नई दिल्ली: सरकारी निविदा कानून और राज्य की संविदात्मक शक्तियों के प्रयोग पर एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली शामिल थे, ने मध्य प्रदेश के शहडोल और कटनी जिलों में रेत खनन समूहों के लिए ई-टेंडर-कम-नीलामी को रद्द करने के आदेश को खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी बोलीदाता द्वारा पूर्व में दी गई व्यावसायिक पेशकश अपने आप में बाद की प्रतिस्पर्धी नीलामी प्रक्रिया में मौजूदा बाजार मूल्य तय करने का अपरिवर्तनीय पैमाना नहीं बन सकती। इसके साथ ही अदालत ने मध्य प्रदेश स्टेट माइनिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड को उच्चतम बोलीदाताओं के पक्ष में सितंबर 2025 की निविदा प्रक्रिया बहाल करने का निर्देश दिया है।
विवाद की पृष्ठभूमि
मध्य प्रदेश रेत (खनन, परिवहन, भंडारण एवं व्यापार) नियम, 2019 (मई 2023 में संशोधित) के तहत खनन पट्टे कॉर्पोरेशन के पास रहे, जबकि प्रतिस्पर्धी बोली के माध्यम से खदान डेवलपर-सह-ऑपरेटरों (एमडीओ) की नियुक्ति की जानी थी। सहकार ग्लोबल लिमिटेड ने 12 जनवरी 2024 को 68,84,25,999 रुपये की वार्षिक बोली लगाकर शहडोल रेत समूह हासिल किया था। हालांकि, सभी 34 अधिसूचित खदानों के लिए वैधानिक पर्यावरण मंजूरियां उपलब्ध न होने के कारण परिचालन संबंधी विवाद उत्पन्न हो गए। इसके चलते सहकार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां से उसे अंतरिम आदेश मिला जिसके तहत भुगतान को वास्तविक खनिज निकासी से जोड़ दिया गया। इसके बाद सहकार ने नियम 16 के तहत अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए 11 जुलाई 2025 को अनुबंध सरेंडर कर दिया।
इसी तरह, धनलक्ष्मी मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड ने 1 नवंबर 2023 को 64,77,66,000 रुपये की वार्षिक बोली पर कटनी रेत समूह प्राप्त किया था। कंपनी ने परिचालन व्यय, परिवहन लागत और मांग में कमी का हवाला देते हुए 1 अगस्त 2025 को यह समूह सरेंडर कर दिया। उस समय लागू नियम 16 के तहत तीन महीने के अग्रिम नोटिस पर सरेंडर करने की अनुमति थी और इसमें अनुबंध सरेंडर करने वाले ठेकेदारों को दोबारा निकलने वाली निविदा में भाग लेने से रोकने का कोई प्रावधान नहीं था।
18 सितंबर 2025 को कॉर्पोरेशन के निदेशक मंडल ने सरेंडर नियमों को सख्त करने के लंबित प्रस्तावों के बावजूद रेत की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए तत्कालीन नियमों के तहत ही नए सिरे से निविदाएं आमंत्रित करने का फैसला किया। उसी दिन नई निविदा सूचना जारी की गई, जिसमें शहडोल के लिए 44 करोड़ रुपये और कटनी के लिए 50 करोड़ रुपये का रिजर्व प्राइस (आरक्षित मूल्य) तय किया गया।
10 अक्टूबर 2025 को आयोजित वित्तीय ई-नीलामी में शहडोल के लिए सात बोलीदाताओं ने भाग लिया, जहां सहकार 48,20,40,000 रुपये की उच्चतम (एच1) बोली लगाकर विजेता बना (जो रिजर्व प्राइस से 4.20 करोड़ रुपये अधिक थी)। कटनी के लिए पांच बोलीदाताओं ने प्रतिस्पर्धा की, जिसमें धनलक्ष्मी 54,07,41,111 रुपये की बोली के साथ एच1 रही (जो रिजर्व प्राइस से 4.07 करोड़ रुपये अधिक थी)।
यद्यपि 11 नवंबर 2025 की एक आंतरिक कानूनी राय में स्पष्ट किया गया था कि सफल बोलीदाता न तो अयोग्य हैं और न ही ब्लैकलिस्टेड, फिर भी बोर्ड ने 19 नवंबर 2025 को यह मानते हुए दोनों जिलों की नीलामी रद्द कर दी कि प्राप्त दरें प्रतिस्पर्धी नहीं थीं। बोर्ड ने नई बोलियों की तुलना पिछले सरेंडर किए गए अनुबंधों से की और पाया कि शहडोल में 29.98 प्रतिशत तथा कटनी में 16.52 प्रतिशत की गिरावट आई थी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 18 मार्च 2026 को ठेकेदारों की याचिका खारिज कर दी और माना कि सार्वजनिक राजस्व की सुरक्षा के लिए नीलामी रद्द करना उचित था।
