रेलवे ट्रैक से 10 मीटर दूर शव मिलने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि यात्री चलती ट्रेन से नहीं गिरा: झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट ने निर्णय दिया है कि किसी यात्री का शव रेलवे ट्रैक से 10 मीटर की दूरी पर मिलना इस बात का निर्णायक आधार नहीं हो सकता कि वह चलती ट्रेन से नहीं गिरा था। अपील पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने रांची स्थित रेलवे दावा ट्रिब्यूनल के साल 2023 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसने एक मृत यात्री के परिवार के मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने ईस्टर्न रेलवे को निर्देश दिया कि वह मृतक के आश्रितों को 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 8,00,000 रुपये का मुआवजा प्रदान करे। अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि रेलवे दुर्घटनाओं के मामलों में सख्त और बिना किसी गलती के दायित्व (स्ट्रिक्ट एंड नो-फॉल्ट लायबिलिटी) का सिद्धांत लागू होता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा मामला 1 अगस्त 2017 को हुई एक घटना से जुड़ा है। मृतक अशोक महतो (जिन्हें मातो भी कहा गया है) ने जमुई से मधुपुर रेलवे स्टेशन तक की यात्रा के लिए एक वैध द्वितीय श्रेणी का टिकट (टिकट संख्या 93414480) खरीदा था और वे 18184 डाउन दानापुर-टाटानगर एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हुए थे। उन्होंने फोन पर अपनी पत्नी को सूचित किया था कि वे घर लौट रहे हैं, लेकिन वे वापस नहीं पहुंचे।

उनके परिवार ने उनकी खोजबीन शुरू की। इसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि नवापत्री केबिन के पास ट्रेन से दुर्घटनावश गिरने के कारण एक व्यक्ति की मौत हो गई है। जब परिजन घटना स्थल पर पहुंचे, तो उन्होंने शव की पहचान अशोक महतो के रूप में की। मृतक के भाई छोटू महतो द्वारा दी गई लिखित सूचना के आधार पर मधुपुर गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (जीआरपी) थाने में 2 अगस्त 2017 को अस्वाभाविक मृत्यु (यू.डी.) मामला संख्या 39/2017 दर्ज किया गया।

रेलवे पुलिस ने मामले की जांच कर उसी दिन (2 अगस्त 2017) पंचनामा (इनक्वेस्ट रिपोर्ट) और अंतिम रिपोर्ट तैयार की, जिसमें स्पष्ट किया गया कि मृतक की मौत ट्रेन से गिरने के कारण हुई थी। पुलिस को मृतक के पास से जमुई से मधुपुर का एक वैध यात्रा टिकट भी बरामद हुआ, जिसका उल्लेख पुलिस ने पंचनामा और अंतिम रिपोर्ट दोनों में किया था।

इसके बाद मृतक की पत्नी श्रीमती राज कुमारी देवी और उनकी चार बेटियों ने रेलवे दावा ट्रिब्यूनल अधिनियम, 1987 की धारा 16 के तहत 8 लाख रुपये के मुआवजे की मांग करते हुए याचिका दायर की। हालांकि, 26 अप्रैल 2023 को रेलवे दावा ट्रिब्यूनल की रांची पीठ ने उनके दावे को खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल का मानना था कि यह घटना रेलवे अधिनियम की धारा 123(सी)(2) के तहत ‘अप्रिय घटना’ की श्रेणी में नहीं आती है। ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले का आधार यह बनाया था कि घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था, शव रेलवे ट्रैक से 10 मीटर दूर मिला था और मृतक एक वैध यात्री नहीं था।

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पक्षों की दलीलें

ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वकील श्रीमती चैताली सी. सिन्हा और सुश्री चैनिका ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने तथ्यों की गलत व्याख्या की है। उन्होंने कहा कि मृतक एक वैध यात्री थे क्योंकि उनके पास से यात्रा टिकट बरामद हुआ था, जिसकी पुष्टि रेलवे पुलिस ने भी की थी। उन्होंने तर्क दिया कि यह दुर्घटना पूरी तरह से ‘अप्रिय घटना’ के दायरे में आती है और रेलवे अधिनियम में मुआवजे के प्रावधानों को एक जनकल्याणकारी कानून के रूप में देखा जाना चाहिए।

