FIR दर्ज होने का मतलब तुरन्त गिरफतारी नहीं

हाल ही में, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने यह कहा है कि कानून के तहत यदि कोई संज्ञेय अपराध का खुलासा करता है तो FIR दर्ज करना अनिवार्य है,
लेकिन इसका मतलब यह नहीं की अभियुक्त को तुरन्त गिरफतार कर लिया जाये।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राज मोहन सिंह ने यह निर्णय दिया है।

FIR दर्ज होने का मतलब तुरन्त गिरफतारी नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि संज्ञेय अपराध के आरोप में नियमित रूप से गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। 

पुलिस अधिकारी को आरोपी को तब तक गिरफ्तार नहीं करना चाहिए जब तक कि कुछ जांच के बाद, उसे उचित संतुष्टि न हो।

हाईकोर्ट ने देखा कि गिरफ्तारी और FIR के पंजीकरण के बीच कोई संबंध नहीं है।

दोनों दो अलग अवधारणाएं हैं और विभिन्न मापदंडों पर काम करती हैं।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरका के निर्णय का हवाला देते हुए चेतावनी दी कि
गिरफ्तारी की शक्ति का दुरुपयोग आईपीसी की धारा 166 के तहत ऐसे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को आमंत्रित करेगा।

क्या था मामला?

हितेश भारद्वाज ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एक याचिका दायर की,
जिसमें पुलिस से उसकी मां की हत्या के बारे में FIR दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई। 

उसने आरोप लगाया कि उसके भाई ने उसकी मां की हत्या की है।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि कुछ प्राथमिक जांच के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया है। 

न्यायमूर्ति राज मोहन सिंह ने कहा कि धारा 154 सीआरपी के तहत FIR दर्ज करना अनिवार्य है अगर शिकायत संज्ञेय अपराध का खुलासा करती है। 

ऐसी स्थिति में किसी भी प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है।

केवल वैवाहिक मामलों, वाणिज्यिक मामलों, भ्रष्टाचार के मामलों, चिकित्सीय लापरवाही के मामलों आदि की प्रारंभिक जांच की अनुमति है। 

इसके अलावा, ऐसे मामलों में जहां पुलिस के पास पहुंचने में तीन महीने से अधिक की अनुचित देरी होती है और
उसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं होता तो भी पुलिस प्रारंभिक जॉच कर सकती है।

हाईकोट ने आगे कहा कि पुलिस अधिकारी के पास प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार करने का कोई विवेक नहीं है, जहां शिकायत संज्ञेय अपराध का खुलासा करती है। 

कार्ट ने माना कि आपराधिक मामले दर्ज करने में विफलता समाज में अराजकता लाएगी।

अतः कोर्ट ने पुलिस को की FIR दर्ज करने का निर्देश जारी किया है।

हालाँकि हाईकोटने स्पष्ट किया है कि यदि जांच में कुछ नहीं पाया जाता है, तो पुलिस सक्षम न्यायालय के समक्ष प्राथमिकी रद्द करने का अनुरोध कर सकती है।

Case Details:

Title: Hitesh Bhardwaj vs State of Punjab and Others

Case No. CRM-M No.26794 of 2020 (O&M)

Coram: Hon’ble Mr. Justice  Raj Mohan Singh

Date of Order: 27.10.2020

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