जमानत आदेशों पर विचार न करना और केंद्र सरकार को प्रत्यावेदन के अधिकार की जानकारी न देना प्रिवेंटिव डिटेंशन को करता है निरस्त: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रिवेंशन ऑफ इलिसिट ट्रैफिक इन नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1988 (PIT NDPS एक्ट) के तहत पारित एक प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक हिरासत) आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत आदेशों और उनकी शर्तों को रिकॉर्ड पर न रखना तथा उन पर विचार न करना, साथ ही बंदी को केंद्र सरकार के समक्ष प्रत्यावेदन (रिप्रजेंटेशन) देने के उसके संवैधानिक अधिकार की जानकारी न देना, हिरासत आदेश को पूरी तरह अवैध बना देता है। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि महत्वपूर्ण और प्रासंगिक सामग्री पर विचार न किए जाने के कारण सक्षम प्राधिकारी की व्यक्तिपरक संतुष्टि (सब्जेक्टिव सेटिस्फैक्शन) दूषित हो गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता पांगी मंगम्मा ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर विशाखापट्टनम सेंट्रल जेल में बंद बंदी पांगी कृष्णा राव की निवारक हिरासत को चुनौती दी थी।

प्रमुख सचिव (राजस्व, आबकारी विभाग) ने 14 अक्टूबर 2025 को PIT NDPS एक्ट की धारा 3(1) के तहत जी.ओ.आर.टी. नंबर 1258 के जरिए यह प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश पारित किया था, जिसकी पुष्टि बाद में 31 दिसंबर 2025 को जी.ओ.आर.टी. नंबर 1671 द्वारा की गई। यह डिटेंशन आदेश NDPS एक्ट के तहत दर्ज पांच आपराधिक मामलों पर आधारित था:

  1. पाडेरू पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 28/2016 (धारा 20(B)(1))
  2. जी. मदुगुला पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 10/2023 (धारा 20(b)(ii)(C), 25 सहपठित 8(c))
  3. पेदाबयालु पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 24/2023 (धारा 20(b)(ii)(C) सहपठित 8(c))
  4. कोव्वुरू टाउन पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 103/2023 (धारा 20(b)(ii)(C) सहपठित 8(c))
  5. पाडेरू पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 95/2024 (धारा 20(b)(ii)(B), 25 सहपठित 8(c))

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता श्री डी. पूर्ण चंद्र रेड्डी ने दलील दी कि बंदी को इन सभी पांच मामलों में जमानत मिल चुकी थी। इसके बावजूद, प्रायोजक प्राधिकारी (स्पॉन्सरिंग अथॉरिटी) ने आधार संख्या 1, 4 और 5 से संबंधित जमानत आदेशों को डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष पेश ही नहीं किया। इस प्रासंगिक सामग्री पर विचार न होना प्राधिकारी के निर्णय को दूषित करता है। इसके अलावा, इन जमानत आदेशों की प्रतियां बंदी को भी उपलब्ध नहीं कराई गईं, जिससे वह अपने डिटेंशन के खिलाफ प्रभावी प्रत्यावेदन करने के अधिकार से वंचित रह गया।

अधिवक्ता ने यह भी रेखांकित किया कि जिस समय डिटेंशन आदेश पारित हुआ, उस समय बंदी पहले से ही अन्नवरम पुलिस स्टेशन के एक अन्य मामले (क्राइम नंबर 127/2025) में न्यायिक हिरासत में जेल में था। प्रायोजक प्राधिकारी ने यह तथ्य डिटेनिंग अथॉरिटी से पूरी तरह छिपा कर रखा। कमलेशकुमार ईश्वरदास पटेल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि बंदी को केंद्र सरकार के समक्ष प्रत्यावेदन देने के उसके वैधानिक और संवैधानिक अधिकार से अवगत नहीं कराया गया, जिससे पूरा डिटेंशन आदेश अमान्य हो जाता है।

