिप्पणी की:

“एक खराब जांच कई सवालों को अनुत्तरित छोड़ देती है… छह साल की बच्ची की हत्या की सजा किसी को नहीं मिली और उसके सौतेले पिता को केवल अनुमानों (conjectures) के आधार पर जेल में रखा गया।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और हाईकोर्ट तथा निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आरोपी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

  • केस टाइटल: रोहित जांगड़े बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 689 ऑफ 2026

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