पत्नी की बेवफाई साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट कोई शॉर्टकट नहीं, बच्चे को मोहरा नहीं बनाया जा सकता: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि वैवाहिक बेवफाई साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट का आदेश सामान्य प्रक्रिया के तौर पर या किसी शॉर्टकट के रूप में नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जीवनसाथी पर लगे आरोपों को साबित करने के लिए किसी बच्चे की वैधता और पहचान की बलि नहीं दी जा सकती। जस्टिस शमीम अहमद की एकल पीठ ने घरेलू हिंसा के लंबित मामले में अपने नाबालिग बेटे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग करने वाले एक पति की क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और अपनी पत्नी को बदनाम व अपमानित करने का प्रयास करने के लिए पति पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) का विवाह 24 नवंबर 2008 को हुआ था और वैवाहिक संबंध के दौरान उन्हें एक बेटा हुआ। आपसी विवादों के चलते पत्नी ने 12 अगस्त 2013 को वेलफेयर ऑफिसर के समक्ष घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराई। बाद में यह मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट, पोलूर में घरेलू हिंसा केस संख्या 23/2017 के रूप में दर्ज हुआ और फिर स्थानांतरित होकर जिला मुंसिफ सह न्यायिक मजिस्ट्रेट, कलासापक्कम, तिरुवन्नामलाई की अदालत में घरेलू हिंसा केस संख्या 6/2020 के रूप में विचारार्थ आया।

विवाद लंबित रहने के दौरान वर्ष 2023 में पति ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत एक अंतरिम आवेदन दायर कर बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की, ताकि यह साबित किया जा सके कि वह उसका जैविक पिता नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने 1 दिसंबर 2023 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि गर्भधारण की अवधि के दौरान पति-पत्नी के बीच संपर्क या पहुंच (एक्सेस) न होने का कोई आधार रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है। इस आदेश के खिलाफ पति ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 438 और 442 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील के. बालकृष्णन ने तर्क दिया कि बच्चे के गर्भधारण से पहले और पूरी गर्भावस्था के दौरान पति और पत्नी के बीच कोई संपर्क या संबंध नहीं था। वकील का कहना था कि पति शुरू से ही बच्चे के पितृत्व से इनकार करता रहा है और अनागम्यता (नॉन-एक्सेस) साबित करने के लिए डीएनए टेस्ट जरूरी है। उन्होंने यह भी दलील दी कि वैवाहिक विवादों में डीएनए टेस्ट की अर्जी विचारणीय होती है और ट्रायल कोर्ट ने मामले के तथ्यों पर गौर किए बिना ही आवेदन खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पत्नी की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ, हालांकि अदालत ने रिकॉर्ड से देखा कि ट्रायल कोर्ट ने आदेश पारित करते समय पत्नी के वकील की दलीलों पर विधिवत विचार किया था।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

पितृत्व और जन्म की स्थिति तय करने के लिए डीएनए जैसी वैज्ञानिक जांच तकनीकों के उपयोग के कानूनी पहलुओं का विश्लेषण करते हुए जस्टिस शमीम अहमद ने कहा कि यद्यपि वैज्ञानिक प्रगति न्याय व्यवस्था में मददगार है, लेकिन इस तरह की दखल देने वाली जांचें संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत आत्म-दोषारोपण के विरुद्ध मिले संरक्षण और अनुच्छेद 21 के तहत जीवन, निजता और गरिमा के मौलिक अधिकारों को सीधे प्रभावित करती हैं।

कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 116 (जो पूर्ववर्ती भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के समकक्ष है) का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता का एक अकाट्य कानूनी अनुमान होता है, जब तक कि पति यह सिद्ध न कर दे कि गर्भधारण के समय दोनों के बीच कोई संपर्क संभव नहीं था। पीठ ने कहा कि इस कानूनी प्रावधान का मूल उद्देश्य किसी बच्चे के पितृत्व पर बिना आधार के सवाल उठाने से रोकना है।

