दहेज हत्या के आरोपों से जुड़े जमानत कानून के एक महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस मनीष कुमार ने नए आपराधिक कानूनों के तहत आरोपित एक पति को नियमित जमानत देने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि आवेदक के खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य और व्यापक प्रकृति के हैं, मृतका के शरीर पर फंदे के निशान के अलावा चोट का कोई अन्य निशान नहीं पाया गया है, और जब मृतका अपने मायके में इलाज करा रही थी, तब पति ने उसके और उसके परिजनों के बैंक खातों में नियमित रूप से पैसे भेजे थे। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि आवेदक जमानत पाने का प्रथम दृष्टया हकदार है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के बाजार शुकुल थाने में दर्ज अपराध संख्या 0134/2026 से संबंधित है। यह प्राथमिकी भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 85 और 80(2)—जो पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498-ए और 304-बी के समकक्ष हैं—तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत दर्ज की गई थी। प्राथमिकी में शुरुआत में बीएनएस की धारा 115(2) और 352 भी शामिल की गई थी। यह प्राथमिकी मृतका के पिता ने 5 जून 2026 को दर्ज कराई थी, जिसमें पति समेत ससुराल पक्ष के कुल 10 नामजद सदस्यों पर आरोप लगाए गए थे।
प्राथमिकी के अनुसार, शिकायतकर्ता की बेटी का विवाह 13 जुलाई 2024 को हुआ था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि बीते एक साल से सभी आरोपी अतिरिक्त दहेज के लिए उसकी बेटी को प्रताड़ित कर रहे थे। यह भी आरोप लगाया गया कि मृतका गर्भवती थी और उसका पति उस पर गर्भपात कराने का दबाव बना रहा था, जिसके चलते पति और उसके रिश्तेदारों ने मिलकर उसकी हत्या की साजिश रची। 5 जून 2026 को सुबह 9:50 बजे मृतका के देवर ने फोन कर सूचना दी कि उसकी तबीयत खराब है और उसे सरकारी अस्पताल ले जाया जा रहा है। इसके कुछ ही देर बाद दोबारा फोन कर बताया गया कि उसने आत्महत्या कर ली है। इसके बाद पुलिस ने पति को गिरफ्तार कर लिया और वह 15 जून 2026 से न्यायिक हिरासत में जेल में बंद था।
आवेदक पक्ष की दलीलें
आवेदक की ओर से अधिवक्ता अभिषेक सिंह, अनुज कुमार गुप्ता और गौतम सिंह यादव ने पैरवी की। अधिवक्ताओं ने दलील दी कि प्राथमिकी में पूरे परिवार को केवल सामान्य, अस्पष्ट और मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर नामजद किया गया है।
बचाव पक्ष ने कहा कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का कारण फंदे से लटकने के कारण दम घुटना (एस्फिक्सिया ड्यू टू एंटी-मॉर्टम हैंगिंग) बताया गया है। मृतका के शरीर पर फांसी के दो निशानों के अलावा कोई चोट नहीं पाई गई। चूंकि दूसरा निशान पहले निशान से कुछ दूरी पर था, इसलिए यह शारीरिक साक्ष्य साफ तौर पर दर्शाता है कि मृतका के साथ मौत से ठीक पहले किसी प्रकार की क्रूरता या उत्पीड़न नहीं किया गया था, बल्कि यह आत्महत्या का मामला है।
अपनी दलीलों के समर्थन में आवेदक के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के मंगत राम बनाम हरियाणा राज्य मामले के फैसले का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की थी कि “कोई महिला विभिन्न कारणों से आत्महत्या का प्रयास कर सकती है, जैसे अवसाद, वित्तीय कठिनाइयां, प्रेम में निराशा, घरेलू चिंताओं से तंग आना, तीव्र या पुरानी बीमारियां आदि और यह आवश्यक नहीं है कि यह किसी उकसावे के कारण ही हो।”
अदालत को यह भी बताया गया कि मृतका गर्भावस्था के कारण 7 मार्च 2026 से अपने मायके में रह रही थी और अपनी मौत से महज दो दिन पहले ही ससुराल लौटी थी। वकीलों ने अदालत के समक्ष चिकित्सीय दस्तावेज पेश कर बताया कि मृतका दोनों स्तनों में दर्द का इलाज करा रही थी, उसका एमआरआई कराया गया था और वह इस बीमारी के कारण अवसाद में थी।
