निजी कॉलेजों की फीस तय करने के लिए एलयू सक्षम: इलाहाबाद हाईकोर्ट

लखनऊ विश्वविद्यालय के एक एसोसिएटेड कॉलेज के दो लॉ स्टूडेंट्स ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत लखनऊ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल किया, जिसमें सरकार के आदेश 6 (i) और नियम 5 (xv) (जीए) को चुनौती दी गई और छात्रवृत्ति और शुल्क प्रतिपूर्ति राशि जारी करने के संबंध में प्रार्थना की गई। साथ ही साथ याचिकाकर्ताओं ने अपने परीक्षा फॉर्म जमा करने और एलएलबी की आगामी सेमेस्टर परीक्षाओं में सम्मिलित कराने की प्रार्थना भी की।

निजी कॉलेजों की फीस तय करने पर इलाहबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने यह कहा

याचिकाकर्ताओं ने प्रस्तुत किया कि उन्हें एल.एल.बी. में लखनऊ के एक एसोसिएटेड कॉलेज के पांच वर्षीय एकीकृत पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया। पाठ्यक्रम में प्रत्येक वर्ष दो सेमेस्टर के साथ 10 सेमेस्टर शामिल हैं और पाठ्यक्रम का शुल्क रु 25,000 / – प्रति सेमेस्टर है अर्थात रु 50,000 / – प्रति शैक्षणिक वर्ष है। याचिकाकर्ता सामान्य श्रेणी से संबंधित हैं और उनकी पृष्ठभूमि बहुत खराब है क्योंकि उनके पिता की वार्षिक आय केवल रु 48, 000 / – है।

यह आगे प्रस्तुत किया गया था कि केवल लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध निजी कॉलेजों की फीस तय करने का अधिकार राज्य सरकार को है, न कि विश्वविद्यालय को।

उनका तर्क यह था कि याचिकाकर्ताओं ने 2014 की योजना के तहत प्रवेश लिया था, 2014 की योजना (छात्रवृत्ति के लिए 60% अंक निर्धारित), शैक्षणिक वर्ष 2015-16 से लागू की गयी थी और इसलिए, 2016 की संशोधित योजना उनपर लागू नही होती है। याचिकाकर्ताओं ने हालांकि स्वीकार किया कि उन्होंने इंटरमीडिएट परीक्षा में क्रमशः 58% और 57% अंक प्राप्त किए हैं।

रिट याचिका का विरोध करते हुए राज्य के वकील ने कहा कि 2016 की योजना के नियम 5 (xv) (GA) के कारण, याचिकाकर्ताओं को पूर्ण शुल्क प्रतिपूर्ति और छात्रवृत्ति के लिए अयोग्य पाया गया था।

लखनऊ विश्वविद्यालय (Lucknow University) के वकील श्री सावित्र वर्धन सिंघ ने अदालत को सूचित किया कि लखनऊ विश्वविद्यालय के संबद्ध कॉलेजों के लिए शुल्क राज्य सरकार द्वारा निर्धारित किया जाना है, लेकिन राज्य सरकार ने अभी तक शुल्क निर्धारित नहीं किया है। लखनऊ विश्वविद्यालय के पास इससे संबद्ध निजी संस्थानों के शुल्क का निर्धारण करने की कोई शक्ति नहीं है।

यह भी कहा गया की लखनऊ विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद ने संकल्प लिया है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के परिसर में संचालित अपने व्यावसायिक स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों के लिए विश्वविद्यालय अध्यादेश के माध्यम से शुल्क निर्धारित किया गया है, और यह समानता निजी संस्थानों पर भी लागू किया जाना चाहिए। उक्त हेतु राज्य सरकार के अनुमोदन के लिए राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 52 (3) (सी) के तहत एक प्रस्ताव बनाया गया है, लेकिन यह अभी भी लंबित है।

इसके अलावा, यह राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत किया गया कि कॉलेज द्वारा अपने छात्रों के ऑनलाइन फॉर्म को सत्यापित करते हुए कॉलेज द्वारा अतिरिक्त शुल्क का उल्लेख किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप कॉलेज को 2016 की योजना के तहत अतिरिक्त धनराशि का भुगतान किया गया है। जिला मजिस्ट्रेट, लखनऊ / छात्रवृत्ति स्वीकृति समिति लखनऊ के अध्यक्ष द्वारा वसूली नोटिस जारी किए गए हैं।

उच्च न्यायालय लखनऊ (High Court) में पक्षों की सुनवाई के बाद रिट याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि यह योजना गैर-आरक्षित वर्ग के “मेधावी” छात्रों की मदद करने के लिए बनाई गई थी, जिनके अभिभावक की वित्तीय स्थिति ऐसी थी कि वे अपने व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को सुचारू रूप से नही पढ़ सकते थे।

नियम 6 (i) (क) से यह स्पष्ट है कि पूर्ण शुल्क प्रतिपूर्ति और छात्रवृत्ति के लिए पात्रता के लिए 12 वीं कक्षा की परीक्षा में 60% अंक हासिल करना अनिवार्य है।

न्यायालय ने पाया कि इसने पहले ही कॉलेज के लिए वकील द्वारा उठाए गए तर्कों और विपरीत पार्टी नंबर 5 के वकील द्वारा इसके बारे में विस्तृत आदेश पर विचार किया था, जो कि 06.02.2020 को पारित किया गया था, जहां यह निष्कर्ष निकला था कि विश्वविद्यालय निजी महाविद्यालयों में संचालित पाठ्यक्रमों का शुल्क निर्धारित करने के लिए सक्षम है। पांच-वर्षीय एलएलबी का शुल्क तय करने के लिए 30.07.2018 के सरकारी आदेश को ध्यान में रखते हुए पहले सरकारी आदेश दिनांक 25.05.2015 के समान शर्तों पर निजी कॉलेजों द्वारा इससे संबंधित ऑनर्स कोर्स चलाया जा रहा है। कुछ ग़लतफ़हमी के तहत, रजिस्ट्रार ने इस मामले को एक बार फिर राज्य सरकार को मंजूरी के लिए भेजा, जिसकी आवश्यकता नहीं थी, और इसलिए यह मामला लंबित रहा। 30.07.2018 को सरकार के आदेश के मद्देनजर विश्वविद्यालय महाविद्यालयों में संचालित पाठ्यक्रमों की फ़ीस निर्धारित करने के लिए सक्षम है और महाविद्यालय वह फ़ीस छात्रों से ले सकते है।

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न्यायालय ने यह भी कहा कि चूंकि दोनों याचिकाकर्ता ने 60% से कम अंक प्राप्त किए थे, इसलिए उन्हें छात्रवृत्ति और शुल्क प्रतिपूर्ति की राशि से वंचित करना उचित था।

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