क्या चश्मदीद गवाह की गवाही को इसलिए खारिज किया जा सकता है, क्योंकि वह पीड़ित का रिश्तेदार है?

दिनांक 18.8.1993 को माधव जी (मृतक) अपने बेटे के साथ खेत पर मौजूद थे, तब ही उन पर अमरा, काचरू, कारू, सुरताराम, लालू और भागीरथ ने हमला किया। मृतक के रोने की आवाज सुनकर कुछ लोग मौके पर पहुंचे और आरोपी भाग गए।

मृतक के बेटे ने अपने पिता को एक बैलगाड़ी में लाद दिया और अस्पताल की ओर जाने लगा। जब उन्होंने आरोपियों के घर को पार किया, तो उनका रास्ता अडाबाई, मुन्नाभाई, रामीबाई, सीताबाई और वेणीराम ने रोक दिया। इन लोगों ने रिपोर्ट दर्ज नहीं करने के लिए धमकाया।

अस्पताल पहुंचने से पहले माधवजी ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। मृतक के पुत्र और भवरलाल ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई।

जांच पूरी होने के बाद, आरोपियों पर आईपीसी की धारा 149 के साथ धारा 148, 302 के तहत आरोप लगाए गए। जिन चार लोगों ने बैलगाड़ी को रोका था उन पर आईपीसी की धारा 506 के तहत आरोप लगाए गए थे।

मुकदमे के दौरान, बैलगाड़ी को अवरुद्ध करने वाले आरोपी (अडंबाई, मुन्नाभाई, रामीबाई, सीताबाई और वेणीराम) को बरी कर दिया गया क्योंकि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले थे।

छह मुख्य आरोपियों के खिलाफ मामले की सुनवाई करते हुए, अदालत ने मृतक के बेटे, बेटी और पत्नी सहित कई गवाहों की जांच की।

ट्रायल कोर्ट ने कहा कि चश्मदीद गवाहों और अन्य गवाहों की गवाही इस तथ्य की ओर इशारा करती है कि अभियुक्तों ने मृतक के साथ मारपीट की थी और उसे मारने की कोशिश की थी।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक की मौत तेज और कुंद हथियारों के कारण लगी चोटों से हुई थी।

अभियुक्तों द्वारा यह तर्क दिया गया था कि पुरानी दुश्मनी के कारण उन्हें मामले में झूठा फंसाया गया था और उन्होंने अदालत को बताया कि मृतक की मृत्यु इसलिए हो गई थी क्योंकि वह एक नाले में गिर गया था।

दो बचाव गवाहों, गाँव के चौकीदार और एक अन्य व्यक्ति के भी बयान लिये गये, लेकिन उनके बयान अविश्वसनीय थे।

ट्रायल कोर्ट ने के अनुसार आरोपी व्यक्तियों ने जानबूझकर मृतक माधवजी पर घातक चोटे पहुँचायी। तदनुसार, उन्हें धारा 302 आईपीसी के साथ 149 आईपीसी में दोषी पाया गया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

अभियुक्त ने उक्त आदेशक को उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जिसमें हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित निर्णय सही था, और अपील खारिज कर दी गई।

उच्च न्यायालय द्वारा पारित निर्णय को भारत के सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई ।

Supreme Court के समक्ष कार्यवाही –

अपीलकर्ताओं के वकील द्वारा उठाए गए तर्क –

अपीलकर्ता के वकील ने कहा कि मृतक की बेटी और बेटे की गवाही पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वे मृतक से संबंधित थे। उन्होंने आगे तर्क दिया कि अपीलकर्ताओं को पिछली दुश्मनी के कारण उन्हें झूठा फंसाया गया था।

न्यायालय के समक्ष यह भी कहा गया कि अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन करने वाले कुछ गवाह होस्टाइल हो गए थे।

विपक्षी का तर्क

विपक्षी के वकीलने तर्क दिया कि तीन गवाहों द्वारा दिए गए सबूत अभियोजन मामले का समर्थन करते हैं। आगे यह तर्क दिया गया कि मृतक और चिकित्सा साक्ष्य द्वारा जारी चोटें अभियोजन पक्ष के मामले का भी समर्थन करती हैं।

यह भी कहा गया कि दो समूहों के बीच कड़वे रिश्ते पीड़ित को हमला करने के लिए आरोपी के लिए एक स्पष्ट उद्देश्य प्रदान करते हैं।

Supreme Court का विशलेषण

माननीय सर्वाेच्च न्यायालय ने दलीप सिंह एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य के निर्णय का संदर्भ दिया, जिसममें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एक गवाह स्वतंत्र माना जायेगा, जब तक कि यह साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री न हो कि उसके पास गलत इरादे हैं या अगर गवाह के लिए किसी को गलत तरीके से फंसाने के लिए पर्याप्त मकसद था।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि सामान्यतः पीड़ित का करीबी रिश्तेदार किसी निर्दोष को नहीं फँसायेगा, बल्कि केवल असली अपराधियों का ही नाम लेगा।

यह ध्यान दिया गया कि भवरलाल-गवाह मृतक से संबंधित नहीं था, लेकिन उसकी गवाही मृतक के बेटे और बेटी द्वारा दी गई गवाही से मेल खाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही अभियोजन पक्ष के मामले में समर्थन करने वाले कुछ गवाह होस्टाइल हो गए हों, परन्तु यह साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत थे कि अभियुक्त ने मृतक पर हमला किया था।

Supreme Court का निर्णय

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित निर्णय सही था और उच्च न्यायालय का भी निर्णय सही ठहराया गया। अपील को तदनुसार खारिज कर दिया गया।

Case Details:-

Title: Karulal & Ors. Versus The State of Madhya Pradesh

Case No. Criminal Appeal No. 316 of 2011

Date of Order:09.10.2020

Coram: Hon’ble Justice N.V. Ramana, Hon’ble Justice Surya Kant And Hon’ble  Justice Hrishikesh Roy

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