राजस्थान हाईकोर्ट (Rajasthan High Court) ने अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म करने वाले एक पिता की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने दोषी की अपील को खारिज करते हुए इस कृत्य को “पिता और बेटी के सबसे पवित्र और स्वाभाविक रिश्ते के साथ पूर्ण विश्वासघात” करार दिया। कोर्ट ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार को पीड़िता को मुआवजे के रूप में 7 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश भी दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला डूंगरपुर जिले का है। घटना की शुरुआत 17 अगस्त 2022 को हुई, जब पीड़िता की मां (शिकायतकर्ता) ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 11 अगस्त 2022 को मां रक्षाबंधन मनाने के लिए अपने भाई के घर गई थी, जबकि उसके बच्चे और पति घर पर ही थे।
जब वह 13 अगस्त की शाम को वापस लौटी, तो कक्षा 7 में पढ़ने वाली उसकी बड़ी बेटी ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई। बच्ची ने बताया कि 12 अगस्त की रात को उसके पिता ने उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। पीड़िता ने यह भी खुलासा किया कि इससे पहले भी दो बार, जब मां सर्जरी के लिए बाहर गई थी, आरोपी ने उसके साथ गलत काम किया था और किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी दी थी। पुलिस ने जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की और ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए ‘मृत्यु तक आजीवन कारावास’ की सजा सुनाई थी।
दलीलें
अपीलकर्ता (आरोपी) की ओर से पेश एमिकस क्यूरी अमरदीप लांबा ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। उन्होंने दलील दी कि शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच गंभीर वैवाहिक विवाद थे और पत्नी तलाक चाहती थी, जिसे पति ने मना कर दिया था। इसी रंजिश के चलते आरोपी को झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि एफएसएल (FSL) और डीएनए रिपोर्ट निगेटिव थी, जो आरोपी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण सबूत है।
दूसरी ओर, राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे लोक अभियोजक राजेश भाटी ने अपील का विरोध किया। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला ठोस सबूतों और पीड़िता की गवाही पर आधारित है, जिसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और फैसला
रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की बारीकी से जांच करने के बाद, हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने अपना मामला सफलतापूर्वक स्थापित किया है।
- पीड़िता की विश्वसनीयता: कोर्ट ने माना कि पीड़िता (PW-1) की गवाही “स्वाभाविक, ठोस और सुसंगत” है। कोर्ट ने कहा, “स्वयं अपराध की शिकार होने के नाते और अपने ही पिता को झूठा फंसाने का कोई कारण न होने के कारण, उसकी गवाही घटना का सबसे अच्छा सबूत है।” एफआईआर में देरी को भी कोर्ट ने बच्ची के डर और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उचित माना।
- दोषी होने का कानूनी अनुमान: भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(ए) और पॉक्सो एक्ट की धारा 29 का हवाला देते हुए, बेंच ने स्पष्ट किया कि एक बार बुनियादी तथ्य स्थापित हो जाते हैं, तो आरोपी के खिलाफ कानूनी अनुमान (Statutory Presumption) लागू होता है। चूंकि पीड़िता 12 साल से कम उम्र की थी, इसलिए सहमति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
- डीएनए रिपोर्ट और बचाव पक्ष के तर्क: कोर्ट ने वैवाहिक कलह के कारण झूठा फंसाने की दलील को “पूरी तरह से निराधार” बताते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह दिखाए कि मां अपनी बेटी की गरिमा की कीमत पर पति को फंसाएगी। मेडिकल साक्ष्यों ने भी पीड़िता के बयानों की पुष्टि की।
अपराध की प्रकृति पर टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपराध की निंदा करते हुए कहा:
“यौन अपराध, विशेष रूप से वे जो बच्चों के खिलाफ किए जाते हैं, ऐसे घाव देते हैं जो कृत्य की तात्कालिकता से कहीं आगे तक बने रहते हैं… जहां अपराधी पिता होता है—वह व्यक्ति जिसे बच्चे के प्राकृतिक रक्षक के रूप में भरोसा सौंपा गया है—वहां अपराध सामान्य आपराधिकता से परे चला जाता है और एक घृणित रूप ले लेता है।”
निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट), डूंगरपुर के 14 नवंबर 2022 के फैसले की पुष्टि की और अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के भनई प्रसाद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2025 INSC 934) के फैसले पर भरोसा जताते हुए, बेंच ने पीड़िता के पुनर्वास के लिए राज्य सरकार को 2018 की योजना के तहत 7,00,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: मनोज पुत्र शंकर बनाम राजस्थान राज्य और अन्य
- केस नंबर: डी.बी. क्रिमिनल अपील (DB) नंबर 41/2023
- कोरम: जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा
- अपीलकर्ता के वकील: श्री अमरदीप लांबा (एमिकस क्यूरी)
- प्रतिवादी के वकील: श्री राजेश भाटी, पीपी

