केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बार एसोसिएशन ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ (POSH एक्ट) के तहत एक “नियोक्ता” (Employer) की परिभाषा में नहीं आता है। इसलिए, बार एसोसिएशन के पास अपने सदस्यों के बीच यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए आंतरिक शिकायत समिति (ICC) गठित करने का कोई अधिकार नहीं है।
न्यायमूर्ति पी.एम. मनोज की पीठ ने एक वरिष्ठ वकील के खिलाफ बार एसोसिएशन द्वारा गठित ICC की रिपोर्ट को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बार एसोसिएशन द्वारा ऐसी समिति का गठन POSH एक्ट की धारा 4 के तहत कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कोल्लम बार एसोसिएशन के सदस्य और 76 वर्षीय वरिष्ठ वकील ई. शानवास खान की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने बार एसोसिएशन द्वारा गठित ICC की रिपोर्ट और उसके आधार पर अपने निलंबन को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। यह कार्यवाही 24 वर्षीय एक जूनियर महिला वकील (तीसरा प्रतिवादी) द्वारा दायर शिकायत पर शुरू की गई थी।
शिकायतकर्ता का आरोप था कि 14 जून, 2024 को जब वह एक दस्तावेज के नोटरीकरण (Notarisation) पर चर्चा करने के लिए याचिकाकर्ता के आवास पर गई थीं, तब उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। इस मामले में बार एसोसिएशन में शिकायत दर्ज कराने के अलावा, पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 और 354A के तहत एक प्राथमिकी (FIR) भी दर्ज की थी।
शिकायत के आधार पर, कोल्लम बार एसोसिएशन ने एक ICC का गठन किया, जिसने जांच की और एक रिपोर्ट (Ext.P8) प्रस्तुत की। इसके बाद याचिकाकर्ता को एसोसिएशन से निलंबित कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि ICC की कार्यवाही अधिकार क्षेत्र से बाहर थी क्योंकि बार एसोसिएशन उनका नियोक्ता नहीं है।
कोर्ट के समक्ष दलीलें
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि POSH एक्ट का उद्देश्य कार्यस्थल पर महिला कर्मचारियों की सुरक्षा करना है। उन्होंने कहा कि उनका निजी आवास बार एसोसिएशन के संबंध में “कार्यस्थल” नहीं माना जा सकता। यह भी दलील दी गई कि “न तो याचिकाकर्ता और न ही शिकायतकर्ता कोल्लम बार एसोसिएशन के कर्मचारी हैं, और इसलिए उनके बीच कोई नियोक्ता-कर्मचारी संबंध मौजूद नहीं है।” याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बार एसोसिएशन एक क्लब की तरह है और वकील का कार्यालय कोई ‘उद्योग’ नहीं है।
दूसरी ओर, कोल्लम बार एसोसिएशन और ICC ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि एसोसिएशन त्रावणकोर कंपनी विनियम के तहत एक पंजीकृत कंपनी है। उन्होंने ऑरेलियनो फर्नांडीस बनाम गोवा राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला दिया, जिसमें पेशेवर निकायों को ICC गठित करने का आदेश दिया गया था।
शिकायतकर्ता ने रिट याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर प्रारंभिक आपत्ति जताई और तर्क दिया कि बार एसोसिएशन संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत “राज्य” नहीं है, इसलिए उसके खिलाफ रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती।
कोर्ट का विश्लेषण
रिट याचिका की पोषणीयता पर
हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि बार एसोसिएशन के खिलाफ रिट याचिका स्वीकार्य नहीं है। न्यायमूर्ति मनोज ने कहा कि यद्यपि बार काउंसिल वकीलों के लिए जिम्मेदार वैधानिक निकाय है, लेकिन बार एसोसिएशन को केरल अधिवक्ता कल्याण कोष अधिनियम, 1980 की धारा 13 के तहत मान्यता प्राप्त है।
कोर्ट ने अब्दुल अजीज बनाम अलाप्पुझा बार एसोसिएशन और अन्य पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले का मुख्य प्रश्न ICC के कथित अवैध गठन से जुड़ा है, इसलिए हाईकोर्ट के पास इस याचिका पर सुनवाई का पूरा अधिकार है।
बार एसोसिएशन द्वारा ICC के गठन पर
कोर्ट ने POSH एक्ट की धारा 2(g) और धारा 4 का विश्लेषण किया। धारा 4 के अनुसार, “कार्यस्थल के प्रत्येक नियोक्ता” को एक ICC गठित करना अनिवार्य है। कोर्ट ने इस बात की जांच की कि क्या बार एसोसिएशन एक नियोक्ता के रूप में योग्य है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:
“नियोक्ता का गठन करने वाला प्राधिकारी अनिवार्य रूप से वह व्यक्ति होता है जो अपने कर्मचारियों के संबंध में संविदात्मक दायित्व (Contractual Obligation) का निर्वहन करता है। जहां तक एक वकील का संबंध है, याचिकाकर्ता की भूमिका उक्त प्रावधानों में उल्लिखित किसी भी प्राधिकारी के तहत नहीं आती है।”
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि बार एसोसिएशन को उसके सदस्यों के संबंध में अधिनियम के तहत ‘नियोक्ता’ नहीं माना जा सकता है। फैसले में कहा गया:
“बार एसोसिएशन को उक्त शर्तों के तहत ‘नियोक्ता’ नहीं माना जा सकता। इसलिए, ICC का गठन POSH एक्ट की धारा 4 के जनादेश के तहत योग्य नहीं है। अतः, पहले प्रतिवादी (बार एसोसिएशन) द्वारा ICC का गठन स्वयं POSH एक्ट की धारा 4 के उद्देश्य और विशिष्ट आवश्यकताओं के विरुद्ध है।”
निर्णय
केरल हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि समिति का गठन ही त्रुटिपूर्ण था, इसलिए ICC द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट का “कोई कानूनी आधार नहीं है।”
तदनुसार, कोर्ट ने ICC की रिपोर्ट (Ext.P8) को रद्द (Set Aside) कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने यौन उत्पीड़न के तथ्यात्मक आरोपों या निलंबन आदेश के गुण-दोष पर कोई विचार नहीं किया है और उन मुद्दों को खुला रखा है। रिट याचिका का निपटारा इस निष्कर्ष के साथ किया गया कि बार एसोसिएशन के पास इस उद्देश्य के लिए ICC गठित करने की POSH एक्ट के तहत वैधानिक शक्ति नहीं थी।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: ई. शानवास खान बनाम कोल्लम बार एसोसिएशन और अन्य
- मामला संख्या: डब्ल्यूपी (सी) संख्या 39539/2024
- पीठ: न्यायमूर्ति पी.एम. मनोज

