अमिताभ बच्चन स्टारर मूवी झुंड की रिलीज़ पर लगी रोक

टी-सीरीज के खिलाफ तेलंगना की एक अदालत में आरोप लगाया कि उनके द्वारा कॉपीराइट का उल्लंघन किया है
और फिल्म झुंड की रिलीज के खिलाफ अस्थायी निषेधाज्ञा का अनुरोध किया।

उनकी याचिका को अनुमति दी गई क्योंकि अदालत ने माना कि उनके कॉपीराइट का प्रथम दृष्टया उल्लंघन किया गया था।

झुंड किसके जीवन पर आधारित है

अखिलेश प्रकाश पॉल (प्रथम प्रतिवादी) जो कथित तौर पर एक गैंगस्टर / डॉन था, के बारे में कहा जाता है कि
उसे विजय बरसे (दूसरा प्रतिवादी) द्वारा कोच करे जाने पर बाद में वह एक फुटबॉल खिलाड़ी बन गया।

वह स्लम सॉकर वर्ल्ड कप में भारतीय स्लम सॉकर टीम के कप्तान बना और उसके बाद फुटबॉल कोच भी।

हाल ही में वे जाने-माने टी वी शो सत्यमेव जयते में गेस्ट ऑफ़ ऑनर के रूप में सम्मिलित हुए थे।

उक्त शो को विभिन्न टी वी चौनलों और पत्रिकाओं द्वारा कवर किया गया था।

वादी की शिकायत

वादी ने प्रस्तुत किया कि उसने लोकप्रिय टीवी शो सत्यमेव जयते पर प्रतिवादी नंबर 1 की कहानी देखी थी और वह उससे प्रेरित था।

इसके बाद उन्होंने प्रतिवादी संख्या 1 से संपर्क किया और
उनसे अपने पक्ष में अपने जीवन पर फिल्म बनाने का अधिकार देने का अनुरोध किया।

प्रतिवादी ने सहमति व्यक्त की, और याचिकाकर्ता को फिल्म बनाने का अधिकार दे दिया।

जिसके लिए उसको बारह लाख रुपये की राशि का भुगतान प्रतिवादी संख्या 1 द्वारा किया जाना था।

वादी को अनापत्ति प्रमाण पत्र और घोषणा पत्र भी जारी किया गया था, और
प्रतिवादी को 5.5 लाख रुपये की राशि हस्तांतरित की गई थी।

अप्रैल 2018 में, वादी को पता चला कि प्रतिवादी नंबर 2 (कोच) के जीवन पर एक फिल्म बनाई जा रही है।

इस फिल्म में प्रतिवादी नंबर 1 के जीवन से संबंधित कहानी को भी शामिल किया गया है।

वादी ने फिल्म की रिलीज को रोकने के लिए प्रतिवादियों से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

क्षुब्ध होकर वादी ने सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अमिताभ बच्चन स्टारर मूवी झुंड की रिलीज़ पर लगी रोक

सिविल कोर्टने माना कि वादी के कॉपीराइट का उल्लंघन किया गया था, इसलिए यथास्थिति बनाए रखी जानी चाहिए।

ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई।

हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करने से किया मना

ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित मामले और आदेश के सभी तथ्यों के माध्यम को देखने के बाद माननीय तेलंगना उच्च न्यायालय ने कहा कि
प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट था कि प्रतिवादियों द्वारा बनाई गई फिल्म और वादी द्वारा पंजीकृत स्क्रिप्ट में समानताएं थीं।

आगे यह देखा गया कि यदि प्रतिवादियों को फिल्म रिलीज करने की अनुमति दी गई तो
वादी की पटकथा में जो भी नवीनता होगी वह खो जाएगी, और क्षतिपूर्ति के माध्यम से उसकी भरपाई करना मुश्किल होगा।

अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश के साथ हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं था और इसलिए अपील खारिज कर दी गई थी।

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