एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह स्पष्ट किया है कि संपत्ति के बंटवारे के लिए सीमावधि (Limitation) की गणना बिक्री विलेख (Sale Deed) की रजिस्ट्री की तारीख से शुरू होती है, न कि किसी बाद में हुई कथित जानकारी से। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 1968 में हुए मौखिक पारिवारिक बंटवारे के बाद 1978 में संपत्ति की बिक्री के लिए की गई रजिस्ट्री के 45 साल बाद, 2023 में दाखिल एक बंटवारा वाद को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें उसने ट्रायल कोर्ट द्वारा वाद खारिज किए जाने के निर्णय को पलटते हुए मामले को फिर से सुनवाई के लिए वापस भेजा था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस प्रकार की देरी से दायर और आधारहीन याचिकाएं दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) की आदेश VII नियम 11 के तहत प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दी जानी चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला बेंगलुरु के साउथ तालुक स्थित पट्टनगेरे गांव में स्थित एक पैतृक संपत्ति से जुड़ा है। वाद शिवन्ना की बेटी मंगालम्मा के बच्चों द्वारा दाखिल किया गया था, जिसमें उन्होंने पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगा था। संपत्ति मूलतः बोरन्ना नामक व्यक्ति की थी, जिनके चार बेटे थे— नंजुंडप्पा, सिद्धप्पा, बसप्पा और शिवन्ना।

वादकारियों ने दावा किया कि संपत्ति का बंटवारा कभी नहीं हुआ और उन्हें उनका हिस्सा नहीं दिया गया। वहीं प्रतिवादी, जो बसप्पा के पुत्र शंथप्पा के वंशज हैं, उन्होंने तर्क दिया कि 1968 में मौखिक रूप से पारिवारिक बंटवारा हो चुका था, जिसे बाद में राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया गया और 1978 में रजिस्टर्ड बिक्री विलेखों के माध्यम से संपत्ति का अंतरण किया गया, जिनमें वादकारियों के रिश्तेदार भी शामिल थे।
ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट का दृष्टिकोण
ट्रायल कोर्ट ने वाद को आदेश 7 नियम 11 CPC के तहत इस आधार पर खारिज कर दिया कि यह सीमावधि से बाहर है और इसमें कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है। परंतु कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस आदेश को पलटते हुए मामले को ट्रायल कोर्ट को यह कहकर वापस भेज दिया कि इसमें तथ्यात्मक विवाद हैं जिन्हें सुनवाई की आवश्यकता है।
प्रतिवादी फिर इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उठे मुख्य प्रश्न
- क्या 2023 में दाखिल बंटवारा वाद सीमावधि से बाहर था?
- क्या 1978 में निष्पादित बिक्री विलेखों से वादकारियों को परोक्ष सूचना (constructive notice) प्राप्त मानी जाएगी?
- क्या वाद पत्र (plaint) को आदेश VII नियम 11 CPC के तहत खारिज किया जाना चाहिए?
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (प्रतिवादियों) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सुंदरम ने प्रस्तुत किया:
- 1968 में मौखिक बंटवारा हुआ था और उसे राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया गया था।
- 1978 में किए गए बिक्री विलेखों से वादकारियों के रिश्तेदारों ने भी संपत्ति बेची थी।
- वादकारियों ने यह नहीं बताया कि उन्हें इन लेनदेन की जानकारी कब हुई।
- यह वाद केवल सीमावधि की पाबंदी से बचने के लिए चतुराई से तैयार किया गया है।
प्रतिवादियों (वादकारियों) का तर्क था:
- उन्हें हाल ही में इन लेनदेन की जानकारी मिली, जिसके बाद उन्होंने वाद दायर किया।
- सीमावधि की गणना जानकारी प्राप्त होने की तारीख से की जानी चाहिए।
- इस मामले में तथ्यात्मक विवाद हैं, इसलिए पूर्ण सुनवाई जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के पुनः विचार आदेश को निरस्त करते हुए ट्रायल कोर्ट का वाद खारिज करने का आदेश बहाल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वादकारियों को 1978 की बिक्री विलेखों से परोक्ष सूचना प्राप्त थी और वे 45 साल बाद इसे अनदेखा नहीं कर सकते।
“वादकारियों अपने अधिकारों को 45 वर्षों तक सोए रहने के बाद फिर से जीवित नहीं कर सकते। यह वाद प्रथम दृष्टया कानून द्वारा वर्जित है।”
कोर्ट ने Suraj Lamp Industries बनाम हरियाणा राज्य [(2012) 1 SCC 656] का हवाला देते हुए कहा:
“रजिस्ट्री पूरी दुनिया को सूचना प्रदान करती है… यह दर्शाती है कि संपत्ति पर कोई कानूनी दायित्व या उत्तरदायित्व है या नहीं… तथा किसके पास स्वामित्व है।”
Mukund Bhavan Trust बनाम श्रीमंत छत्रपति उदयन राजे भोंसले (2024) के निर्णय का हवाला देते हुए कहा:
“रजिस्ट्री की तारीख से परोक्ष सूचना मानी जाती है और संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 3 के तहत अनुमान लागू हो जाता है।”
साथ ही, Madanuri Sri Rama Chandra Murthy बनाम Syed Jalal [(2017) 13 SCC 174] के हवाले से कोर्ट ने कहा:
“अगर वाद पत्र की चतुराई से ड्राफ्टिंग कर झूठा कारण बनाया गया हो, तो कोर्ट उसे प्रारंभिक चरण में ही समाप्त कर सकता है।”
अंतिम आदेश
- कर्नाटक हाईकोर्ट का दिनांक 08.01.2025 का आदेश रद्द किया गया।
- ट्रायल कोर्ट द्वारा आदेश VII नियम 11 CPC के तहत वाद खारिज किए जाने का आदेश पुनः बहाल किया गया।
- दोनों अपीलें स्वीकार की गईं।
- सभी लंबित आवेदन खारिज किए गए।