हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दौलत राम द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट (NI) एक्ट की धारा 138 के तहत उनकी सजा को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मूल कर्ज का भुगतान नहीं किया जाता है, तो ‘सुरक्षा’ (security) के रूप में जारी किए गए चेक को भी भुगतान के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है और इसका अनादर होने पर आपराधिक दायित्व बनता है।
जस्टिस संदीप शर्मा ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता एक्ट की धारा 118 और 139 के तहत वैधानिक अनुमानों (statutory presumptions) का खंडन करने में विफल रहा, जो यह मानते हैं कि चेक वैध कानूनी दायित्व के निपटान के लिए जारी किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दौलत राम (याचिकाकर्ता) द्वारा एच.पी. स्टेट को-ऑपरेटिव एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट बैंक से लिए गए 1,50,000 रुपये के ऋण से संबंधित है। पुनर्भुगतान में चूक के बाद, याचिकाकर्ता ने खाते को नियमित करने के लिए 6 जनवरी, 2020 को 75,985 रुपये का एक चेक (नंबर 438622) जारी किया।
बैंक द्वारा प्रस्तुत करने पर, चेक “अपर्याप्त फंड” (Funds Insufficient) की टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया। बैंक द्वारा कानूनी नोटिस दिए जाने के बावजूद भुगतान न करने पर, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), शिलाई के समक्ष धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज की गई।
6 जुलाई, 2022 को ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दोषी ठहराते हुए तीन महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई और 85,985 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। इस फैसले को 4 सितंबर, 2023 को एडिशनल सेशन जज, सिरमौर ने भी बरकरार रखा था।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री प्रकाश शर्मा ने तर्क दिया कि निचली अदालतों ने सबूतों को सही ढंग से नहीं समझा। उनका दावा था कि चेक केवल ‘सिक्योरिटी’ के तौर पर दिया गया था और बैंक ने इसका दुरुपयोग किया है। कार्यवाही के दौरान यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता ने मुआवजे की 25% राशि जमा करने के हाईकोर्ट के पिछले आदेश का पालन नहीं किया था।
दूसरी ओर, प्रतिवादी बैंक ने दलील दी कि चेक जारी करना और उस पर हस्ताक्षर करना निर्विवाद था। चूंकि याचिकाकर्ता ‘सिक्योरिटी’ के अपने दावे को साबित करने या कानूनी अनुमान को झुठलाने के लिए कोई सकारात्मक साक्ष्य पेश नहीं कर सका, इसलिए सजा पूरी तरह वैध है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि एक बार चेक पर हस्ताक्षर और उसे जारी करने की बात स्वीकार हो जाने के बाद, ‘रिवर्स ओनस’ (प्रमाण का उल्टा बोझ) लागू हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय M/s Laxmi Dyechem V. State of Gujarat (2013) का हवाला देते हुए अदालत ने टिप्पणी की:
“यदि चेक जारी करने वाला व्यक्ति न तो कोई संभावित बचाव पेश करता है और न ही कानूनी रूप से लागू करने योग्य ऋण के अस्तित्व को चुनौती देता है, तो NI एक्ट की धारा 139 के तहत वैधानिक अनुमान प्रभावी हो जाता है।”
‘सिक्योरिटी चेक’ के बचाव पर जस्टिस शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के Sripati Singh v. State of Jharkhand (2021) मामले का उल्लेख किया और कहा:
“वित्तीय लेनदेन के अनुसरण में सुरक्षा के रूप में जारी किया गया चेक हर परिस्थिति में एक बेकार कागज का टुकड़ा नहीं माना जा सकता… यदि ऋण राशि नियत तारीख से पहले किसी अन्य रूप में नहीं चुकाई जाती है, तो सुरक्षा के रूप में जारी चेक भुगतान के लिए परिपक्व (mature) हो जाएगा।”
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि NI एक्ट ‘सिक्योरिटी चेक’ के लिए कोई विशेष छूट नहीं देता है। यदि चेक पेश करने के समय कर्ज मौजूद है, तो चेक बाउंस होने पर धारा 138 लागू होगी।
अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के निष्कर्षों में कोई कानूनी त्रुटि या न्याय की विफलता नहीं पाते हुए रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया। जस्टिस शर्मा ने कहा कि याचिकाकर्ता बैंक मैनेजर की जिरह के दौरान कुछ भी विपरीत साबित करने में असमर्थ रहा।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को सजा काटने के लिए तत्काल ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। सजा पर लगी अंतरिम रोक हटा दी गई है और जमानत बांड रद्द कर दिए गए हैं।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: दौलत राम बनाम एच.पी. स्टेट को-ऑपरेटिव एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट बैंक और अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल रिवीजन नंबर 80 ऑफ 2024
- बेंच: जस्टिस संदीप शर्मा
- फैसले की तारीख: 25 मार्च, 2026

