सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो मामलों में मेडिकल टेस्ट अनिवार्य करने वाले हाईकोर्ट के निर्देश को रद्द किया; सहमति से बने संबंधों के लिए ‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज का सुझाव दिया

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले और निर्देशों को रद्द कर दिया है, जिसमें यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत सभी मामलों में जांच की शुरुआत में ही पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए मेडिकल जांच को अनिवार्य किया गया था।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटेश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि पीड़िता की उम्र का निर्धारण एक विचारणीय मुद्दा (matter of trial) है और इसे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 439 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट द्वारा पहले से तय नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने सामान्य निर्देश जारी करके अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर (coram non judice) कार्य किया है, जो किशोर न्याय (जेजे) अधिनियम, 2015 की धारा 94 में निर्धारित वैधानिक पदानुक्रम (hierarchy) का उल्लंघन करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आरोपी को जमानत देते हुए पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे सुनिश्चित करें कि प्रत्येक पॉक्सो मामले में पीड़िता की उम्र निर्धारित करने वाली मेडिकल रिपोर्ट तैयार की जाए और जमानत अदालतों को अन्य दस्तावेजों की तुलना में ऐसी रिपोर्टों को “पूर्ण महत्व” (full weight) देना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इन निर्देशों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जेजे एक्ट की धारा 94 के तहत, स्कूल प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेजी साक्ष्यों को मेडिकल टेस्ट पर प्राथमिकता दी जाती है, और ऐसे दस्तावेजों की सत्यता का परीक्षण ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए, न कि जमानत के चरण में।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जालौन जिले के कोतवाली उरई थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 622/2022 से जुड़ा है। आरोप था कि एक 12 वर्षीय लड़की का अपहरण किया गया था। आरोपी (प्रतिवादी संख्या 1) के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363, 366 और पॉक्सो एक्ट की धारा 7 व 8 के तहत आरोप लगाए गए थे।

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निचली अदालत ने आरोपी की जमानत खारिज कर दी थी, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 29 मई, 2024 के आदेश के जरिए जमानत दे दी। हालांकि, हाईकोर्ट ने आगे बढ़ते हुए यह भी देखा कि पुलिस अक्सर मेडिकल उम्र रिपोर्ट प्राप्त करने में विफल रहती है। अपने पिछले फैसलों (अमन @ वंश बनाम यूपी राज्य और मोनिश बनाम यूपी राज्य) पर भरोसा करते हुए, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि:

  1. पुलिस को सभी पॉक्सो मामलों में जांच की शुरुआत में ही मेडिकल उम्र निर्धारण रिपोर्ट तैयार करनी होगी।
  2. जमानत अदालतों को मेडिकल रिपोर्ट को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  3. उपयुक्त मामलों में, चिकित्सकीय रूप से निर्धारित उम्र स्कूल के रिकॉर्ड पर हावी हो सकती है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने इन निर्देशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

1. अधिकार क्षेत्र: वैधानिक बनाम संवैधानिक शक्ति सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले इस बात पर विचार किया कि क्या धारा 439 सीआरपीसी के तहत जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ऐसे व्यापक निर्देश जारी कर सकता है। पीठ ने संवैधानिक शक्ति और वैधानिक शक्ति के बीच अंतर किया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि हाईकोर्ट एक संवैधानिक न्यायालय है, लेकिन धारा 439 के तहत इसका अधिकार क्षेत्र वैधानिक है और यह केवल यह तय करने तक सीमित है कि किसी आरोपी को मुकदमे के लंबित रहने के दौरान रिहा किया जाना चाहिए या नहीं।

कोर्ट ने कहा:

“संवैधानिक शक्ति वैधानिक शक्ति पर हावी नहीं हो सकती और न ही इसके दायरे को क़ानून द्वारा परिकल्पित सीमा से आगे बढ़ा सकती है… जबकि दोनों शक्तियां हाईकोर्ट के पास हैं, एक शक्ति दूसरे के क्षेत्र को तब तक नहीं हड़प सकती जब तक कि कानून द्वारा अनुमति न दी गई हो।”

पीठ ने माना कि जमानत देने के आवेदन में पीड़िता की उम्र की जांच करने और निर्देश जारी करने की कवायद में हाईकोर्ट ने गलती की है।

