सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पारिवारिक समझौते और कोर्ट की मंजूरी से हुए समझौते के तहत किसी संपत्ति पर अपना अधिकार छोड़ने वाला व्यक्ति बाद में उसी संपत्ति को किसी अन्य व्यक्ति को गिफ्ट नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति संपत्ति पर अपना दावा पूरी तरह छोड़ चुका है, तो उसे बाद में उस संपत्ति को किसी दूसरे के नाम करने का अधिकार नहीं रह जाता।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने इस टिप्पणी के साथ तेलंगाना हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया। दोनों अदालतों ने एक रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड को चुनौती देने वाला मुकदमा खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि निचली अदालतों ने पुराने पारिवारिक बंटवारे और कोर्ट से मंजूर समझौते के महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके मूल मुकदमे में मांगी गई राहतें मंजूर कर लीं। इनमें विवादित जमीन पर मालिकाना हक की घोषणा और गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित करने की मांग शामिल थी।
क्या था पूरा विवाद?
मामला एक परिवार की पुश्तैनी संपत्ति के बंटवारे से जुड़ा है। बी. वेंकट रेड्डी और उनके बड़े बेटे सुधाकर रेड्डी की 1948 में रजाकार आंदोलन के दौरान मृत्यु हो गई थी। इसके बाद परिवार की संपत्तियों को लेकर 19 अप्रैल 1959 को एक समझौता हुआ।
इस समझौते के तहत वेंकट रेड्डी की पत्नी माणिक्यम्मा, सुधाकर रेड्डी की पत्नी अनसूयम्मा और परिवार के दो अन्य बेटों मधुसूदन रेड्डी तथा जनार्दन रेड्डी के बीच संपत्तियों का बंटवारा किया गया।
माणिक्यम्मा को करकलपहाड़ गांव में 53 एकड़ 10 गुंटा जमीन मिली। अनसूयम्मा को विभिन्न गांवों में कुल 91 एकड़ 22 गुंटा जमीन दी गई, जिसमें करकलपहाड़ की 40 एकड़ 1 गुंटा जमीन भी शामिल थी।
मधुसूदन रेड्डी को कुल 62 एकड़ 9 गुंटा जमीन मिली, लेकिन करकलपहाड़ गांव में उनके हिस्से में केवल सर्वे नंबर 15 की 1 एकड़ 30 गुंटा जमीन आई थी। वहीं जनार्दन रेड्डी को 131 एकड़ 7 गुंटा जमीन आवंटित हुई।
1986 के समझौते में छोड़ दिया था संपत्ति पर दावा
वर्ष 1975 में अनसूयम्मा ने वेंकटराजी रेड्डी को गोद लिया था। इसके बाद दोनों ने 1977 में हैदराबाद की सिटी सिविल कोर्ट में संपत्तियों के बंटवारे के लिए मुकदमा दायर किया।
21 अप्रैल 1984 को ट्रायल कोर्ट ने कुछ संपत्तियों के संबंध में राहत दी, लेकिन उन संपत्तियों के बंटवारे की मांग खारिज कर दी जो पहले ही 1959 के पारिवारिक समझौते में बांटी जा चुकी थीं।
इस फैसले को मधुसूदन रेड्डी ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी। अपील लंबित रहने के दौरान 24 फरवरी 1986 को परिवार के संबंधित सदस्यों के बीच लिखित समझौता हुआ।
समझौते के अनुसार, अनसूयम्मा और वेंकटराजी रेड्डी ने हैदराबाद के हिमायतनगर स्थित मकान में अपना एक-तिहाई हिस्सा छोड़ दिया। इससे उस मकान पर मधुसूदन रेड्डी का पूरा मालिकाना अधिकार हो गया।
दोनों ने करकलपहाड़ गांव स्थित एक अन्य मकान में भी अपना एक-तिहाई दावा छोड़ दिया। इसके बदले मधुसूदन रेड्डी ने उन्हें 2.20 लाख रुपये दिए।
सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि मधुसूदन रेड्डी ने अपनी मां माणिक्यम्मा के हिस्से में आई सभी संपत्तियों पर अपना दावा अनसूयम्मा और वेंकटराजी रेड्डी के पक्ष में छोड़ दिया।
हाईकोर्ट ने 27 जून 1988 को इस समझौते को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी और 7 सितंबर 1990 को इसी के आधार पर अपील का निपटारा कर दिया।
अधिकार छोड़ने के बावजूद 2007 में कर दी गिफ्ट डीड
समझौते के करीब 21 साल बाद, 24 अप्रैल 2007 को मधुसूदन रेड्डी ने करकलपहाड़ गांव की कई जमीनें सिद्धार्थ रेड्डी के नाम गिफ्ट कर दीं।
इन जमीनों में सर्वे नंबर 2, 70, 130, 135, 136 और 137 की संपत्तियां शामिल थीं। सिद्धार्थ रेड्डी, वेंकट रेड्डी के बेटे और जनार्दन रेड्डी के पोते हैं।
अनसूयम्मा, वेंकटराजी रेड्डी और गुन्ना मालिनीदेवी ने इस गिफ्ट डीड को महबूबनगर की सीनियर सिविल जज की अदालत में चुनौती दी।
मालिनीदेवी ने 1998 में वेंकटराजी रेड्डी से सर्वे नंबर 2 की 1 एकड़ 22 गुंटा जमीन खरीदी थी।
याचिकाकर्ताओं ने जमीन पर अपना मालिकाना हक घोषित करने, गिफ्ट डीड रद्द करने, राजस्व रिकॉर्ड में आवश्यक बदलाव करने और संपत्ति पर उनके कब्जे में हस्तक्षेप रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा देने की मांग की।