पक्षों की दलीलें
सहकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि कॉर्पोरेशन ने मनमाने ढंग से दो अलग-अलग व्यावसायिक परिस्थितियों की तुलना की। शहडोल की पिछली बोली वैधानिक मंजूरियों की कमी से जूझ रही थी, क्योंकि 34 में से केवल 23 खदानों के लिए पर्यावरण मंजूरी उपलब्ध थी। उन्होंने तर्क दिया कि सहकार ने असंशोधित नियम 16 के तहत सरेंडर के वैध अधिकार का प्रयोग किया था, रिजर्व प्राइस से ऊपर कई बोलीदाताओं के बीच वास्तविक प्रतिस्पर्धा हुई थी, और 30 जनवरी 2026 को नियमों में किए गए उस संशोधन को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता, जिसने सरेंडर करने वाले एमडीओ के दोबारा शामिल होने पर रोक लगाई थी।
धनलक्ष्मी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कहा कि यद्यपि कटनी में पर्यावरण मंजूरी से जुड़ा कोई विवाद नहीं था, लेकिन अतीत का कोई व्यावसायिक अनुमान भविष्य के बाजार मूल्य को हमेशा के लिए सीमित नहीं कर सकता। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसा कोई मूल्यांकन या बाजार संबंधी आंकड़ा पेश नहीं किया गया जिससे साबित हो कि अक्टूबर 2025 में 54.07 करोड़ रुपये का प्रस्ताव व्यावसायिक रूप से अपर्याप्त था। केवल संख्यात्मक अंतर को सरकारी खजाने का नुकसान नहीं माना जा सकता।
अपीलों का विरोध करते हुए राज्य और कॉर्पोरेशन की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता तथा वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने दलील दी कि उच्चतम बोलीदाता को अनुबंध पाने का कोई निहित अधिकार प्राप्त नहीं होता। निविदा शर्तों के क्लॉज 6.6.3 और 26 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कॉर्पोरेशन के पास बोलियों को खारिज करने का व्यापक व्यावसायिक अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि बोर्ड का यह कदम उस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए उचित था जिसके तहत ठेकेदार ऊंचे मूल्य के अनुबंध सरेंडर करते हैं और कुछ ही हफ्तों बाद भारी रियायती दरों पर उन्हीं समूहों को दोबारा हासिल कर लेते हैं। बाद में फरवरी 2026 में जारी निविदा के बोलीदाताओं के वकीलों ने भी प्रक्रिया बहाल करने का विरोध किया और कहा कि बाद की प्रक्रिया में अधिक शुरुआती दरें मिली थीं।
कोर्ट का विश्लेषण
निविदा मामलों में अनुच्छेद 14 के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि एच1 बोलीदाता को अनुबंध आवंटन का कोई पूर्ण अधिकार नहीं होता, फिर भी सार्वजनिक प्राधिकरण अपने संविदात्मक विवेक का मनमाना इस्तेमाल नहीं कर सकते। टाटा सेलुलर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया बनाम कामधेनु कैटल फीड इंडस्ट्रीज और गोल्डन फूड प्रोडक्ट्स इंडिया बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश जैसे पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए पीठ ने जोर दिया कि किसी भी बोली को खारिज करने का आधार तर्कसंगत और सुसंगत सामग्री पर टिका होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“ऐसी जांच के लिए पिछली बोली निश्चित रूप से प्रासंगिक हो सकती है। यह दर्शा सकती है कि उसी परिसंपत्ति ने पहले अधिक प्रतिबद्धता आकर्षित की थी और यह जांचने का आधार बन सकती है कि बाद की प्रतिस्पर्धा संतोषजनक थी या नहीं। लेकिन पिछली बोली, अपने आप में, बाजार मूल्य का निरंतर निर्धारण नहीं है। यह केवल यह दर्ज करती है कि किसी बोलीदाता ने पूर्व की संविदात्मक स्थिति में क्या भुगतान करने का वचन दिया था। उस सौदे से उत्पन्न देनदारियां अपनी शर्तों के अनुसार लागू रहती हैं, लेकिन एक बार उद्धृत की गई राशि उसी जिला समूह की प्रत्येक बाद की नीलामी के लिए अपने आप स्थायी न्यूनतम दर नहीं बन जाती।”
