बिना FIR दर्ज किए पुलिस किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए समन नहीं भेज सकती: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई मामला (FIR) दर्ज नहीं है, तो पुलिस के पास उसे समन भेजने या पूछताछ के लिए बुलाने का अधिकार नहीं है।

न्यायमूर्ति सुंदर मोहन की पीठ ने विमल चिन्नप्पन द्वारा दायर एक आपराधिक याचिका को स्वीकार करते हुए पुलिस उपाधीक्षक (DSP), श्रीविल्लीपुत्तुर द्वारा जारी नोटिस को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(1)(b) पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी की परिस्थितियां बताती है, लेकिन यह पुलिस को बिना मामला दर्ज किए किसी व्यक्ति को समन करने का अधिकार नहीं देती।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता विमल चिन्नप्पन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 26 अक्टूबर, 2025 को पुलिस उपाधीक्षक (प्रथम प्रतिवादी) द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी थी। यह नोटिस भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 35(3) के तहत जारी किया गया था।

पुलिस द्वारा जारी नोटिस में कहा गया था कि अपराध संख्या 527/2023 (जो IPC की धारा 294(b), 323, 506(i) और SC/ST एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज था) की जांच के दौरान, उन्हें एक जर्नल में याचिकाकर्ता द्वारा प्रकाशित एक लेख मिला। पुलिस का आरोप था कि इस लेख में पुलिस के खिलाफ मानहानिकारक बयान थे, जिसके लिए स्पष्टीकरण मांगते हुए याचिकाकर्ता को कुछ सवाल भेजे गए थे।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश विद्वान अधिवक्ता श्री आर. करुणानिधि ने तर्क दिया कि विवादित नोटिस में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि याचिकाकर्ता को किस मामले में बुलाया जा रहा है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि जिस अपराध संख्या 527/2023 का हवाला दिया गया है, उसकी जांच पूरी हो चुकी है और अंतिम रिपोर्ट भी दाखिल की जा चुकी है।

READ ALSO  नई जमानत याचिका दायर करना एक अधिकार, सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति पर निर्भर नहीं: सुप्रीम कोर्ट

अधिवक्ता ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के खिलाफ एकमात्र आरोप पुलिस के बारे में मानहानिकारक बयान देने का है। उनके अनुसार:

  1. पुलिस के खिलाफ मानहानि के मामले में उचित कानूनी उपाय निजी शिकायत (Private Complaint) दर्ज करना है।
  2. यदि कोई संज्ञेय अपराध बनता भी है, तो भी पुलिस को याचिकाकर्ता को समन भेजने से पहले मामला दर्ज करना चाहिए था।

प्रतिवादियों की ओर से पेश विद्वान सरकारी अधिवक्ता श्री के. संजय गांधी ने स्वीकार किया कि अपराध संख्या 527/2023 में जांच पूरी हो चुकी है और एससी/एसटी एक्ट मामलों की विशेष अदालत, विरुधुनगर ने अंतिम रिपोर्ट पर संज्ञान (Spl.S.C.No. 28/2025) ले लिया है। उन्होंने यह भी माना कि कथित मानहानिकारक बयानों के लिए याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई अलग से मामला दर्ज नहीं किया गया है।

READ ALSO  505 IPC | पुलिस विभाग में दरार के बारे में समाचार प्रकाशित करना कोई अपराध नहीं- हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

कोर्ट ने नोटिस का अवलोकन करते हुए पाया कि पुलिस ने याचिकाकर्ता से लगभग बारह सवालों के जवाब मांगे थे, जो मुख्य रूप से पुलिस के खिलाफ मानहानिकारक आरोपों वाले लेख के प्रकाशन से संबंधित थे।

न्यायमूर्ति सुंदर मोहन ने कहा कि यह स्वीकृत तथ्य है कि नोटिस अपराध संख्या 527/2023 के संबंध में जारी नहीं किया गया था, क्योंकि वह जांच समाप्त हो चुकी है। कोर्ट ने कहा, “यदि किसी अन्य मामले में पूछताछ के लिए याचिकाकर्ता की आवश्यकता थी, तो प्रतिवादियों को उस मामले की अपराध संख्या का उल्लेख करना चाहिए था। स्वीकार्य रूप से, याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई अन्य मामला दर्ज नहीं है।”

कानूनी प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए, हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत पुलिस की शक्तियों पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“इसके अलावा, BNSS की धारा 35(1)(b) केवल उन परिस्थितियों को निर्दिष्ट करती है जिनके तहत एक पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकता है और यह प्रतिवादियों (पुलिस) को किसी भी पंजीकृत मामले के अभाव में याचिकाकर्ता को समन करने या पूछताछ करने का अधिकार नहीं देती है।”

निर्णय

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं है, इसलिए पुलिस के पास उसे समन करने का अधिकार नहीं था। इस आधार पर हाईकोर्ट ने 26 अक्टूबर, 2025 के विवादित नोटिस को रद्द (Quash) कर दिया।

हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि “यदि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई मामला दर्ज किया जाता है और उस मामले में पूछताछ के लिए उसकी उपस्थिति की आवश्यकता होती है, तो यह आदेश प्रतिवादियों को कानून के अनुसार आगे बढ़ने के रास्ते में नहीं आएगा।”

तदनुसार, आपराधिक मूल याचिका (Criminal Original Petition) को स्वीकार किया गया और संबंधित विविध याचिका को बंद कर दिया गया।

केस विवरण

  • केस का नाम: विमल चिन्नप्पन बनाम तमिलनाडु राज्य व अन्य
  • केस संख्या: Crl.O.P.(MD).No.19623 of 2025
  • कोरम: न्यायमूर्ति सुंदर मोहन
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री आर. करुणानिधि
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री के. संजय गांधी, सरकारी अधिवक्ता

READ ALSO  हत्या के मामले में कोर्ट ने एक व्यक्ति को उम्रकैद की सजा सुनाई
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles