कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के प्रावधान शून्य (Void) या शून्यकरणीय (Voidable) विवाह, या विवाह की प्रकृति वाले संबंधों (जैसे ‘लिव-इन’ रिलेशनशिप) में भी लागू होते हैं।
जस्टिस सूरज गोविंदराज की पीठ ने एक कार्डियोलॉजिस्ट (हृदय रोग विशेषज्ञ) और उनके परिवार द्वारा दायर आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कोई भी पुरुष अपनी खुद की दूसरी शादी की वैधता को चुनौती देकर या यह दावा करके कि संबंध को कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं थी, धारा 498A के तहत दायित्व से बच नहीं सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
हाईकोर्ट के समक्ष दो आपराधिक याचिकाएं (Crl.P. No. 8134/2024 और Crl.P. No. 9412/2021) सुनवाई के लिए थीं। याचिकाकर्ता (आरोपी नंबर 1) पेशे से एक डॉक्टर हैं।
शिकायतकर्ता महिला (प्रतिवादी नंबर 2) ने आरोप लगाया कि उनका विवाह याचिकाकर्ता के साथ 17 अक्टूबर 2010 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। शादी के समय उनके परिवार ने सोना, चांदी और नकद राशि दी थी। इसके बाद वे बेंगलुरु और फिर शिवमोगा में पति-पत्नी की तरह साथ रहे।
शिकायतकर्ता ने दो अलग-अलग घटनाओं के आधार पर आपराधिक मामले दर्ज कराए:
- चोरी और उत्पीड़न (शिवमोगा): जुलाई 2016 में, जब वह अपने माता-पिता के घर से लौटीं, तो उन्होंने पाया कि उनका वैवाहिक घर खाली था और याचिकाकर्ता सारा सामान ले गए थे। इस पर धारा 380 (चोरी) और बाद में धारा 498A IPC के तहत मामला दर्ज किया गया।
- हत्या का प्रयास (बेंगलुरु): 5 सितंबर 2016 को, जब शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता से उनकी पहली शादी (जिसका खुलासा पहले नहीं किया गया था) के बारे में सवाल किया, तो झगड़ा हो गया। आरोप है कि याचिकाकर्ता ने उन पर केरोसिन डालकर आग लगा दी। वह बुरी तरह जल गईं और उन्हें के.सी. जनरल अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस मामले में धारा 498A, 307 (हत्या का प्रयास), 494 (द्विविवाह/Bigamy) और दहेज निषेध अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील, श्री ए.एन. राधाकृष्ण ने तर्क दिया कि:
- विवाह वैध नहीं है: याचिकाकर्ता पहले से ही श्रीमती नवीना नामक महिला से विवाहित थे और वह शादी कायम थी। इसलिए, प्रतिवादी नंबर 2 के साथ हुआ विवाह शुरू से ही शून्य (Void ab initio) था। उन्होंने दलील दी कि धारा 498A में “पति” शब्द का अर्थ कानूनी रूप से वैध विवाह से है, और लिव-इन रिलेशनशिप इस धारा के दायरे में नहीं आता।
- बयान की स्वीकार्यता: अस्पताल में हेड कांस्टेबल द्वारा दर्ज किया गया बयान डॉक्टर की उपस्थिति में नहीं लिया गया था। यदि शिकायतकर्ता की मृत्यु हो जाती, तो यह बयान ‘मृत्युकालीन कथन’ (Dying Declaration) के रूप में मान्य नहीं होता।
- दोहरे मुकदमे: याचिकाकर्ता पर एक ही अपराध (धारा 498A) के लिए दो अलग-अलग अदालतों (शिवमोगा और बेंगलुरु) में मुकदमा चलाया जा रहा है।
राज्य सरकार (HCGP श्री एम.आर. पाटिल) और शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि दोनों का साथ रहना धारा 498A की कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त है। बेंगलुरु का मामला हत्या के प्रयास के एक अलग अपराध से संबंधित है।
कोर्ट का विश्लेषण
1. धारा 498A IPC के तहत “पति” की परिभाषा का दायरा
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को खारिज कर दिया कि धारा 498A केवल वैध विवाहों पर लागू होती है। जस्टिस गोविंदराज ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य महिलाओं को क्रूरता से बचाना है और इसके प्रावधानों की व्याख्या व्यापक दृष्टिकोण से की जानी चाहिए।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“यदि याचिकाकर्ता की दलील मान ली जाए, तो इसका परिणाम अन्यायपूर्ण होगा। इसका अर्थ यह होगा कि जो पुरुष अपनी पहली शादी को छिपाकर किसी महिला को धोखे से शून्य विवाह में फंसाता है, वह केवल इसलिए धारा 498A के तहत आपराधिक दायित्व से बच जाएगा क्योंकि वह विवाह कानूनी रूप से वैध नहीं है।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“मैं यह मानता हूं कि धारा 498A IPC में ‘पति’ शब्द केवल कानूनी रूप से वैध विवाह वाले पुरुष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यक्ति पर भी लागू होता है जो शून्य या शून्यकरणीय विवाह संबंध में प्रवेश करता है, या ऐसे ‘लिव-इन’ रिलेशनशिप में रहता है जिसमें विवाह के गुण मौजूद हों, बशर्ते क्रूरता के आवश्यक तत्व पूरे होते हों।”
पीठ ने नोट किया कि दोनों ने पति-पत्नी के रूप में सहजीवन बिताया और वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन किया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को अपनी ही धोखाधड़ी का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
2. दो अलग-अलग अदालतों में मुकदमा
याचिकाकर्ता की इस दलील में कोर्ट ने दम पाया कि एक ही अपराध (धारा 498A) के लिए दो अलग-अलग जगहों पर मुकदमा चलाने से विरोधाभासी फैसले आ सकते हैं।
3. पीड़ित के बयान की वैधता
कोर्ट ने ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ से संबंधित प्रक्रियात्मक अनियमितताओं की दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 26(1)) के तहत ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ का सिद्धांत तभी लागू होता है जब बयान देने वाले की मृत्यु हो चुकी हो।
कोर्ट ने कहा:
“मौजूदा मामले में, प्रतिवादी नंबर 2 जीवित हैं… इसलिए, बयान को ‘डाइंग डिक्लेरेशन’ मानने या परखने का सवाल ही नहीं उठता। उनके बयान को एक गवाह या पीड़ित के सामान्य बयान के रूप में माना जाएगा… और इसके साक्ष्य मूल्य का आकलन ट्रायल के दौरान किया जाएगा।”
निर्णय
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कार्यवाही को रद्द करने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया। हालांकि, एक ही अपराध के लिए कई कार्यवाहियों के मुद्दे को हल करने के लिए, कोर्ट ने शिवमोगा (C.C.No.630/2019) में लंबित मामले को बेंगलुरु के 24वें अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में स्थानांतरित करने का आदेश दिया, ताकि बेंगलुरु वाले मामले (C.C.No.28129/2023) के साथ इसकी सुनवाई हो सके।

