इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। बुधवार को हुई सुनवाई में जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने शीर्ष अदालत के समक्ष तर्क दिया कि यह समिति ‘कानून की नजर में अस्तित्वहीन’ (non-est) है क्योंकि इसके गठन में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ के समक्ष दलीलें पेश करते हुए रोहतगी ने कहा कि जजेस (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है।
क्या है पूरा विवाद?
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि 21 जुलाई, 2025 को संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव एक ही दिन पेश किए गए थे। हालांकि, राज्यसभा के उपसभापति ने 11 अगस्त को इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जबकि लोकसभा अध्यक्ष ने इसे स्वीकार करते हुए 12 अगस्त को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन कर दिया।
रोहतगी ने तर्क दिया कि कानून के मुताबिक, जब दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिए जाते हैं, तो किसी भी समिति का गठन तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार न हो जाए। ऐसी स्थिति में लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा संयुक्त रूप से समिति गठित करने का प्रावधान है।
उन्होंने जोर देकर कहा, “मौजूदा मामले में, एक प्रस्ताव खारिज कर दिया गया था। इसलिए, इसके बाद लोकसभा द्वारा गठित समिति कानूनन मान्य नहीं है और पूरी प्रक्रिया निरस्त मानी जानी चाहिए।”
पीठ ने पूछे कड़े सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने रोहतगी की दलीलों पर सवाल भी उठाए। जस्टिस दत्ता ने पूछा कि क्या कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान है जो यह कहता हो कि यदि राज्यसभा प्रस्ताव को खारिज कर देती है, तो लोकसभा अपनी कार्यवाही आगे नहीं बढ़ा सकती?
पीठ ने टिप्पणी की कि अधिनियम में स्पष्ट रूप से ऐसा कोई रोक (bar) नहीं है जो एक सदन द्वारा प्रस्ताव अस्वीकार किए जाने पर दूसरे सदन को समिति नियुक्त करने से रोकता हो।
मामले की पृष्ठभूमि: जले हुए नोट और कदाचार के आरोप
यह पूरा मामला 14 मार्च को उस वक्त शुरू हुआ था, जब नई दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर कथित तौर पर जले हुए नोटों की गड्डियां मिली थीं। इस घटना के बाद उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से वापस इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया गया था।
इससे पहले, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने इस मामले की जांच के लिए एक ‘इन-हाउस’ जांच समिति का गठन किया था। इस समिति में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जी.एस. संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थीं।
इस समिति ने 4 मई को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें जस्टिस वर्मा को कदाचार (misconduct) का दोषी पाया गया था। जब जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया, तो CJI ने रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दी, जिसके बाद महाभियोग की कार्यवाही शुरू हुई।
वर्तमान स्थिति
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार, मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य शामिल हैं। जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में इस समिति के गठन, लोकसभा अध्यक्ष द्वारा प्रस्ताव को स्वीकार करने के निर्णय और समिति द्वारा जारी किए गए नोटिसों को रद्द करने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 16 दिसंबर को जस्टिस वर्मा की याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई थी और लोकसभा अध्यक्ष व दोनों सदनों के महासचिवों को नोटिस जारी किया था। फिलहाल मामले की सुनवाई जारी है।

