मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाकर तबादले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने राज्य सरकार के कर्मचारी नसीम उद्दीन की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने तबादले को धार्मिक भेदभाव और राजनीतिक द्वेष से प्रेरित बताया था। न्यायमूर्ति सुभोध अभ्यंकर ने मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता के आरोपों को निराधार बताते हुए कड़ी आलोचना की और कहा कि ऐसे बेबुनियाद आरोप प्रशासनिक व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।

नसीम उद्दीन, जो रतलाम में प्रभारी सहायक नियंत्रक (वैधानिक मापविज्ञान) के पद पर कार्यरत थे, का तबादला 13 मार्च को छिंदवाड़ा कर दिया गया था। उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर यह दावा किया कि उनका तबादला इस कारण हुआ क्योंकि वे मुस्लिम हैं और यह तबादला सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के स्थानीय नेताओं के प्रभाव में किया गया। उन्होंने एक दस्तावेज़ भी पेश किया जिसे उन्होंने “सिफारिशी पत्र” बताया, जिसमें उनके और चार अन्य मुस्लिम अधिकारियों के धर्म के आधार पर तबादले की बात कही गई थी।

राज्य सरकार की ओर से अदालत में पेश हुए वकील ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी और इसमें किसी प्रकार की सांप्रदायिक या दुर्भावनापूर्ण मंशा नहीं थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि एक ही समुदाय के कर्मचारियों का तबादला होने मात्र से भेदभाव साबित नहीं होता और नसीम उद्दीन अपने धार्मिक पहचान का अनुचित लाभ उठाने का प्रयास कर रहे हैं।

न्यायमूर्ति अभ्यंकर ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता का रतलाम में लगभग 9 से 10 वर्षों का लंबा कार्यकाल और तबादले का घोर विरोध, जिसमें उन्होंने सांप्रदायिक भेदभाव का आरोप भी लगाया, यह दर्शाता है कि वह किसी भी तरह से अपने तबादले को रोकना चाहते थे।
“रतलाम में 9 से 10 वर्षों तक जमे रहने और तबादले का हर हाल में विरोध करने, यहां तक कि साम्प्रदायिक आधार का आरोप लगाने से यह स्पष्ट होता है कि याचिकाकर्ता तबादले को रोकने का हताश प्रयास कर रहे हैं,” अदालत ने कहा।

अदालत ने आगे यह भी चेताया कि इस प्रकार के निराधार आरोप यदि स्वीकार कर लिए जाएं, तो इससे प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह चरमरा सकता है।
“यदि ऐसे आरोपों को बिना जांच के सही मान लिया जाए, तो मुस्लिम समुदाय से आने वाले किसी भी वरिष्ठ अधिकारी पर यह आरोप लगाया जा सकता है कि वह गैर-मुस्लिम अधीनस्थों का तबादला सांप्रदायिक आधार पर कर रहा है, जिससे राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह असफल हो सकती है,” न्यायमूर्ति अभ्यंकर ने स्पष्ट किया।

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अदालत के इस फैसले ने धार्मिक पहचान के आधार पर तबादले का विरोध करने की प्रवृत्ति पर कठोर संदेश दिया है और प्रशासनिक प्रक्रिया में अनुशासन की आवश्यकता को दोहराया है।

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