पारिवारिक न्यायालय मामलों की संवेदनशीलता के लिए माननीय समिति, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देशन में दिनांक 07 दिसम्बर 2025 को, न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, उ०प्र०, में “लिंग संवेदीकरण” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। इस सहभागी एवं संवादात्मक कार्यशाला में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों के परिवार न्यायालय परामर्शदाताओ द्वारा प्रतिभाग किया गया।
कार्यशाला का उद्देश्य प्रतिभागियों को लिंग की अवधारणा से परिचित कराना, उन्हें लिंग-संबंधी पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों के प्रति संवेदनशील बनाना तथा यह समझने में सक्षम बनाना था कि व्यवसायिक और व्यक्तिगत वातावरण में लिंग किस प्रकार कार्य करता है। कार्यशाला का लक्ष्य सांदर्भिक चिंतन को बढ़ावा देना और परिवार न्यायालय की कार्यप्रणाली में समानता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने वाले आचरण को अपनाना था।

निदेशक, जे०टी०आर०आई० तथा जेन-सेन समिति, लखनऊ विश्वविद्यालय दीप प्रज्जवलित करते हुए
कार्यशाला का उद्घाटन सत्र सुश्री रेखा अग्निहोत्री, निदेशक, न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, उ०प्र० की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। उद्घाटन सत्र में निदेशक महोदया ने लिंग संबंधी मामलों में जागरूकता और संवेदनशीलता के महत्व पर प्रकाश डाला। परामर्शदाता अनेक पारिवारिक विवादों के समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। न्यायसंगत परामर्श तथा वैवाहिक विवादों के समुचित समाधान के लिए लैंगिक संवेदनशीलता अत्यंत आवश्यक है। निदेशक महोदया ने यह भी उल्लेख किया कि पारिवारिक न्यायालयों में गरिमा, सहानुभूति और समानता सुनिश्चित करने हेतु रूढ़िगत धारणाओ और अवचेतन पूर्वाग्रहों को पहचानना और दर कर ू ना अनिवार्य है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह कार्यशाला प्रतिभागियों को इन महत्वपूर्ण विषयों पर गहन विचार करने और अपने दैनिक कार्य में लैंगिक-संवेदनशील दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से अपनाने के लिए प्रेरित करेगी।

कु० रेखा अग्निहोत्री, निदेशक, न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संसथान प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए
कार्यशाला के सत्रों को लखनऊ विश्वविद्यालय के जेंडर सेंसिटाइजेशन सेल – प्रो० रोली मिश्रा, डॉ० प्रशांत शुक्ला और डॉ० सोनाली रॉय चौधरी – द्वारा संचालित किया गया। कार्यशाला का पाठ्यक्रम संवादात्मक और सहभागी रूप में तैयार किया गया था, जिससे प्रतिभागी अपने स्वयं के दृष्टिकोण पर विचार कर सकें और अंतर्निहित पूर्वाग्रहों को चुनौती दे सकें ।
प्रो० रोली मिश्रा ने “समाज में लिंग और रूढ़ियाँ” पर अपने सत्र में चर्चा करते हुए बताया कि लिंग भूमिकाएँ और अपेक्षाएँ सामाजिक रूप से निर्मित होती हैं और इन्हें सांस्कृतिक, संस्थागत एवं अंतर-व्यक्तिगत प्रथाओं द्वारा मजबूत किया जाता है। सत्र में सामान्य रूढ़ियों, उनके व्यवसायिक और व्यक्तिगत जीवन पर प्रभाव तथा अवचेतन पूर्वाग्रहों को पहचानने और चुनौती देने की रणनीतियों पर भी प्रकाश डाला गया। प्रतिभागियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और यह समझने का प्रयास किया कि सामाजिक मान्यताएँ निर्णय-निर्धारण और न्यायालय में परस्पर संवाद को कैसे प्रभावित करती हैं।
डॉ० प्रशांत शुक्ला ने “प्राचीन भारत में लिंग संवेदीकरण” पर एक विचारोत्तेजक सत्र संचालित किया। इस सत्र में पितृसत्तात्मक संरचनाओ की ऐतिहासिक उत्पत्ति और प्रणालीगत प्रभाव पर चर्चा की गई। सत्र में यह विश्लेषण किया गया कि पितृसत्ता किस प्रकार समय के साथ विकसित हुई और आज भी सामाजिक, सांस्कृतिक और कानूनी दृष्टिकोणों को प्रभावित कर रही है। प्रतिभागियों ने इन संरचनाओं के समकालीन प्रभावों का मूल्यांकन किया और पेशेवर अभ्यास में लिंग-पक्षपात को पहचानने तथा उसे संबोधित करने के महत्व पर ध्यान केंद्रित किया।
डॉ. सोनाली रॉय चौधरी का सत्र “वैवाहिक विवादों का स्वरूप और विधिक दृष्टिकोण से उनका निवारण” पर केंद्रित था। इस सत्र में प्रतिभागियों को परिवार न्यायालय में सामान्यत: देखे जाने वाले विवादों के प्रकार, उनके पीछे के सामाजिक एवं लिंग-सम्बंधी कारण तथा उपलब्ध कानूनी उपायों की गहन जानकारी प्रदान की गई। सत्र ने सलाह और न्यायनिर्णय में व्यवहारिक मार्गदर्शन दिया और प्रतिभागियों को वैवाहिक मामलों को निष्पक्षता, सहानुभूति और जेंडर-सचेत दृष्टिकोण से संभालने के लिए सुसज्जित किया।

परिवार न्यायालय परामर्शदाता कार्यशाला में प्रतिभाग करते हुए
कार्यशाला का समापन प्रमाण पत्र वितरण के साथ हुआ।