पीठ ने रेखांकित किया कि नई निविदाएं पुराने पट्टों की शेष अवधि के लिए नहीं थीं, बल्कि नियमों के तहत पूरे तीन साल के नए कार्यकाल के लिए थीं। बोर्ड को न तो सांठगांठ, कार्टेलाइजेशन या प्रक्रिया में हेरफेर का कोई सबूत मिला था, और न ही उसने अक्टूबर 2025 में वास्तविक बाजार मूल्य तय करने के लिए कोई समकालीन मूल्यांकन कराया था।
सार्वजनिक राजस्व के तर्क के अंधाधुंध इस्तेमाल पर असहमति जताते हुए कोर्ट ने कहा:
“सार्वजनिक राजस्व निस्संदेह एक महत्वपूर्ण विचार है, लेकिन राज्य की कार्रवाई में निष्पक्षता, सार्वजनिक व्यवहार में निश्चितता और उन प्रक्रियाओं की शुचिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जिनके माध्यम से राज्य निजी पक्षों को सार्वजनिक अवसरों के लिए प्रतिस्पर्धा करने हेतु आमंत्रित करता है।”
पीठ ने आगे माना:
“वर्तमान मामले में, बोर्ड ने यह तो स्थापित कर दिया कि अपीलकर्ताओं की वर्तमान बोलियां उनकी पिछली बोलियों से काफी कम थीं। लेकिन वह यह स्थापित नहीं कर सका कि मौजूदा बोलियां उस मूल्य से काफी कम थीं जो राज्य अक्टूबर 2025 में बाजार से प्राप्त करने की उचित उम्मीद कर सकता था। ये दोनों एक समान निष्कर्ष नहीं हैं।”
कोर्ट ने 30 जनवरी 2026 के नियम संशोधन को पिछली तारीख से लागू करने और नीलामी रद्द करने को सही ठहराने के लिए फरवरी 2026 की निविदा पर निर्भर रहने के तर्क को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी पुराने निर्णय की वैधता उस समय उपलब्ध समकालीन रिकॉर्ड के आधार पर ही तय होनी चाहिए जब वह निर्णय लिया गया था।
कोर्ट का निर्णय
अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया और शाहडोल तथा कटनी के संबंध में बोर्ड के 19 नवंबर 2025 के फैसले और 5 दिसंबर 2025 के रद्दीकरण नोटिस को रद्द कर दिया। मामले को दोबारा विचार के लिए कॉर्पोरेशन के पास भेजने से इनकार करते हुए कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:
- शाहडोल और कटनी के लिए सितंबर 2025 की निविदा प्रक्रिया बहाल की जाती है।
- सहकार और धनलक्ष्मी को दो सप्ताह के भीतर अपनी अंतिम बोलियों (क्रमशः 48,20,40,000 रुपये और 54,07,41,111 रुपये) पर कायम रहने की बिना शर्त सहमति कॉर्पोरेशन को देनी होगी।
- कॉर्पोरेशन को उसके बाद के दो सप्ताह के भीतर आवश्यक सुरक्षा और परफॉरमेंस गारंटी संबंधी औपचारिकताओं की जानकारी देनी होगी, और सभी औपचारिकताएं पूरी होने के छह सप्ताह के भीतर आवंटन प्रक्रिया, आशय पत्र (एलओआई) और अनुबंध निष्पादन पूरा करना होगा।
- शाहडोल और कटनी के लिए 10 फरवरी 2026 को शुरू की गई बाद की निविदा प्रक्रिया बंद की जाती है, और उस दौर के प्रतिभागियों की बयाना राशि (ईएमडी) चार सप्ताह के भीतर वापस की जाएगी।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय पूर्व में सरेंडर किए गए अनुबंधों के तहत बकाया राशि, खातों या देनदारियों का फैसला नहीं करता है, और न ही यह भविष्य की निविदाओं के लिए 30 जनवरी 2026 के नियम संशोधनों की वैधता पर कोई सवाल उठाता है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मैसर्स धनलक्ष्मी मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य (सहकार ग्लोबल लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य के साथ)
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 13749 एवं 13750/2026
पीठ: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 14 अक्टूबर 2026

