पति की आय छिपाने की कोशिशों पर हाईकोर्ट सख्त; पत्नी को वित्तीय विवरण देने का दिया निर्देश, निचली अदालत का फैसला रद्द

घरेलू हिंसा और भरण-पोषण (मेंटेनेंस) से जुड़े मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक महिला द्वारा अपने पति की आय और संपत्ति का विवरण मांगे जाने की याचिका को खारिज कर दिया गया था।

जस्टिस बृज राज सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि भरण-पोषण और घरेलू हिंसा के मामलों में पति की वास्तविक आय का खुलासा होना एक अनिवार्य पहलू है। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के पास यह अधिकार है कि वह पति को अपनी आय और संपत्ति के दस्तावेज, जैसे इनकम टैक्स रिटर्न (ITR), पेश करने के लिए आदेश जारी कर उसे मजबूर कर सके।

यह कानूनी विवाद भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत एक महिला और उसके नाबालिग बेटे द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ। याचिकाकर्ता ने लखनऊ के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम) के समक्ष घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया था। महिला ने अपने पति और ससुराल वालों पर दहेज उत्पीड़न, शारीरिक मारपीट और आर्थिक प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए थे।

मामले की कार्यवाही के दौरान, महिला ने BNSS की धारा 91 के तहत एक आवेदन दिया, जिसमें मांग की गई कि उसके पति को अपने इनकम टैक्स रिटर्न और अन्य वित्तीय दस्तावेज जमा करने का आदेश दिया जाए। महिला का तर्क था कि भरण-पोषण की उचित राशि तय करने के लिए ये दस्तावेज बेहद जरूरी हैं। हालांकि, 19 जनवरी को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने इस मांग को ठुकरा दिया, जिसके बाद महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पति के दावों और उसकी वास्तविक वित्तीय स्थिति के बीच एक बड़ा अंतर सामने आया। मजिस्ट्रेट कोर्ट के सामने पति ने खुद को एक “मजदूर” बताया था, ताकि वह भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बच सके। लेकिन जब हाईकोर्ट ने आयकर विभाग से पिछले दो वर्षों का रिकॉर्ड तलब किया, तो सच्चाई कुछ और ही निकली।

READ ALSO  SOP For Dignified Cremation of Dead Bodies Will be Notified Soon: UP Govt Informs All HC

रिकॉर्ड के अनुसार, पति पेशे से एक ‘आर्किटेक्ट’ है और उसकी वार्षिक आय 4.85 लाख रुपये से 5.07 लाख रुपये के बीच है। कोर्ट ने इस विसंगति को गंभीरता से लिया।

जस्टिस बृज राज सिंह ने जोर देकर कहा कि वित्तीय खुलासे के मामले में कोई विकल्प नहीं है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘रजनेश बनाम नेहा’ (2021) मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि वैवाहिक विवादों में दोनों पक्षों को अपनी संपत्ति और देनदारियों का शपथ पत्र देना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“भरण-पोषण और घरेलू हिंसा के मामलों में आय का खुलासा अत्यंत महत्वपूर्ण है। मजिस्ट्रेट इस संबंध में आदेश जारी कर पति को अपनी आय और संपत्ति का विवरण देने के लिए बाध्य कर सकते हैं।”

READ ALSO  27 साल पुराने बलात्कार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को किया बरी, पीड़िता से शादी बनी आधार

कोर्ट ने पति को यह भी आदेश दिया कि वह अपने इनकम टैक्स रिटर्न की एक प्रति सीधे अपनी पत्नी को उपलब्ध कराए।

हाईकोर्ट ने अब लखनऊ के मजिस्ट्रेट को पत्नी की याचिका पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया है। निचली अदालत को छह सप्ताह के भीतर इन टिप्पणियों के आलोक में नया आदेश पारित करने को कहा गया है, ताकि भरण-पोषण की कार्यवाही पति की वास्तविक आर्थिक स्थिति के आधार पर आगे बढ़ सके।

READ ALSO  विशेष अदालत ने बलात्कार मामले में भाजपा नेता सैयद शाहनवाज हुसैन के खिलाफ जारी समन पर रोक लगा दी
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles