मद्रास हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट रजिस्ट्री द्वारा पारित उस प्रशासनिक आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) की मांग को अस्वीकार कर दिया गया था। जस्टिस आर. सुरेश कुमार और जस्टिस शमीम अहमद की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि स्थापित कानूनी नजीरों (Legal Precedents) के अनुरूप याचिकाकर्ता को यह लाभ दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने इस मुद्दे पर पिछले न्यायिक आदेशों को केवल विशिष्ट व्यक्तियों तक सीमित (in personam) मानने के लिए प्रतिवादियों की आलोचना की।
याचिकाकर्ता पी. मंगैयारक्कसी ने अपनी तीसरी गर्भावस्था (Third Confinement) के लिए मातृत्व अवकाश के आवेदन को खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए 15 दिसंबर, 2025 के अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया और प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे 8 अगस्त, 2025 से 7 अगस्त, 2026 तक की अवधि के लिए मातृत्व लाभ प्रदान करें।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, जो हाईकोर्ट की कर्मचारी हैं, ने अपनी तीसरी गर्भावस्था के लिए मातृत्व अवकाश का आवेदन किया था। मद्रास हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार (प्रबंधन) (दूसरे प्रतिवादी) ने 15 दिसंबर, 2025 की कार्यवाही (Proceedings) के माध्यम से इस अनुरोध को खारिज कर दिया था।
यह अस्वीकृति तमिलनाडु सरकार के मानव संसाधन प्रबंधन विभाग के सचिव द्वारा 25 अगस्त, 2025 को जारी एक स्पष्टीकरण पत्र पर आधारित थी। पत्र में कहा गया था कि “तमिलनाडु फंडामेंटल रूल्स (Tamil Nadu Fundamental Rules) में स्थायी/अस्थायी विवाहित महिला सरकारी कर्मचारियों को उनके तीसरे बच्चे/प्रसव के लिए मातृत्व अवकाश देने का कोई प्रावधान नहीं है।”
दलीलें और कारण
प्रतिवादियों ने सरकारी पत्र का हवाला देते हुए अपने आदेश को सही ठहराया। इसके अलावा, दूसरे प्रतिवादी ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट द्वारा रिट याचिका संख्या 33559 ऑफ 2025 में पारित पिछला आदेश, जिसमें इसी तरह की राहत दी गई थी, केवल उस विशिष्ट मामले में याचिकाकर्ता पर लागू होता था।
कोर्ट का विश्लेषण
खंडपीठ ने पाया कि तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश के कानूनी मुद्दे का पहले ही निपटारा किया जा चुका है। कोर्ट ने रिट याचिका संख्या 33559 ऑफ 2025 में 4 सितंबर, 2025 को एक अन्य खंडपीठ द्वारा पारित आदेश का उल्लेख किया, जो माननीय सुप्रीम कोर्ट के उमादेवी बनाम तमिलनाडु सरकार और अन्य (2025 SCC OnLine SC 1204) के फैसले पर आधारित था।
बेंच ने प्रतिवादियों की इस व्याख्या पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की कि पिछला फैसला केवल in personam (व्यक्ति विशेष पर लागू) था। जस्टिस आर. सुरेश कुमार ने बेंच की ओर से कहा:
“न्यायिक आदेश की इस तरह की व्याख्या, जो कि ‘in rem’ (सर्वमान्य) आदेश है क्योंकि इसमें उमादेवी के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत का पालन किया गया है, को यह नहीं कहा जा सकता कि उक्त निर्णय केवल उक्त याचिकाकर्ता पर ही लागू होगा… दूसरे प्रतिवादी द्वारा दी जाने वाली इस तरह की व्याख्या की सराहना नहीं की जा सकती।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि समान तथ्यों वाले एक अन्य मामले (रिट याचिका संख्या 48656 ऑफ 2025) को भी 17 दिसंबर, 2025 को उमादेवी मामले और बी. रंजीता बनाम रजिस्ट्रार जनरल के फैसले का पालन करते हुए स्वीकार किया गया था।
लगातार खंडपीठ के आदेशों के बावजूद, प्रतिवादियों ने लाभ देने से इनकार करने के लिए सरकारी पत्र पर भरोसा करना जारी रखा। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों के इस रुख को “पिडेंटिक एप्रोच” (संकीर्ण या लकीर का फकीर होने जैसा दृष्टिकोण) करार दिया। बेंच ने टिप्पणी की:
“जब दो खंडपीठों ने समान तथ्यों वाले एक ही मुद्दे पर लगातार आदेश पारित किए हैं… हम उम्मीद करते हैं कि वर्तमान प्रतिवादी, यानी हाईकोर्ट रजिस्ट्री और जिला न्यायपालिका को उन निर्णयों में प्रतिपादित कानूनी सिद्धांत को समझना चाहिए और उचित आदेश पारित करना चाहिए।”
निर्णय और निर्देश
कोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार कर लिया और 15 दिसंबर, 2025 के विवादित आदेश को रद्द कर दिया। प्रतिवादियों को निम्नलिखित निर्देश दिए गए:
- याचिकाकर्ता को उसकी पात्रता के अनुसार, विशेष रूप से 08.08.2025 से 07.08.2026 तक की अवधि के लिए मातृत्व अवकाश का लाभ दिया जाए।
- कर्मचारी को उपलब्ध सभी अनुषंगी और सेवा लाभ (Attendant and Service Benefits) प्रदान किए जाएं।
- आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से एक सप्ताह के भीतर आवश्यक आदेश पारित किए जाएं।
भविष्य में इस तरह की अस्वीकृतियों को रोकने के लिए, जिसे कोर्ट ने कर्मचारियों के लिए “पीड़ादायक तथ्य” बताया, बेंच ने निम्नलिखित विशिष्ट निर्देश जारी किए:
- रजिस्ट्रार जनरल को: भविष्य के मामलों में कड़ाई से अनुपालन के लिए पूरे राज्य में जिला न्यायपालिका में इकाइयों का नेतृत्व करने वाले सभी न्यायिक अधिकारियों को यह आदेश परिचालित (Circulate) करें।
- मुख्य सचिव, तमिलनाडु सरकार को: उमादेवी मामले, बी. रंजीता मामले और जी. उमानंदिनी मामले में निर्धारित सिद्धांतों का कड़ाई से पालन करें। कड़ाई से अनुपालन और कार्रवाई के लिए इस आदेश को सरकार के सचिवों और विभागाध्यक्षों को सूचित किया जाना चाहिए।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: पी. मंगैयारक्कसी बनाम रजिस्ट्रार जनरल, मद्रास हाईकोर्ट और अन्य
- केस संख्या: डब्लू.पी. संख्या 705 ऑफ 2026 (W.P.No. 705 of 2026)
- कोरम: जस्टिस आर. सुरेश कुमार और जस्टिस शमीम अहमद
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री एम. दिनेश
- प्रतिवादियों के वकील: श्रीमती कार्तिका अशोक