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इस अनुमान को चुनौती देने के लिए जरूरी साक्ष्य के मानक पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले इवान रतिनम बनाम मिलन जोसेफ (2025) का संदर्भ दिया, जिसमें गौतम कुंडू बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1993) के पांच प्रमुख सिद्धांतों को दोहराया गया था:

“(1) भारत में अदालतें सामान्य प्रक्रिया के रूप में रक्त परीक्षण का आदेश नहीं दे सकती हैं;

(2) जब भी ऐसी प्रार्थनाएं सिर्फ टोह लेने वाली जांच (रोविंग इन्क्वायरी) के उद्देश्य से की जाती हैं, तो रक्त परीक्षण के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया जा सकता;

(3) मामले में एक मजबूत प्रथम दृष्टया आधार होना चाहिए, जिसमें पति को साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत उत्पन्न होने वाले अनुमान को खंडित करने के लिए अनागम्यता (नॉन-एक्सेस) स्थापित करनी होगी;

(4) कोर्ट को इस बात का सावधानीपूर्वक परीक्षण करना चाहिए कि रक्त परीक्षण का आदेश देने का क्या परिणाम होगा; क्या इसका असर बच्चे को नाजायज और मां को चरित्रहीन करार देने जैसा होगा;

(5) किसी को भी जांच के लिए रक्त का नमूना देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले श्रीमती सेल्वी एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य (2010), अपर्णा अजिंक्य फिरोदिया बनाम अजिंक्य अरुण फिरोदिया (2023) और केरल हाईकोर्ट के अब्दुरहीमान बनाम केरल राज्य (2013) के फैसलों का भी उल्लेख किया।

इन सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि पति ने गर्भधारण के दौरान अपनी पत्नी से संपर्क न होने का कोई दस्तावेजी या प्रथम दृष्टया साक्ष्य पेश नहीं किया है। इसके अलावा, घरेलू हिंसा का मुकदमा शुरू होने के बाद पति 2013 से 2023 तक पूरे दस वर्षों तक चुप रहा और उसने डीएनए टेस्ट की मांग करने में हुए इस भारी विलंब का कोई संतोषजनक कारण भी नहीं बताया।

पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

“डीएनए टेस्ट को उस बेवफाई को साबित करने का शॉर्टकट तरीका नहीं बनाया जा सकता, जो एक दशक पहले या बच्चे के जन्म के बाद हुई हो सकती है। बच्चे पर डीएनए टेस्ट की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं, इस सवाल का विश्लेषण माता-पिता के नजरिए से नहीं, बल्कि बच्चे के दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। बच्चे को यह दिखाने के लिए मोहरे के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि उसकी मां व्यभिचार में रह रही थी। पति के लिए पत्नी के व्यभिचारी आचरण को अन्य साक्ष्यों से साबित करने का विकल्प हमेशा खुला रहता है, लेकिन बच्चे के पहचान के अधिकार की बलि चढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

हाईकोर्ट ने माना कि यह रिवीजन पिटीशन केवल घरेलू हिंसा और भरण-पोषण के मामले को लटकाने तथा पत्नी को समाज में अपमानित और बदनाम करने के उद्देश्य से दाखिल की गई एक निराधार कोशिश थी।

हाईकोर्ट का निर्णय

ट्रायल कोर्ट के 1 दिसंबर 2023 के आदेश में कोई त्रुटि न पाते हुए हाईकोर्ट ने पति की क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन को खारिज कर दिया।

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अदालत ने पत्नी को सार्वजनिक रूप से बदनाम और प्रताड़ित करने की नीयत को देखते हुए पति पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया। पति को निर्देश दिया गया है कि वह यह राशि छह सप्ताह के भीतर कलासापक्कम स्थित जिला मुंसिफ सह न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में घरेलू हिंसा केस संख्या 6/2020 के खाते में जमा कराए। राशि जमा होते ही ट्रायल कोर्ट इसे तत्काल पत्नी को सौंपेगी। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि पति समय पर राशि जमा करने में विफल रहता है, तो ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार वसूली की कार्यवाही शुरू करे।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: K बनाम S
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन केस संख्या 2340 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस शमीम अहमद
निर्णय की तिथि: 9 अक्टूबर 2026

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