क्या किसी को बिना कारण बताए हिरासत में लिया जा सकता है?

जिला मजिस्ट्रेट, पुलवामा द्वारा आदेश दिए गए हिरासत के आदेश पर सवाल उठाते हुए एक बंदी द्वारा एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में दायर की गई थी।

मामले के संक्षिप्त तथ्य -शहबाज़ अहमद भट बनाम जम्मू कशमीर राज्य एवं अन्य

याचिकाकर्ता को जिला मजिस्ट्रेट, पुलवामा द्वारा पारित दिनांक 10.08.2019 के आदेश द्वारा जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, 1978 की धारा 8 के तहत हिरासत में लिया गया था।

उसे इसलिए हिरासत में लिया गया था क्योंकि उसने अपने साथियों के साथ मिलकर सरकारी संपत्ति को नष्ट कर दिया था।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि प्रतिवादी द्वारा दायर हलफनामे में उनके सहयोगियों के विवरण का उल्लेख नहीं किया गया है। यह भी आरोप लगाया गया कि उत्तरदाताओं ने उस तिथि या समय का उल्लेख नहीं किया है जब याचिकाकर्ता और उसके सहयोगियों द्वारा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप है। प्राथमिकी की प्रतियां और बयानों का रिकॉर्ड भी याचिकाकर्ता को प्रदान नहीं किया गया था।

याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि उसे नजरबंद रखने के लिए कोई कारण नहीं बताया गया है, जिससे वह अपनी नजरबंदी के खिलाफ प्रभावी प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है।

याचिकाकर्ता द्वारा यह भी कहा गया कि उसकी गिरफ्तारी भी अवैध है, क्योंकि कुल चार एफआईआर दर्ज की गई हैं, लेकिन उसका नाम केवल एक एफआईआर में उल्लेखित है।

याचिकाकर्ता के वकील द्वारा उठाए गए तर्क –

वकील ने तर्क दिया कि उत्तरदाताओं ने याचिकाकर्ता को सूचित नहीं किया था कि उसे अपने मामले का प्रतिनिधित्व करने के लिए किस प्राधिकरण से संपर्क करना चाहिए।

यह भी तर्क दिया गया कि उत्तरदाता याचिकाकर्ता को सूचित करने में विफल रहे कि वह हिरासत प्राधिकरण के समक्ष आवेदन कर सकता है, जो धारा 13 जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम का उल्लंघन है और साथ ही भारत के संविधान के अनुच्छेद 22 (5) का भी उल्लंघन है।

राज्य सरकार (उत्तरदाता) का तर्क-

राज्य सरकार ने कहा कि उनके द्वारा सभी तकनीकी आवश्यकताओं का अनुपालन, जिसमें धारा 13 जम्मू और कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम शामिल है, किया गया था।

हाईकोर्ट का विशलेषण

हाईकोर्ट द्वारा सुप्रीम कोर्ट के कमलेश कुमार ईश्वरदास पटेल बनाम भारत संघ में दिये गये निर्णय का सन्दर्भ दिया गया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक राज्य सरकार हिरासत को मंजूरी नहीं देती है, तब तक हिरासत में लिये जाये वाला व्यक्ति प्राधिकरण हिरासत के समक्ष प्रतिनिधित्व कर सकता है।

हाईकोर्ट द्वारा यह भी कहा गया कि यदि हिरासत में लेने वाला प्राधिकारी बंदी को यह सूचित करने में विफल रहता है कि बंदी इसके खिलाफ सक्षम प्राधिकरण के समक्ष प्रतिनिधित्व कर सकता है, तो यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 22 (5) का उल्लंघन होगा।

उच्च न्यायालय ने देखा कि जम्मू एवं कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट 1978 के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को संविधान का अनुच्छेद 22 (5) में एक अनमोल और बहुमूल्य अधिकार प्रदान किया गया है, ताकि उसकी नजरबंदी के खिलाफ वह एक प्रतिनिधित्व कर सके।

कोर्ट ने कहा कि प्रावधान एक बंदी को यह समझाने में मदद करता है कि उसे क्यों हिरासत में लिया गया है और अगर बंदी को यह नहीं बताया जाता है कि उसे क्यांे हिरासत में लिया गया है तो यह बंदी के अधिकारों का उल्लंघन है।

इसके अलावा उच्च न्यायालय ने कहा कि उत्तरदाताओं ने स्वीकार किया है कि संबंधित दस्तावेज जैसे एफआईआर की प्रतियां, धारा 161 सीआरपीसी का बयान, डोजियर इत्यादि, बंदी को नहीं दिया गया है, जोकि सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 22 (5) का उल्लंघन था।

उच्च न्यायालय का निर्णय

दोनों पक्षों, विभिन्न अदालतों के निर्णयों और मामले के तथ्यों को देखने के बाद, उच्च न्यायालय ने कहा कि उत्तरदाताओं ने याचिकाकर्ता को आवश्यक दस्तावेज नहीं दिए, जिससे याचिकाकर्ता उसकी हिरासत के खिलाफ प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं कर सका।

हाईकोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट पुलवामा द्वारा पारित आदेश दिनांक 10.08.2019 को रद्द कर दिया, और यह निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को रिहा कर दिया जाये।

Case details:-

Title: Shahbaz Ahmad Bhat Versus State of J and K and Others

Case No. : WP(Crl) No.394/2019

Date of Order: 09.10.2020

Coram: Hon’ble Justice Tashi Rabstan

Advocates: Mr. Aamir Latoo for the petitioner ; Mr. Mir Suhail for the respondents

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