पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने फांसी की सजा रद्द की; झज्जर की मासूम से दुष्कर्म-हत्या मामले में दोबारा ट्रायल का आदेश

पांच वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में झज्जर की एक अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। अदालत ने पाया कि ट्रायल के दौरान गंभीर प्रक्रियागत खामियां हुईं, जिससे आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हुआ। हाईकोर्ट ने मामले को पुनः विचार के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया है।

न्यायमूर्ति अनुप छितकारा और न्यायमूर्ति सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 313 के तहत आरोपी के बयान दर्ज करने में “गंभीर त्रुटियां” थीं, जिससे आरोपी को अपनी सफाई देने का मौका नहीं मिला।

झज्जर निवासी 32 वर्षीय प्लंबर विनोद को 21 दिसंबर 2021 को निचली अदालत ने एक प्रवासी मजदूर की पांच साल की बेटी के साथ दुष्कर्म और हत्या के आरोप में दोषी करार देते हुए मृत्युदंड सुनाया था। आरोप के अनुसार, 20 दिसंबर 2020 को आरोपी ने शराब के नशे में बच्ची को उसके घर से उठाकर अपने घर ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया और हत्या कर दी। कुछ ही घंटों बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर बच्ची का शव बरामद किया।

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सजा के बाद, विनोद ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। साथ ही, कानून के मुताबिक, फांसी की सजा होने के चलते मामला पुष्टि के लिए स्वतः ही हाईकोर्ट को भेजा गया था।

हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल के दौरान जिन गवाहों — विशेष रूप से बच्ची के माता-पिता — के बयानों को आधार बनाया गया था, उन्हें ठीक से और स्पष्ट रूप से आरोपी के समक्ष नहीं रखा गया। इसके अलावा, फॉरेंसिक डीएनए रिपोर्ट और विषविज्ञान रिपोर्ट जैसे अहम दस्तावेज भी आरोपी से धारा 313 CrPC के तहत पूछताछ करते समय प्रस्तुत नहीं किए गए।

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अदालत ने कहा, “यह रिपोर्ट (डीएनए रिपोर्ट) सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य है और यदि इसे आरोपी को अपनी सफाई देने का अवसर दिए बिना साक्ष्य में पढ़ा गया, तो यह आरोपी के साथ अन्याय होगा।”

इसके अलावा, अदालत ने यह भी पाया कि लड़की के पिता की लंबी गवाही को एक ही प्रश्न के रूप में आरोपी के समक्ष रखा गया और उसके बाद यह कह दिया गया कि मां की गवाही भी इसी प्रकार की है। अदालत ने इसे “सामान्य व्यक्ति के लिए समझ पाना अत्यंत कठिन” बताया और कहा कि यह धारा 313 की भावना के खिलाफ है।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 313 केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का संवैधानिक अधिकार दिलाने का माध्यम है। विशेष रूप से मौत की सजा जैसे मामलों में इस प्रक्रिया का पालन करना अत्यंत आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि:

  • ट्रायल को उस चरण से दोबारा शुरू किया जाए जहां आरोपी का बयान धारा 313 CrPC के तहत दर्ज किया जाना था।
  • सभी आरोपों और साक्ष्यों को छोटे-छोटे, स्पष्ट प्रश्नों के रूप में आरोपी के समक्ष रखा जाए।
  • आरोपी को अपनी सफाई देने का पूरा अवसर दिया जाए और यदि वह कोई बचाव साक्ष्य प्रस्तुत करना चाहे, तो उसकी भी जांच हो।
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अंत में, अदालत ने कहा कि “आरोपी के साथ-साथ पीड़िता और उसके परिवार को भी न्याय दिलाने का यही एकमात्र तरीका है।”

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