पंजाब के कंज्यूमर कमीशन ने कनाडा से खरीदी गई एक ब्रांडेड जैकेट को ड्राई क्लीनिंग के दौरान खराब करने और वादा करने के बावजूद पैसे न लौटाने पर एक सर्विस सेंटर को 63,494 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि ग्राहक के सामान को नुकसान पहुंचाना और अपनी गलती स्वीकार करने के बाद भी मुआवजा न देना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत सेवा में गंभीर कोताही माना जाएगा।
30 दिनों में भुगतान न करने पर लगेगा ब्याज
उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के अध्यक्ष एस.के. अग्रवाल और सदस्य परमजीत कौर तथा लेफ्टिनेंट कर्नल जसबीर सिंह बाथ की पीठ ने यह आदेश दिया। आयोग ने ड्राई क्लीनिंग फर्म को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता को जैकेट की कीमत के रूप में 795 कनाडाई डॉलर का भारतीय मूल्य यानी 53,494 रुपये लौटाए। इसके साथ ही, मानसिक उत्पीड़न और कानूनी खर्च के मुआवजे के रूप में 10,000 रुपये का अतिरिक्त भुगतान करने के लिए कहा गया है।
आयोग के अनुसार, इस राशि का भुगतान आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 30 दिनों के भीतर करना अनिवार्य है। यदि तय समय सीमा के अंदर भुगतान नहीं किया जाता है, तो मूल राशि 53,494 रुपये पर छह प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज देना होगा।
कपड़े सुखाने के बहाने टाली डिलीवरी
मामले के अनुसार, ग्राहक ने अपनी एक महंगी जैकेट और स्वेटर ड्राई क्लीनिंग के लिए दिए थे। तय तारीख पर जब वह कपड़े लेने दुकान पहुंचे, तो कर्मचारियों ने कपड़े गीले होने का हवाला देते हुए उन्हें सीधे घर पर डिलीवर करने का आश्वासन दिया।
जब कपड़े घर नहीं पहुंचे, तो ग्राहक दोबारा दुकान गया। वहां उन्होंने देखा कि जैकेट पूरी तरह से दाग-धब्बों से भरी, गीली और खराब हो चुकी थी। ग्राहक ने खराब कपड़े स्वीकार करने से मना कर दिया। इस पर दुकान के प्रतिनिधियों ने अपनी गलती मानी और एक सप्ताह के अंदर जैकेट के मूल्य 795 कनाडाई डॉलर के बराबर राशि लौटाने की प्रतिबद्धता जताई।
दुकानदार ने लीगल नोटिस को भी किया नजरअंदाज
आश्वासन देने के बावजूद जब ड्राई क्लीनर ने पैसे नहीं लौटाए, तो ग्राहक ने लीगल नोटिस भेजा। इसके बाद भी कोई समाधान न निकलने पर मामला कंज्यूमर कमीशन पहुंचा। सुनवाई के दौरान आयोग ने इंटरनेट पर उपलब्ध विदेशी मुद्रा विनिमय दर के आधार पर 795 कनाडाई डॉलर की भारतीय मुद्रा में कीमत 53,493.96 रुपये तय की, जिसे राउंड ऑफ करके 53,494 रुपये माना गया।
मामले की सुनवाई के दौरान ड्राई क्लीनिंग फर्म के वकील 14 अक्टूबर 2025 को आयोग के समक्ष पेश हुए थे। हालांकि, इसके बाद फर्म की ओर से निर्धारित समय के भीतर कोई लिखित जवाब दाखिल नहीं किया गया, जिसके कारण आयोग ने उनका पक्ष रखने का अधिकार समाप्त कर दिया। इसके बाद विपक्षी पक्ष की ओर से कोई भी सुनवाई में शामिल नहीं हुआ, जिसके चलते आयोग ने शिकायतकर्ता के साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर यह फैसला सुनाया।