हालांकि, 9 अप्रैल 2012 को ट्रायल कोर्ट ने मुकदमा खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि 1990 में हाईकोर्ट द्वारा पारित समझौता डिक्री का कोई साक्ष्यात्मक महत्व नहीं है।
इसके खिलाफ दायर अपील भी तेलंगाना हाईकोर्ट ने 12 दिसंबर 2022 को खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, निचली अदालतों ने महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के दस्तावेजों और पुराने समझौतों की जांच करने के बाद पाया कि मधुसूदन रेड्डी ने जिन जमीनों को 2007 में गिफ्ट किया था, वे 1959 के पारिवारिक बंटवारे में उनके हिस्से में आई ही नहीं थीं।
कोर्ट ने कहा कि करकलपहाड़ गांव में मधुसूदन रेड्डी को केवल सर्वे नंबर 15 की 1 एकड़ 30 गुंटा जमीन मिली थी। जबकि विवादित गिफ्ट डीड में शामिल जमीनें माणिक्यम्मा के हिस्से की थीं।
बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि मधुसूदन रेड्डी ने 1986 के समझौते में माणिक्यम्मा की संपत्तियों पर अपना दावा पूरी तरह छोड़ दिया था। इस समझौते को हाईकोर्ट की मंजूरी भी मिल चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तेलंगाना हाईकोर्ट 1959 के पारिवारिक समझौते और 1986 के समझौते से निकलने वाले सही निष्कर्षों तक पहुंचने में विफल रहा।
बेंच ने निचली अदालतों के फैसलों में गंभीर खामियां पाते हुए कहा:
“जज ने मामले पर उचित रूप से विचार नहीं किया, यह बात उनकी उस टिप्पणी से स्पष्ट है जिसमें कहा गया कि 24 अप्रैल 2007 की गिफ्ट डीड को कभी चुनौती ही नहीं दी गई। ऐसा कहते समय जज ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि उक्त गिफ्ट डीड को चुनौती देने के लिए ही 21 अगस्त 2007 को मुकदमा दायर किया गया था।”
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष को भी गलत पाया जिसमें माणिक्यम्मा की मृत्यु और उनके हिस्से के अधिकारों के आधार पर वेंकटराजी रेड्डी के दावे को खारिज किया गया था।
बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस बात की अनदेखी की कि 1986 के समझौते में मधुसूदन रेड्डी ने हिमायतनगर स्थित संपत्ति पर पूरा अधिकार मिलने के बदले माणिक्यम्मा की संपत्तियों पर अपने सभी दावे छोड़ दिए थे।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
“ऐसी बुनियादी गलतियों पर आधारित हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसलों को बरकरार नहीं रखा जा सकता।”
नोटिस मिलने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में पेश नहीं हुए प्रतिवादी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि मामले में नोटिस मिलने के बावजूद कोई भी प्रतिवादी अपील का विरोध करने के लिए उपस्थित नहीं हुआ।
प्रतिवादियों में मधुसूदन रेड्डी और वेंकट रेड्डी के कानूनी उत्तराधिकारी, सिद्धार्थ रेड्डी तथा बाद में संपत्ति खरीदने वाले अन्य लोग शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने 16 मई 2023 को मामले में यथास्थिति बनाए रखने का अंतरिम आदेश दिया था। इसके बावजूद प्रतिवादियों की ओर से कोई पेश नहीं हुआ।
इस पर बेंच ने टिप्पणी की:
“उनका ऐसा नहीं करना अपने आप में बहुत कुछ कहता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित किया
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील स्वीकार करते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट का 12 दिसंबर 2022 का फैसला और महबूबनगर की सीनियर सिविल जज की अदालत का 9 अप्रैल 2012 का फैसला रद्द कर दिया।
बेंच ने अपीलकर्ताओं के मूल मुकदमे को उनकी मांग के अनुसार डिक्री कर दिया। इसके परिणामस्वरूप विवादित जमीन पर उनके मालिकाना हक की घोषणा सहित गिफ्ट डीड को अमान्य करने और अन्य संबंधित राहतें मंजूर हो गईं।
सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे के खर्च को लेकर कोई आदेश नहीं दिया।
केस डिटेल्स
केस का नाम: बी. अनसूयम्मा (मृतक), कानूनी उत्तराधिकारी के माध्यम से एवं अन्य बनाम बी. मधुसूदन रेड्डी (मृतक), कानूनी उत्तराधिकारियों के माध्यम से एवं अन्य
केस नंबर: विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 6930/2023
बेंच: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा
फैसले की तारीख: 14 अक्टूबर 2026