2. उम्र का निर्धारण: दस्तावेजों का पदानुक्रम (Hierarchy) सुप्रीम कोर्ट ने उम्र निर्धारण के संबंध में जरनैल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2013) के स्थापित कानून को दोहराया। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जेजे एक्ट की धारा 94 एक सख्त पदानुक्रम प्रदान करती है:

  1. मैट्रिकुलेशन या समकक्ष प्रमाण पत्र।
  2. इसकी अनुपस्थिति में, पहले स्कूल से प्राप्त जन्म तिथि प्रमाण पत्र।
  3. दोनों की अनुपस्थिति में, नगरपालिका प्राधिकरण द्वारा दिया गया जन्म प्रमाण पत्र।
  4. केवल उपरोक्त सभी के अभाव में ही मेडिकल आयु निर्धारण परीक्षण (ऑसिफिकेशन टेस्ट) किया जाना चाहिए।
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कोर्ट ने कहा कि जांच की शुरुआत में अनिवार्य रूप से मेडिकल टेस्ट कराने का हाईकोर्ट का निर्देश इस वैधानिक जनादेश का उल्लंघन करता है। पीठ ने कहा, “मेडिकल जांच का सहारा केवल तभी लिया जा सकता है जब जेजे एक्ट की धारा 94 की अन्य शर्तें पूरी नहीं होती हैं या नहीं की जा सकती हैं।”

3. जमानत स्तर पर ‘मिनी ट्रायल’ की अनुमति नहीं पीठ ने स्पष्ट किया कि हालांकि जमानत अदालत प्रथम दृष्टया (prima facie) विचार करने के लिए दस्तावेजों को देख सकती है, लेकिन वह उनकी सत्यता का फैसला नहीं कर सकती। उम्र से संबंधित दस्तावेजों की सत्यता साक्ष्य का विषय है जिसका परीक्षण ट्रायल के दौरान किया जाना है।

“पीड़िता की उम्र का निर्धारण ट्रायल का विषय है, और धारा के तहत उल्लिखित दस्तावेजों को जो भी अनुमान (presumption) प्राप्त है, उसका खंडन वहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि वही इसके लिए उपयुक्त मंच है, न कि जमानत अदालत।”

कोर्ट ने कहा कि जमानत अदालत को उम्र के दस्तावेजों की वैधता तय करने की अनुमति देना “मिनी ट्रायल” आयोजित करने जैसा होगा, जो जमानत के चरण में अस्वीकार्य है।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और हाईकोर्ट द्वारा जारी निर्देशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा:

  • जमानत के अधिकार क्षेत्र में हाईकोर्ट द्वारा पीड़ितों की मेडिकल जांच अनिवार्य करने वाले निर्देश जारी करना coram non judice (अधिकार क्षेत्र से बाहर) था।
  • विवादित फैसले के साथ-साथ अमन और मोनिश के मामलों में दिए गए निर्देश रद्द किए जाते हैं।
  • एकल न्यायाधीश द्वारा अन्य कारकों के आधार पर आरोपी को दी गई जमानत बरकरार रहेगी।
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‘रोमियो-जूलियट’ क्लॉज का सुझाव

अपने फैसले के अंत में एक “आवश्यक पोस्ट-स्क्रिप्ट” में, पीठ ने सहमति से बनाए गए संबंधों (consensual relationships) में पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग के संबंध में हाईकोर्ट की चिंता को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि अक्सर किशोर जोड़ों के खिलाफ इस कानून को “हथियार” बनाया जाता है या इसका इस्तेमाल स्कोर सेटल करने के लिए किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस फैसले की एक प्रति विधि सचिव, भारत सरकार को भेजी जाए, ताकि इस खतरे को रोकने के लिए कदम उठाए जा सकें। कोर्ट ने सुझाव दिया:

‘रोमियो जूलियट’ क्लॉज (Romeo Juliet clause) की शुरूआत की जाए जो वास्तविक किशोर संबंधों को इस कानून की पकड़ से छूट दे; और एक ऐसा तंत्र बनाया जाए जो उन लोगों के खिलाफ अभियोजन की अनुमति दे जो स्कोर सेटल करने के लिए इन कानूनों का उपयोग करते हैं।

केस डिटेल्स:

  • केस का नाम: उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुद्ध और अन्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील @ SLP (Crl.) No. 10656 of 2025 (2026 INSC 47)
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटेश्वर सिंह

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