इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की मांग करने वाले एक अंतरधार्मिक जोड़े की रिट याचिका स्वीकार कर ली है। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी वयस्क व्यक्ति का अपनी पसंद के साथी के साथ रहने का निर्णय भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है, और लिव-इन रिलेशनशिप किसी भी कानून के तहत न तो प्रतिबंधित है और न ही दंडनीय।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए प्रतिवादियों को उनके शांतिपूर्ण जीवन और स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करने का निर्देश देने की मांग की थी। अलग-अलग धर्मों (हिंदू और मुस्लिम) से ताल्लुक रखने वाले याचिकाकर्ताओं ने एक साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया था। उन्होंने निजी प्रतिवादियों से जान का खतरा होने की आशंका जताई थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि स्थानीय पुलिस से संपर्क करने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिसके कारण उन्हें यह रिट याचिका दायर करनी पड़ी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि संविधान का अनुच्छेद 21 विवाह करने या न करने और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने की व्यक्तिगत पसंद का अधिकार देता है। यह दलील दी गई कि एक वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने या उसके साथ रहने का अधिकार है। साथ ही यह भी कहा गया कि अनुच्छेद 14 कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है और याचिकाकर्ता, वयस्क होने के नाते, कानूनी रूप से इस तरह के संबंध में रहने के हकदार हैं।
राज्य की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता श्री प्रभास कुमार तिवारी ने निर्देश प्रस्तुत करते हुए बताया कि दोनों याचिकाकर्ता वयस्क हैं और उनके साथ रहने के संबंध में कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की गई है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कोर्ट नंबर 81 की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने वयस्क व्यक्तियों को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण पर जोर दिया। हाईकोर्ट ने नोट किया:
“यह कोर्ट यहां याचिकाकर्ताओं को हिंदू और मुस्लिम के रूप में नहीं, बल्कि दो वयस्क व्यक्तियों के रूप में देखता है जो अपनी स्वतंत्र इच्छा और पसंद से काफी समय से शांतिपूर्वक और खुशी से साथ रह रहे हैं।”
फैसले में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। हाईकोर्ट ने कहा:
“व्यक्तिगत संबंधों में हस्तक्षेप दो व्यक्तियों की पसंद की स्वतंत्रता के अधिकार पर एक गंभीर अतिक्रमण होगा। यह कोर्ट यह समझने में विफल है कि यदि कानून एक ही लिंग के दो व्यक्तियों को भी शांतिपूर्वक साथ रहने की अनुमति देता है, तो किसी व्यक्ति, परिवार या राज्य को अपनी मर्जी से साथ रहने वाले दो वयस्क व्यक्तियों के विषमलैंगिक संबंध (heterosexual relationship) पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती।”
हाईकोर्ट ने अपने तर्क के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया:
- लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006): शीर्ष अदालत ने कहा था कि एक बार व्यक्ति वयस्क हो जाए, तो वह जिसके साथ चाहे रह सकता है और उसके माता-पिता अधिक से अधिक सामाजिक संबंध तोड़ सकते हैं, लेकिन हिंसा या उत्पीड़न नहीं कर सकते।
- शफीन जहां बनाम अशोकन के.एम. (2018): सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है।
- सोनी गेरी बनाम गेरी डगलस (2018): कोर्ट ने जोर दिया कि वयस्कता प्राप्त करने पर व्यक्ति अपनी पसंद और स्वतंत्रता का प्रयोग करने का हकदार है और अदालतें ‘पेरेंट्स पैट्रिया’ (parens patriae) की भूमिका नहीं अपना सकतीं।
- शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018): कोर्ट ने “ऑनर किलिंग” की कड़ी निंदा करते हुए इसे जीवन साथी चुनने के अधिकार और व्यक्ति की गरिमा में हस्तक्षेप माना था।
उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के संबंध में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम अपने आप में अंतरधार्मिक विवाह या लिव-इन रिलेशनशिप को प्रतिबंधित नहीं करता है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“माननीय शीर्ष अदालत के साथ-साथ इस कोर्ट ने कई फैसलों में यह माना है कि लिव-इन रिलेशनशिप किसी भी कानून के तहत न तो प्रतिबंधित है और न ही दंडनीय। इसलिए… यह नहीं कहा जा सकता कि अंतरधार्मिक जोड़े का लिव-इन रिलेशनशिप एक अपराध है।”
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- याचिकाकर्ताओं को निजी प्रतिवादियों द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने की स्थिति में अपनी शिकायतों के निवारण के लिए पुलिस अधिकारियों से संपर्क करने की स्वतंत्रता है। पुलिस मामले और याचिकाकर्ताओं की उम्र की जांच करेगी और आरोपों में सच्चाई पाए जाने पर उनकी सुरक्षा के लिए कानून के अनुसार कार्रवाई करेगी।
- यदि कोई याचिकाकर्ताओं की इच्छा के विरुद्ध या धोखाधड़ी, बल, जबरदस्ती या प्रलोभन के माध्यम से उनका धर्म परिवर्तन कराने का प्रयास करता है, तो वे रिपोर्ट दर्ज करा सकते हैं।
- नूरी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य (2026) के मामले में उल्लिखित 31.08.2019 के शासनादेश में निहित निर्देश सभी संबंधित अधिकारियों पर बाध्यकारी हैं और उनका कड़ाई से पालन किया जाएगा।
- यह आदेश पुलिस अधिकारियों के पास लंबित किसी भी जांच के रास्ते में नहीं आएगा।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने याचिकाकर्ताओं की सही उम्र का निर्धारण नहीं किया है और न ही यह आदेश उन्हें कानून के अनुसार शुरू की गई किसी भी कार्रवाई या कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान करने के लिए पारित किया गया है।
मामले का विवरण :
- केस का नाम: काजल प्रजापति एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य
- केस नंबर: WRIT-C No. 3667 of 2026
- बेंच: जस्टिस विवेक कुमार सिंह
- तारीख: 18 मार्च, 2026