दूसरी ओर, ईस्टर्न रेलवे का प्रतिनिधित्व कर रहीं केंद्र सरकार की वकील (सीजीसी) श्रीमती निकी सिन्हा ने ट्रिब्यूनल के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि टिकट 1 अगस्त 2017 का था जबकि शव 2 अगस्त 2017 को बरामद किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि टिकट खरीदने या ट्रेन से गिरने का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था, इसलिए दावेदार अपना मामला साबित करने में असमर्थ रहे।

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अदालत का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने मामले की फाइल और रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि दुर्घटना घटित होने की बात स्वीकार की गई है। यात्री की वैधता के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि मृतक के पास से यात्रा टिकट संख्या 93414480 बरामद हुआ था, जिसका उल्लेख पुलिस की रिपोर्टों में भी है। इससे स्पष्ट होता है कि वह एक वैध यात्री थे।

रेलवे की इस दलील को कि टिकट खरीदने का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था, अदालत ने नामंजूर कर दिया। अदालत ने कहा कि हर एक टिकट की खरीद के समय चश्मदीद गवाह की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि ट्रेन से यात्रा करना आम लोगों की दिनचर्या का हिस्सा है।

शव के ट्रैक से दूरी पर मिलने के संबंध में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रैक से 10 मीटर की दूरी पर शव मिलने से इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि व्यक्ति चलती ट्रेन से गिरा था। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के अनीता देवी और अन्य बनाम भारत संघ (एफएओ संख्या 169/2022) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:

“इस तथ्य से प्रतिवादी/रेलवे को कोई लाभ नहीं मिल सकता कि मृतक का शव डाउन लाइन ट्रैक पर किलोमीटर 15/9-16/0 पर पाया गया था। केवल इसी आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मृतक चलती ट्रेन से नहीं गिरा था।”

इसी बिंदु को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“केवल इसलिए कि शव रेलवे ट्रैक से 10 मीटर दूर पाया गया था, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दुर्घटना ट्रेन से गिरने के कारण नहीं हुई थी, और यह साबित करने का दायित्व रेलवे पर है कि दुर्घटना ट्रेन से गिरने के कारण नहीं हुई थी।”

अदालत ने रेलवे अधिनियम की धारा 124-ए का भी विश्लेषण किया, जो अप्रिय घटनाओं के मामलों में मुआवजे के दायित्व को तय करती है। अदालत ने पाया कि मृतक का मामला इस धारा के तहत दिए गए अपवादों (जैसे आत्महत्या, खुद को पहुंचाई गई चोट, आपराधिक कृत्य, नशा या प्राकृतिक बीमारी) में से किसी में भी नहीं आता है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले भारत संघ बनाम प्रभाकरन विजया कुमार और अन्य (2008) 9 SCC 527 का उल्लेख करते हुए कहा:

“चूंकि रेलवे अधिनियम में मुआवजे का प्रावधान एक जन-कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी उदार और व्यापक व्याख्या की जानी चाहिए, न कि संकीर्ण और तकनीकी।”

यात्री की लापरवाही (जैसे खुले दरवाजे के पास खड़े होना) के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जमीला बनाम भारत संघ (2010) 12 SCC 443 वाले निर्णय का सहारा लिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि लापरवाही को कानून के तहत ‘आपराधिक कृत्य’ नहीं माना जा सकता:

“चलती ट्रेन के डिब्बे के खुले दरवाजे पर खड़ा होना एक लापरवाही भरा कृत्य हो सकता है, यहाँ तक कि एक उतावलापन भी हो सकता है, लेकिन बिना किसी अन्य तथ्य के, यह निश्चित रूप से कोई आपराधिक कृत्य नहीं है।”

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने अंततः माना कि रेलवे दावा ट्रिब्यूनल का फैसला कानून के अनुकूल नहीं था और उसे रद्द कर दिया। अदालत ने घोषित किया कि अपीलकर्ता दुर्घटना की तारीख (1 अगस्त 2017) से वास्तविक भुगतान की तारीख तक 7% वार्षिक ब्याज के साथ 8,00,000 रुपये का मुआवजा प्राप्त करने के हकदार हैं।

ईस्टर्न रेलवे को निर्देश दिया गया कि वह इस आदेश की प्रति मिलने या प्रस्तुत किए जाने के दो महीने के भीतर मुआवजे का भुगतान करे। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के रिकॉर्ड को तुरंत वापस भेजने का निर्देश दिया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्रीमती राज कुमारी देवी और अन्य बनाम भारत संघ
वाद संख्या: एम.ए. संख्या 182 / 2025
पीठ: जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 09.07.2026

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