इसके अलावा, बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि जब पत्नी मायके में रह रही थी, तब पति ने नियमित रूप से आर्थिक सहायता भेजी थी। उसने 50,000 रुपये अपनी पत्नी को, 16,200 रुपये अपने साले को और 94,000 रुपये अपनी सास के खाते में भेजे थे। आवेदक सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में मैसेंजर के पद पर कार्यरत है और प्रयागराज में तैनात है। उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और सेवा का आधिकारिक प्रमाण पत्र भी रिकॉर्ड पर रखा गया।
सुप्रीम कोर्ट के चरण सिंह उर्फ चरणजीत सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य फैसले का संदर्भ देते हुए वकीलों ने कहा कि मौत से ठीक पहले दहेज के लिए क्रूरता या उत्पीड़न का पुख्ता सबूत न होने की स्थिति में आईपीसी की धारा 304-बी, 498-ए और 201 के तहत दोषसिद्धि नहीं टिक सकती, इसलिए आवेदक जमानत पर रिहा होने का हकदार है।
राज्य और शिकायतकर्ता का विरोध
जमानत याचिका का विरोध राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) और शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता रोमिल सागर श्रीवास्तव, लालू प्रसाद भट्ट और नरेंद्र कुमार शर्मा ने किया।
हालांकि, सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता के वकील इन महत्वपूर्ण तथ्यों पर विवाद नहीं कर सके कि मृतका गर्भावस्था के कारण मार्च 2026 से मायके में रह रही थी, वह गंभीर शारीरिक बीमारी से पीड़ित थी और आवेदक ने मृतका तथा उसके परिजनों के बैंक खातों में उल्लेखित धनराशि ट्रांसफर की थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और पत्रावली का परीक्षण करने के बाद जस्टिस मनीष कुमार ने मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणियां दर्ज कीं:
“संबंधित पक्षों के विद्वान वकीलों की दलीलों पर विचार करने और मामले के रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद, प्रथम दृष्टया यह पाया गया है कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप सामान्य और व्यापक (ऑम्निबस) प्रकृति के प्रतीत होते हैं; मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार मौत का कारण फांसी लगाने से पहले दम घुटना (एस्फिक्सिया ड्यू टू एंटी-मॉर्टम हैंगिंग) दर्शाया गया है; मृतका के शरीर पर फंदे के निशान के अलावा कोई चोट नहीं पाई गई है, जिसका तात्पर्य यह है कि मौत से पहले कोई क्रूरता नहीं दिखाई गई है; प्रथम दृष्टया यह पाया गया है कि जिस अवधि के दौरान मृतका अपने मायके में थी और उसका इलाज चल रहा था, उस दौरान आवेदक ने पैसे या तो उसके खाते में या फिर अपने साले और सास के खाते में भेजे थे, जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है और इस पर कोई विवाद नहीं है। आवेदक ने जमानत दिए जाने के लिए मामला बना लिया है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
आवेदक को राहत का हकदार मानते हुए हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी स्वीकार कर ली और संबंधित विचारण न्यायालय की संतुष्टि के अनुरूप एक व्यक्तिगत बंधपत्र और समान राशि के दो प्रतिभू (जमानतदार) प्रस्तुत करने पर उसे रिहा करने का आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने जमानत के साथ निम्नलिखित शर्तें तय कीं:
- आवेदक विचारण के दौरान साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा।
- वह अभियोजन के गवाहों पर दबाव नहीं बनाएगा और न ही उन्हें धमकाएगा।
- वह कोई भी अपराध नहीं करेगा।
- वह विचारण न्यायालय के समक्ष नियत प्रत्येक तिथि पर व्यक्तिगत रूप से या अपने अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित रहेगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि इन शर्तों में से किसी का भी उल्लंघन होता है, तो निचली अदालत इसे जमानत की स्वतंत्रता का दुरुपयोग मानते हुए विधि सम्मत कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगी। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां केवल जमानत के निस्तारण तक सीमित हैं और इनका मुकदमे के अंतिम गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मनोज कुमार पाल उर्फ मनोज पाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रमुख सचिव गृह विभाग लखनऊ
वाद संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लीकेशन संख्या 7440/2026
पीठ: जस्टिस मनीष कुमार

