जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के एक मामले में जिला विकास परिषद (DDC) की एक सदस्य को अग्रिम जमानत दे दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि क्या “छिनाल” जैसा कोई विशेष शब्द जातिसूचक गाली की श्रेणी में आता है, यह तथ्यों का विवादित प्रश्न है जिसे केवल पूर्ण ट्रायल (मुकदमे) के दौरान ही सुलझाया जा सकता है।
जस्टिस राजेश सेखरी ने संतोष देवी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि गिरफ्तारी से पहले जमानत पर लगा वैधानिक प्रतिबंध तब लागू नहीं होता जब अपराध के आवश्यक तत्व—विशेष रूप से जाति के आधार पर अपमानित करने का इरादा—उपलब्ध साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया (prima facie) स्थापित नहीं होते हों।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 8 जनवरी, 2026 को कस्तीगढ़ में एक सड़क के उद्घाटन के दौरान हुई घटना से जुड़ा है। ‘मेघ’ समुदाय (अनुसूचित जाति) से ताल्लुक रखने वाले शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता और उसके बेटों ने उन पर बिना किसी उकसावे के हमला किया। SC/ST एक्ट के तहत मुख्य आरोप यह था कि याचिकाकर्ता ने सार्वजनिक रूप से शिकायतकर्ता के खिलाफ “छिनाल” शब्द का प्रयोग कर उन्हें अपमानित किया।
इस संबंध में डोडा पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं और SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत FIR दर्ज की गई थी। भद्रवाह की ट्रायल कोर्ट द्वारा 21 जनवरी, 2026 को जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया था।
भाषाई विवाद: “छिनाल” शब्द का अर्थ
याचिकाकर्ता के तर्क: याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि “छिनाल” शब्द जाति से संबंधित नहीं है। उन्होंने इसके दो अलग-अलग अर्थ बताए:
- इंटरनेट/सामान्य उपयोग: यह महिलाओं के लिए इस्तेमाल होने वाला एक जेंडर-विशिष्ट शब्द है, जो पुरुष शिकायतकर्ता पर लागू नहीं होता।
- स्थानीय/धार्मिक उपयोग: डोडा जिले में यह शब्द “छिन्ना” (धार्मिक प्रतीक जैसे त्रिशूल) से निकला है। “छिनाल” वह व्यक्ति होता है जो इन प्रतीकों की देखभाल करता है और धार्मिक गतिविधियों से पहले उसकी पूजा की जाती है।
प्रतिवादी (सरकार) के तर्क: सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि स्थानीय स्तर पर इस शब्द को ‘मेघ’ समुदाय से जुड़ी एक अपमानजनक जातिसूचक गाली के रूप में समझा जाता है। राज्य ने इस दावे के समर्थन में स्थानीय लंबरदार और चौकीदार के बयानों का हवाला दिया।
“छिनाल” शब्द पर हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस सेखरी ने स्पष्ट किया कि जमानत याचिका पर विचार करते समय अदालत ऐसे विवादों को सुलझाने के लिए “मिनी-ट्रायल” शुरू नहीं कर सकती। इस्तेमाल किए गए शब्द के अर्थ के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा:
“इसलिए, याचिकाकर्ता द्वारा शिकायतकर्ता के खिलाफ बोला गया ‘छिनाल’ शब्द जाति-आधारित है, जेंडर-विशिष्ट है, या कोई धार्मिक प्रतीक है, इसका निर्णय केवल पूर्ण ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है। जमानत याचिका पर विचार करने के लिए अपने आपराधिक क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते समय यह अदालत तथ्यों के ऐसे विवादित प्रश्नों में नहीं जा सकती।”
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि भले ही कोई शब्द अनुसूचित जाति के आदेश की सूची में शामिल न हो, फिर भी यदि उसका उपयोग किसी मान्यता प्राप्त समुदाय से जुड़े अपमान और इरादे के साथ किया जाता है, तो वह अपराध बन सकता है। हालांकि, धारा 18 के तहत जमानत पर प्रतिबंध तभी लागू होता है जब अपमान का इरादा स्पष्ट रूप से “शिकायतकर्ता की जाति की पहचान” के कारण हो।
साक्ष्य और निर्णय
घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग और याचिकाकर्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस की समीक्षा करने के बाद, हाईकोर्ट ने पाया कि कथित जातिसूचक अपमान स्पष्ट रूप से सुनाई नहीं दे रहा है और न ही इसकी पुष्टि हुई है। अदालत ने कहा:
“रिकॉर्डिंग में जो देखा या सुना जा सकता है वह केवल हंगामा है। कुछ भी स्पष्ट रूप से सुनाई नहीं दे रहा है। इसी तरह, प्रेस कॉन्फ्रेंस की वीडियो रिकॉर्डिंग में… याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा कोई दावा या स्वीकारोक्ति नहीं है कि उसने किसी भी समय शिकायतकर्ता को उसके जाति के नाम से गाली दी थी।”
यह निष्कर्ष निकालते हुए कि SC/ST एक्ट के आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया गायब हैं, हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली। संतोष देवी को गिरफ्तारी की स्थिति में 25,000 रुपये के मुचलके पर रिहा करने का निर्देश दिया गया, बशर्ते वह जांच में सहयोग करें।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: संतोष देवी बनाम यूटी ऑफ जेएंडके और अन्य
- केस नंबर: CRM(M) No. 63/2026
- बेंच: जस्टिस राजेश सेखरी
- दिनांक: 2 अप्रैल, 2026

