‘संदेह का लाभ’ मिलने पर हुई दोषमुक्ति पुलिस नियुक्ति का अधिकार नहीं देती; सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामले में ‘संदेह के लाभ’ (Benefit of Doubt) के आधार पर मिली दोषमुक्ति एक ‘तकनीकी दोषमुक्ति’ है और यह किसी उम्मीदवार को पुलिस जैसे अनुशासित बल में नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं देती है। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि नियोक्ता, विशेष रूप से स्क्रीनिंग कमेटी के पास यह निर्णय लेने का अधिकार सुरक्षित है कि क्या कोई उम्मीदवार अपनी पिछली पृष्ठभूमि के बावजूद सेवा के लिए उपयुक्त है।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें राज्य सरकार को एक उम्मीदवार की गंभीर अपराधों में दोषमुक्ति को “साफ और सम्मानजनक” (Clean and Honourable) मानने का निर्देश दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

उत्तरदाता, राजकुमार यादव ने साल 2016 में मध्य प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल (ड्राइवर) के पद के लिए आवेदन किया था। भर्ती प्रक्रिया के दौरान, उन्होंने एक हलफनामे में खुलासा किया कि 2012 में उनके खिलाफ रायसेन जिले के बेगमगंज थाने में एक आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। उन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 (अपहरण), 366, 366-ए, 376(2)(f) (बलात्कार) और 120B (आपराधिक साजिश) के तहत आरोप थे।

ट्रायल कोर्ट ने 26 सितंबर 2014 के अपने फैसले में यादव और अन्य को यह कहते हुए बरी कर दिया था कि आरोप “संदेह से परे साबित नहीं हुए” और उन्हें “संदेह का लाभ” दिया गया।

चरित्र सत्यापन के बाद, मध्य प्रदेश राज्य की स्क्रीनिंग कमेटी ने इन आपराधिक पूर्ववृत्तों (antecedents) के कारण यादव को पुलिस बल के लिए “अनुपयुक्त” पाया। यादव ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकल न्यायाधीश ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन बाद में खंडपीठ ने उस फैसले को पलटते हुए स्क्रीनिंग कमेटी के आदेश को रद्द कर दिया और राज्य को निर्देश दिया कि उनकी दोषमुक्ति को “सम्मानजनक” मानते हुए नियुक्ति पर पुनर्विचार किया जाए।

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‘सम्मानजनक दोषमुक्ति’ पर कोर्ट का विश्लेषण

पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए जस्टिस एन.वी. अंजारिया ने ‘सम्मानजनक दोषमुक्ति’ और तकनीकी आधार पर बरी होने के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। कोर्ट ने नोट किया कि “सम्मानजनक दोषमुक्ति” जैसे शब्द CrPC या IPC में नहीं हैं, बल्कि ये न्यायिक निर्णयों से निकले हैं।

कोर्ट ने कहा:

“एक सम्मानजनक दोषमुक्ति वह हो सकती है जहां अदालत साक्ष्यों के पूर्ण मूल्यांकन के बाद इस निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचती है कि आरोपी ने वह अपराध नहीं किया था जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया था… इसके विपरीत, संदेह के लाभ पर आधारित दोषमुक्ति तकनीकी आधार पर आधारित होती है।”

ट्रायल कोर्ट के फैसले की समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि ट्रायल जज ने पैराग्राफ 90 और 92 में स्पष्ट रूप से दर्ज किया था कि आरोपियों की संलिप्तता “संदिग्ध” थी और वे “संदेह का लाभ पाने के हकदार” थे। इसलिए, हाईकोर्ट का इसे ‘साफ दोषमुक्ति’ मानना गलत था।

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उपयुक्तता आंकने का नियोक्ता का अधिकार

अदालत ने दोहराया कि पुलिस सेवा के लिए अच्छे चरित्र, अखंडता और स्वच्छ पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की आवश्यकता होती है। कमिश्नर ऑफ पुलिस, नई दिल्ली बनाम मेहर सिंह (2013) के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि स्क्रीनिंग कमेटी यह तय करने के लिए सबसे उपयुक्त है कि क्या किसी उम्मीदवार की आपराधिक संलिप्तता उसे भविष्य में कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बना सकती है।

पीठ ने अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2016) और यूटी चंडीगढ़ प्रशासन बनाम प्रदीप कुमार (2018) सहित कई मिसालों का हवाला देते हुए तीन प्रमुख सिद्धांतों को रेखांकित किया:

  1. आपराधिक मामले में दोषमुक्ति उम्मीदवार की उपयुक्तता का निर्णायक सबूत नहीं है।
  2. दोषमुक्ति मिलने से उम्मीदवार को पद पर नियुक्ति का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता।
  3. नियोक्ता के पास उम्मीदवार की पृष्ठभूमि पर विचार करने का अधिकार है, भले ही उम्मीदवार ने जानकारी का खुलासा ईमानदारी से किया हो।

कोर्ट ने आगे टिप्पणी की:

“ऐसे मामले में जहां तथ्य स्पष्ट हों, किसी कथित अपराध या नैतिक अधमता (moral turpitude) के कार्य में व्यक्ति की केवल संलिप्तता ही उसे रोजगार दिए जाने के लिए एक बाधक कारक मानने के लिए पर्याप्त हो सकती है।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि स्क्रीनिंग कमेटी ने यादव की उम्मीदवारी को खारिज करने में अपने विवेक का सही इस्तेमाल किया था, क्योंकि उन पर अपहरण और बलात्कार जैसे गंभीर आरोप थे। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने नियोक्ता के “कार्यात्मक क्षेत्र” में हस्तक्षेप किया और कमेटी के विवेक को नजरअंदाज किया।

न्यायालय के अनुसार:

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“अदालतों से यह अपेक्षा नहीं की जाती है कि वे किसी उम्मीदवार की उपयुक्तता को आंकने और उसके पूर्ववृत्तों की प्रासंगिकता पर विचार करने में नियोक्ता की बुद्धिमत्ता को खारिज करें और अपना दृष्टिकोण थोपें।”

इन निष्कर्षों के साथ, सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश राज्य द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।

केस का विवरण:

  • केस का शीर्षक: मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य बनाम राजकुमार यादव
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर 3279/2026 (एस.एल.पी. (सिविल) नंबर 10967/2024 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
  • फैसले की तारीख: 11 मार्च, 2026

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