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इसके विपरीत, राज्य की ओर से उपस्थित सरकारी वकील श्री कीर्ति तेजा कोंडावेटी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि क्राइम नंबर 127/2025 दिनांक 9 जून 2025 को दर्ज हुआ था, जबकि डिटेंशन का प्रस्ताव 21 मई 2025 को ही भेजा जा चुका था। इसलिए प्रस्ताव भेजते समय इस मामले की जानकारी देना संभव नहीं था। उन्होंने दलील दी कि आधार संख्या 2 और 3 में जमानत आदेशों पर विधिवत विचार किया गया था। के. वरदराज बनाम तमिलनाडु राज्य मामले पर भरोसा जताते हुए उन्होंने कहा कि हर मामले में सभी जमानत आदेशों को डिटेनिंग अथॉरिटी के सामने रखना अनिवार्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि बंदी को डिटेनिंग अथॉरिटी और एडवाइजरी बोर्ड के समक्ष प्रत्यावेदन देने के अधिकार की जानकारी दे दी गई थी, और चूंकि डिटेंशन और पुष्टिकरण प्राधिकारी एक ही थे, इसलिए अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ—विशेष रूप से तब, जब बंदी ने कोई प्रत्यावेदन दिया ही नहीं था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए खंडपीठ ने पाया कि भले ही क्राइम नंबर 127/2025 दिनांक 9 जून 2025 को दर्ज हुआ था, लेकिन डिटेंशन आदेश उसके करीब चार महीने बाद 14 अक्टूबर 2025 को जारी किया गया। अदालत ने टिप्पणी की कि इस महत्वपूर्ण तथ्य की सूचना आदेश पारित होने से पहले आसानी से डिटेनिंग अथॉरिटी को दी जा सकती थी, परंतु ऐसा नहीं किया गया।

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चैंपियन आर. संगमा बनाम मेघालय राज्य और कमरुन्निसा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में प्रतिपादित ‘ट्रिपल टेस्ट’ का उल्लेख करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि जेल में बंद व्यक्ति के खिलाफ भी प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश दिया जा सकता है, लेकिन इसके लिए प्राधिकारी को उसकी हिरासत का ज्ञान होना चाहिए, उसके पास विश्वसनीय सामग्री के आधार पर यह मानने का कारण होना चाहिए कि उसके जमानत पर छूटने की वास्तविक संभावना है और बाहर आकर वह दोबारा वही अपराध करेगा, तथा उसे रोकने के लिए डिटेंशन आवश्यक है।

जमानत आदेशों को रिकॉर्ड पर न रखने के पहलू पर खंडपीठ ने ऋषिकेश तानाजी भोईटे बनाम महाराष्ट्र राज्य (जिसमें रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य का संदर्भ है) और बुद्दिगा धना लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (जिसमें पोन्नाडा गीता, वसंथु सुमलता और एम. अहमदकुट्टी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया शामिल हैं) के फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि जमानत आदेश और उसमें लगाई गई शर्तें अनिवार्य व प्रासंगिक सामग्री हैं। जॉई किट्टी जोसेफ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का संदर्भ देते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि डिटेनिंग अथॉरिटी का यह दायित्व था कि वह यह परखती कि जमानत देते समय लगाई गई शर्तें बंदी को पुनः अपराध करने से रोकने के लिए पर्याप्त थीं या नहीं।

पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की: “हमारा यह सुविचारित मत है कि जमानत आदेशों और जमानत की शर्तों पर विचार न किए जाने से प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश निश्चित रूप से दूषित हुआ है।”

के. वरदराज बनाम तमिलनाडु राज्य के फैसले का भेद स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा: “हमारे विचार में, व्यक्तिपरक संतुष्टि (सब्जेक्टिव सेटिस्फैक्शन) तक पहुंचने के लिए जमानत की शर्तें विचारणीय और अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य हैं।”

केंद्र सरकार को प्रत्यावेदन देने के अधिकार पर खंडपीठ ने PIT NDPS एक्ट की धारा 12 और संविधान के अनुच्छेद 22(5) के साथ-साथ कमलेशकुमार ईश्वरदास पटेल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अल्फिया ए. बनाम केरल राज्य के निर्णयों का विश्लेषण किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 12(1) के तहत केंद्र सरकार के पास राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से अधिकृत अधिकारी द्वारा पारित डिटेंशन आदेश को रद्द करने का स्वतंत्र वैधानिक अधिकार है। इसलिए, बंदी को इस अधिकार से अवगत कराना अनिवार्य है।

अदालत ने कहा: “परिणामस्वरूप, बंदी को केंद्र सरकार के समक्ष भी अपना प्रत्यावेदन प्रस्तुत करने के अधिकार से अवगत कराया जाना अनिवार्य था, जो कि नहीं किया गया।”

हाईकोर्ट का निर्णय

जमानत आदेशों और उनकी शर्तों पर विचार न किए जाने, मौजूदा न्यायिक हिरासत की जानकारी छिपाने और बंदी को केंद्र सरकार के समक्ष प्रत्यावेदन देने के अधिकार से अवगत न कराने जैसी गंभीर कानूनी कमियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने 14 अक्टूबर 2025 के प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश और 31 दिसंबर 2025 के पुष्टिकरण आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि यदि बंदी किसी अन्य मामले में वांछित न हो, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

मामले का विवरण

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मामले का शीर्षक: पांगी मंगम्मा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य व 4 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 439 / 2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी 

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