कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ पीठ ने एक विवाहित बेटी द्वारा अपने पिता की मृत्यु के लगभग दो दशक बाद अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की मांग करने वाली रिट अपील को खारिज कर दिया है। जस्टिस बी.एम. श्याम प्रसाद और जस्टिस शिवशंकर अमरन्नावर की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि अपीलकर्ता ने अपनी पिछली अर्जी के खारिज होने के तथ्य को कोर्ट से छिपाया और वह परिवार की तत्काल वित्तीय तंगी को साबित करने में विफल रही।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता श्रीमती लक्ष्मी, दिवंगत नागप्पा कित्तूर की बेटी हैं, जो बेलगावी जिला न्यायालय के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के अधीन अटेंडर के रूप में कार्यरत थे। 21 जून 2005 को सेवा के दौरान उनके पिता के निधन के बाद, उन्होंने अनुकंपा के आधार पर रोजगार के लिए एक आवेदन प्रस्तुत किया था।
हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने 21 नवंबर 2007 को उनकी प्रारंभिक अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी थी कि वह एक विवाहित बेटी हैं और कर्नाटक सिविल सेवा (अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति) नियम, 1996 के नियम 3 के तहत पात्र नहीं हैं। इस फैसले की सूचना अपीलकर्ता को दी गई थी और 26 दिसंबर 2007 को व्यक्तिगत रूप से उन्हें तामील कराई गई थी।
इस जानकारी के बावजूद, अपीलकर्ता ने 2008 में एक रिट याचिका (W.P.No. 6430/2008) दायर की, जिसमें दावा किया गया कि उनका आवेदन अभी भी लंबित है। कोर्ट ने तथ्यों के इस छिपाव से अनभिज्ञ रहते हुए उन्हें नया आवेदन देने की अनुमति दी थी। बाद में 2016 में यह नया आवेदन भी खारिज कर दिया गया, जिससे वर्तमान कानूनी विवाद उत्पन्न हुआ।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि विवाहित बेटी को भी आश्रित माना जाना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि संशोधित नियम अब विवाहित बेटियों को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का प्रावधान देते हैं, इसलिए अपील को स्वीकार किया जाना चाहिए।
वहीं, प्रतिवादियों के वकील ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता के मामले को 2007 में ही खारिज कर दिया गया था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 2008 में पहली रिट याचिका दायर करते समय अपीलकर्ता ने “अपने आवेदन के खारिज होने के तथ्य को छिपाया” था। उन्होंने आगे कहा कि उस समय के प्रचलित नियमों के अनुसार, अपने पति के परिवार के साथ रहने वाली विवाहित बेटी को मृतक कर्मचारी का आश्रित नहीं माना जा सकता था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
खंडपीठ ने गौर किया कि अपीलकर्ता ने पहली बार आवेदन खारिज होने के बाद जनवरी 2008 में अपने मूल दस्तावेज वापस ले लिए थे, फिर भी कुछ महीनों बाद याचिका दायर कर दावा किया कि उन्हें कोई सूचना नहीं मिली। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की, “अपीलकर्ता याचिकाकर्ता ने पहले के खारिज होने के तथ्य को छिपाते हुए 15.04.2008 को रिट याचिका दायर की… उस याचिका में अपीलकर्ता-याचिकाकर्ता ने अपने आवेदन की अस्वीकृति के बारे में नहीं बताया था।”
विवाहित बेटियों की पात्रता पर हाईकोर्ट ने इस कोर्ट की खंडपीठ के एक पिछले फैसले (श्रीमती मेघा जे. बनाम भारतीय जीवन बीमा निगम) का हवाला दिया, जो सुप्रीम कोर्ट के महाराष्ट्र राज्य बनाम माधुरी मारुति विधाते के फैसले पर आधारित था। कोर्ट ने उद्धृत किया:
“ससुराल में रहने वाली विवाहित बेटी को सामान्यतः उसके पिता पर आश्रित नहीं माना जा सकता… हमारे शास्त्र निर्देश देते हैं ‘भर्ता रक्षति यौवने…’ जिसका शाब्दिक अर्थ है कि अपनी आश्रित पत्नी का भरण-पोषण करना पति का कर्तव्य है।”
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि अनुकंपा नियुक्ति का मुख्य उद्देश्य तत्काल वित्तीय संकट का समाधान करना है। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की मृत्यु के दो दशक बाद तक की “लंबी देरी” ने इस दावे की गंभीरता को समाप्त कर दिया है:
“इस लंबी अवधि के दौरान, याचिकाकर्ता के परिवार की वित्तीय स्थिति और जरूरतों में महत्वपूर्ण बदलाव आए होंगे। परिवार द्वारा अनुभव की गई वित्तीय बाधाओं की शुरुआती तात्कालिकता इतने लंबे समय के बाद अब प्रासंगिक नहीं रह सकती है।”
बेंच ने आगे कहा कि यदि कोई परिवार इतने लंबे समय तक अपना भरण-पोषण करने में सक्षम रहा है, तो “तत्काल वित्तीय राहत” प्रदान करने का उद्देश्य लागू नहीं होता।
फैसला
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता पात्रता मानदंड को पूरा नहीं करती है और उसके पास अनुकंपा नियुक्ति की मांग करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अपील में कोई योग्यता न पाते हुए बेंच ने आदेश दिया, “रिट कोर्ट ने सही माना है कि अपीलकर्ता-याचिकाकर्ता के पास पात्रता मानदंड नहीं है और उसके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है… हम अपील को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं।”
इसी के साथ रिट अपील को खारिज कर दिया गया।
मामले का विवरण
- केस टाइटल: श्रीमती लक्ष्मी बनाम रजिस्ट्रार जनरल, कर्नाटक हाईकोर्ट व अन्य
- केस नंबर: रिट अपील संख्या 100548/2024 (S-RES)
- फैसले की तारीख: 13 मार्च, 2026
- बेंच: जस्टिस बी.एम. श्याम प्रसाद और जस्टिस शिवशंकर अमरन्नावर

